Wednesday 28 July 2010

बच्चो जाना मत / अशोक लव


 वे आए
 वर्षों बाद गूँज उठी  दीवारें
गूँज उठे घर-बाहर के कोने- कोने 
सन्नाटा ठहाकों में खो गया.

बच्चो तुम कहाँ थे
अभी तक ?

इन ठहाकों की तलाश में गुज़ार दिए
न जाने कितने -कितने वर्ष.
जाना मत यहाँ से अब
कहीं फिर से न पसर जाएँ सन्नाटे 
यहाँ 
चारों ओर. 
............... *@अशोक  लव



Saturday 24 July 2010

आभा खेतरपाल की कविता पर ...

"लाखों क्षण रेत से हैं /या बिखरी आशाएं /कंटीली झाड़ियाँ हैं /या आँखों में चुभते सपने /तपती धूप है /यासुलगती यादें /चीखता सन्नाटा है /या मेरा अकेलापन /सूखी धरती है /या मेरा प्यासा मन /आखिर कोईतो बताये /ये मैं हूँ या मरुस्थल !"-आभा खेतरपाल
आभा जी आपकी कविता जीवन के उस पक्ष की पीड़ाओं की अभिव्यक्ति है जो मनुष्य के सामर्थ्य से परे है।विवशताएँ हैं हमारी , आपकी। प्रत्येक व्यक्ति जीवन में हरियाली चाहता है और उसके पाँव के नीचेमरुस्थल की गरम-गरम रेत जाती है। इन विवशताओं की है यह कविता।
...हरियाली आपके आसपास है...मरुस्थल नहीं !

जेन्नी शबनम के पिताजी को श्रद्धांजलि !

जेन्नी शबनम जी
एक पीढ़ी थी श्रद्धा योग्य ,नमन योग्य !आपके पिता जी उस पीढ़ी के साक्षात् प्रमाण हैं। वह संघर्षरत पीढ़ी थी। मूल्यों के लिए जीना, जीवन- दर्शन को जीवन में उतारना, मात्र अपने लिए ही नहीं समाज के लिए भी जीना।
हमने भी उस पीढ़ी को निकट से देखा और जिया है।
हमने कई बार सोचा कि जेन्नी जी इतनी संस्कारवान कैसे हैं ? अब पता चला। आप धन्य हैं। जिनके पिता ऐसे होते हैं उनका आपकी भाँति होना स्वाभाविक है ।
आपने आपने पिता जी के विषय में जितना लिखा है, उससे आँखों के समक्ष उनका गंभीर श्रद्धा-योग्य व्यक्तित्व साकार हो गया है। उनका अभाव पल-पल खटकना स्वाभाविक है। वे प्रकाश-पुंज थे। उनका चला जाना जीवन भर के लिए ऐसा अभाव छोड़ गया होगा जिसे न तो कोई व्यक्ति और न ही कुछ शब्द पूर्ण कर सकते हैं।
जब किसी की बहुत आवश्कता होती है तब उसका न होना कितना पीड़ाजनक होता है इसकी अनुभूति हमें है। हमारी अपनी सीमाएँ हैं, मृत्यु के क्रूर हाथों के समक्ष असहाय हैं।
काश आप जैसी बेटियाँ सभी की हों , जो आज भी आपने पिता के साथ इतनी गहनता से सम्बद्ध हैं ।
मन बहुत उदास हो गया है। कुछ दिनों के पश्चात् ही पिता जी की पुण्य-तिथि है।
आपकी माता जी ने जो संघर्ष किए हैं , उन्हें नमन !
--अशोक लव
जेन्नी शबनम :लिंक -http://saajha-sansaar.blogspot.com

Tuesday 20 July 2010

बदलते आंगन (कविता ) / अशोक लव

The Super Human

बदलते आँगन/खंड नारी

आँगन में जन्मती हैं
पलती-बढती हैं
खिलखिलाती हैं
घर-द्वार महकाती हैं |

तितलियों-सी उड़ती हैं
प्रकृति की समस्त छटाएँ छितराती हैं
कोयल-सी कुहकती हैं
घर को स्वर्ग बनाती हैं |

माँ के चरण-चिह्नों पर
पाँव रखती हैं
आटा गूंथना सीखती हैं
चपातियों को गोल करना सीखती हैं
सब्जियों-मसालों में सम्बंध बनाना सीखती हैं |

पिता की आय का हिसाब रखने लगती हैं
माँ की थकान का हिसाब रखने लगती हैं
घर के उत्तरदायित्व बांटने लगती हैं |

इतना सब जब सीख जाती हैं
सहसा चिड़िया-सी उड़ जाती हैं
अपना संसार बसाती हैं |
कहाँ जनमती हैं,
कहाँ पलती हैं,
कहाँ घर बसाती हैं!
ऐसी होती हैं बेटियाँ!
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बेटियां ,
सुनने मैं ये शब्द जितना मीठा लगता है , जीवन मैं यह शब्द उतना ही सुन्दर और शाश्वत होता है , है न दी ,
जीवन के सच की सदृश्य बेटियाँ , सिर्फ माता , पिता , की बेटी न होकर आंगन का उजाला , घर की रौनक , दो परिवारों का सम्मान , और कई जीवनों का आधार होती हैं बेटियां ।
सच में दी , ये बहुत बहुत बहुत अच्छी रचना लगी है , अशोक जी को , हृदय की अतल गहरे से बधाई ।

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'लड़कियाँ छूना चाहती हैं आसमान' की कविताओं को सुश्री आभा खेतरपालऑरकुट में' सृजन का सहयोग ' में पोस्ट कर रही हैंइस कविता पर प्राप्त प्रतिक्रिया सहित इसे यहाँदिया जा रहा है

Sunday 18 July 2010

चल बिटिया चल

नन्हीं बिटिया
उंगली छुड़ा
काली नंगी सड़क पर
टेढ़े -सीधे पग रखती
भाग खड़ी हुई
पकड़ पाता उसे
वह तब तक गिर गई थी
छिल गए थे उसके घुटने।

उसे उठाया
घुटने सहलाए
ले चला फिर घुमाने उंगली पकड़।
छुड़ा ली उसने फिर उँगली
छिले घुटनों की पीड़ा भूल
दौड़ गई वह

इस बार नहीं दौड़ा उसके पीछे
उसे जाने दिया
बिना उंगली पकडे चलने का
अपना ही सुख होता है।
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@सर्वाधिकार -अशोक लव
पुस्तक-अनुभूतिओं की आहटें ( वर्ष-1997)

Wednesday 14 July 2010

कुछ दो वक्त की रोटी को तरसते हैं इस देश में
कुछ एक झटके में दो सौ करोड़ कमाते हैं।
देश को रखकर जेब में बैठे हैं कुर्सियों पर
पसीने में नहाए लोग गलियों में बैठे हैं।

जगन्नाथपुरी के भगवान श्री कृष्ण ,सुभद्रा और बलराम / अशोक मेहता

Friday 9 July 2010

संगीता स्वरूप जी , लघुकथा पाठकों के लिए बहुत कुछ छोड़ जाती है। यही इस विधा की विशेषता है। यदि टिन्नी इस लघुकथा को पढ़ ले तो ऐसी मूर्खता करे वैसे हमारी कामना यही है कि टिन्नी को समझ जाए।
गिन-गिन दिन,
आया जन्म-दिन
खुशियों भरें रहें,
हर
पल-छिन !


Thursday 8 July 2010

नहीं मरेगी टिन्नी?( लघुकथा ) / अशोक लव

 
प्रिय गौतम
उसे बचा सकूँगी नहीं जानती ? वह जिस स्थिति में है हर पल आशंका बनी रहती है , वह कहीं आत्महत्या कर लेउसे समझा-समझाकर परेशान हो चुकी हूँसमझाने और समझने की सीमा होती हैवह केवल एक ही रट लगाए है निक्कू से विवाह करूंगी
माँ का रो-रोकर बुरा हाल हैपिताजी उसके कहने पर निक्कू के माता-पिता से बातचीत करने गए थेवह किसी भी हालत में अभी निक्कू का विवाह करने के लिए राज़ी नहीं हैंवह अपनी जगह ठीक हैंअभी एम बी करके कॉलेज से निकला ही हैघर का बड़ा बेटा हैपिता अकेले कमाते हैदो छोटी बहनें कालेज में पढ़ रही हैंअभी उसकी पढ़ाई लिए लोन की किश्तें जा रहीं हैं
मैंने निक्कू से बात की थीउसका कहना है-" टिन्नी से उसकी दोस्ती भर हैकॉलेज में एक साथ पढ़ने , एक्टिविटिस में एक साथ भाग लेने का मतलब प्रेम होना नहीं होताठीक है वह सबसे खुलकर हँसता है, मज़ाक करता है, अपनापन जताता हैइसका यह अर्थ तो नहीं है कि वह सबसे प्रेम करने लगा हैक्लास में बाकी लड़कियाँ भी तो थींउसने टिन्नी को कभी अलग से इसका अहसास ही होने दिया कि वह उसके लिए ख़ास हैक्लास में जैसे लड़के-लड़कियाँ आपस में रहते हैं , उसके साथ ऐसे ही रहा हैमैंने कभी भी किसी भी तरह से उसे नहीं कहा कि वह मेरे लिए स्पेशल हैमेरी इतनी जिम्मेदारियाँ हैंपिताजी को हाई ब्लड प्रेशर है माँ शूगर पेशेंट हैंबहनें पढ़ रहीं हैंमेरा अपना करियर अभी शुरू हुआ हैयह लड़की पागल हो गई हैमेरे घर में अपने पिताजी को भेज दियामेरा तो मरण हो गयामेरे फ्रेंड्स को ऑरकुट और फेसबुक पर तरह-तरह के मेसेज कर रही हैमैडम आप बताइए इसे मैं क्या कहूँ ?"
टिन्नी के पास इन बातों का कोई जवाब नहीं हैकहती है -"निक्कू कभी कभी तो विवाह करेगा हीयह एक बार कह दे तो मैं दो-तीन-चार वर्ष तक भी रुक जाऊंगीठीक है इसने कॉलेज में कभी नहीं कहा कि वह मेरे साथ विवाह करेगापर हाव-भाव भी तो मायने रखते हैंइसका यूं खुलकर मज़ाक करना , कैंटीन में मेरे साथ कॉफ़ी पीना ! कॉलेज फ्रेंड्स पिक्चर देखने गए तो यह मेरे साथ ही बैठा थामैंने कितनी बार कहा था निक्कू जब विवाह करूंगी तो तेरे जैसे लड़के के साथ ही करूंगीअब घर में मेरे विवाह की बात चली तो मैंने पिताजी से कह दियादीदी आप नहीं जानती मैं निक्कू से कितना प्यार करती हूँमैं इसके बिना जी नहीं सकतीआप देख लेनामैं आत्महत्या कर लूंगीप्यार किया है तो इसी के साथ ही जीऊँगीनिक्कू के बिना अपनी ज़िंदगी के बारे में मैं सोच भी नहीं सकती।"
गौतम, टिन्नी की जिद्द ने दो घरों का सुख-चैन छीन लिया हैनिक्कू के माता-पिता परेशान हैंयदि टिन्नी ने आत्महत्या के लिए निक्कू और उसके माता-पिता को ज़िम्मेदार लिखकर आत्महत्या कर ली तो उनका सारा परिवार तो जेल जाएगा ही
टिन्नी का यह एकतरफा प्यार कैसा तूफ़ान लाएगा नहीं जानतीउसे ज़िंदगी में सिर्फ निक्कू ही दिखाई दे रहा हैमैंने हर तरह से प्रयास कर लिया हैवह नहीं जानती ब्लैकमेल करके किया गया विवाह कितने दिन चलेगानिक्कू के पक्ष को देखें तो वह एकदम ठीक लगता है
तुम आकर एक बार टिन्नी के माता-पिता की हालत देखोगे तो तुम्हारी आँखों में आँसू जाएँगे
तुम टिन्नी को बचपन से जानते होशायद तुम्हारी बातों का असर हो ! मैं नहीं चाहती उसकी ज़िन्दगी इस तरह ख़त्म हो
कल की फ्लाईट से जाओ
तुम्हारी मित्र
आनंदिता
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@अशोक लव
यह मात्र लघुकथा हैइसका किसी के वास्तविक जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं है.

Friday 2 July 2010

http://www.kosmix.com/topic/Ashok_Lav
http://www.kosmix.com/topic/Ashok_Lav
Dr. Ashok Lav is a noted Hindi language author and poet. Works and honours A recipient of numerous awards related to Hindi literature, including the Mohyal Gaurav,Eklavya award, his more well known works include: Shikhron se aage (novel- literally, "Beyond peaks") Anubhootiyon ki aahaten (collection of poems,literally, "The approaching footsteps of sensations") Larhkiyan Choonaa Chahtee Hain Aasmaan (collections of poems- literally, "Girls want to touch the sky") Phulvaree (songs for children- literally, "A garden of flowers") Band darvaazon par dastaken (short stories- literally, "Knocking on locked doors") Salaam Dilli (short stories- literally, "A salute to Delhi") Pathron se bandhe pankh (short stories- literally, "Feathers tied to stones") Khidkiyon Par Tange Log (short stories(ed)-literally,"People Hanged on Windows" His book Hindi ke Pratinidhi Saahityakaaron se Saakshaatkaar, a collection of interviews with writers representative of Hindi literature, was released by the Vice President of India, Dr. Shankar Dayal Sharma on February 9, 1990. Personal life Dr. Lav belongs to the Mohyal community, usually more noted for its tradition of military service. Besides being a writer, he is also the Managing Director of an IT firm. He also is the editor of the Hindi section of the Mohyal community magazine, the Mohyal Mitter since July 1987.

Ashok Lav :Wonderful Years In Tafs Read more: http://www.kosmix.com/topic/Ashok_Lav#इक्ष्ज़्ज़०सूस्य़ Who's who of Indian Writers, 1999: A-MAuthor: Kartik Chandra DuttPublished: 1999Ashok see under Jha, Ashok Kumar Ashok Lav see under Lav, Ashok Ashoka VardhanaRead more: http://www.kosmix.com/topic/Ashok_Lav#ixzz0sUs244BI

: Ashok Lav From Wikipedia sirf ham - tum sirf ham tum Aster Global Services JAY MOHYAL: : ...