Saturday 28 August 2010

पुण्य-तिथि पर नमन पिता !

नमन पिता !
28 अगस्त 1980
28 अगस्त 2010
विदा  हुए  हो  गए  वर्षों
और हो तुम पल-पल संग .
स्मृतियों की लहरें उमड़-उमड़ आती हैं
बचपन से युवावस्था तक का
लम्बा जीवन
कितने - कितने रूप देखे थे तुम्हारे,
जूझते हुए
संघर्षरत
विपरीत परिस्थियों से
--नहीं मिट पाता स्मृति पटल से
यह चित्र तुम्हारा.

स्नेह का निर्झर
अब कहाँ है ?

भावनाएँ जब प्रबल हो जाती हैं
 शब्द बिखर-बिखर जाते हैं .
नमन तुम्हें पिता
नमन!

इस देह में हैं जब तक
श्वास तब तक तुम जीवित रहोगे
इसके संग .
हृदय 
की प्रत्येक धड़कन के संग
तुम सदा धड़कते रहोगे
पिता !

बहुत छोटा -सा शब्द
समेटे एक संसार
जिसे तुमने बनाया था
इस संसार में अब भी तुम हो पिता
हाँ हो तुम पिता . 
पुण्य-तिथि पर नमन पिता !

Thursday 26 August 2010

कविता- "लड़कियाँ होती हैं लड़कियाँ "- अशोक लव

 लड़कियाँ होती हैं लड़कियाँ 
'''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
पींगों पर झूलती कविता
झुलाती लड़कियाँ
पांवों में घुँघरू बजाती
छनछनाती लड़कियाँ
गीतों को स्वर देती
 गुनगुनाती लड़कियाँ
घर-आँगन बुहारती
संवारती लड़कियाँ .


मर्यादाओं की परिभाषा
होती हैं लड़कियाँ
संस्कारों को जीती
जगाती हैं लड़कियाँ
पैरों में आसमान
झुकाती हैं लड़कियाँ.

'''''''''''''''''''''''''''''''''
@अशोक लव
सेक्टर-6, द्वारका
नई दिल्ली-110075

Tuesday 24 August 2010

रक्षा-बंधन के पावन पर्व पर समस्त भाई-बहनों को हार्दिक शुभकामनाएँ !

रक्षा-बंधन के पावन पर्व पर समस्त  भाई-बहनों को हार्दिक शुभकामनाएँ ! आपसी प्रेम की भावना बनी रहे।

Saturday 21 August 2010

Monday 9 August 2010

प्यासे जीवनों के पनघट ! / अशोक लव

कतारों की कतारें
अभावों से बोझिल क़दमों के संग
सूखे होठों की पपड़ियों को
सूखी  जीभ से गीलेपन का अहसास दिलाते
प्यासी आँखों में पानी के सपने लिए
कुएँ को घेरे
प्रतीक्षारत !
कुएँ में झाँकती
प्यासी आशाएँ
कुएँ  की दीवारों से टकराते
झनझनाते खाली बर्तन.
बिखरती आशाओं 
प्यासे जीवनों के पनघट !
असहाय ताकते
जनसमूह
शायद..शायद ..होठों को तर करके
हलक से नीचे तक उतर जाए
पानी !!
''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
@अशोक लव , 9 अगस्त  2010

Friday 6 August 2010

कैसे - कैसे पल / अशोक लव

डगमगाते पग  
नन्हें शिशु
तुतलाती ध्वनियाँ
स्नेह भरी कल-कल बहती नदी
अंतर्मन में समा-समा जाती
निश्छल मुस्कानें!
उफ़!
खो गए तुतलाते स्वर
सूख गई नदी
तार-तार अंतर्मन
न सहने
न कहने की स्थिति.

तुतलाते स्वरों ने सीख लिए
शब्द
बोलते हैं  अनवरत धारा प्रवाह
सिखाया था उन्हें ठीक-ठीक बोलना
अब वे बात-बात पर
सिखाते हैं.

नदी आँगन छोड़
कहीं ओर बहने लगी है
किन्हीं अन्य गलियों को
सजाने लगी है.

मुस्कानें
अपनी परिभाषा भूल गई हैं
मुस्कराने के प्रयास में 
सूखे अधरों पर जमी
पपड़ियाँ फट जाती हैं
अधरों तक आते-आते
मुस्कानें रुक जाती हैं.

पसरा एकांत
बांय-बांय करता
घर-आँगन को लीलता
पल-पल
पैर  फैलाए बढ़ता जाता है
कोना-कोना
लीलता जाता है.

कैसे - कैसे दिन
कैसे- कैसे पल उतर  आते हैं!
कैसे-कैसे रंग छितर जाते हैं !
"""""""""""""""""""""""""""""""""
@अशोक लव  [6 अगस्त 2010 ]

Thursday 5 August 2010

कैसे- कैसे पल / अशोक लव

डगमगाते पग
नन्हें शिशु
तुतलाती ध्वनियाँ
स्नेह भरी कल-कल बहती नदी
अंतर्मन में समा-समा जाती
निश्छल मुस्कानें!

उफ़!
खो गए तुतलाते स्वर

सूख गई नदी
तार-तार अंतर्मन
न सहने
न कहने की स्थिति.

तुतलाते स्वरों ने सीख लिए
शब्द
बोलते हैं  अनवरत धारा प्रवाह
सिखाया था उन्हें ठीक-ठीक बोलना
अब वे बात-बात पर
सिखाते हैं.

नदी आँगन छोड़
कहीं ओर बहने लगी है
किन्हीं अन्य गलियों को
सजाने लगी है.

मुस्कानें
अपनी परिभाषा भूल गई हैं
मुस्कराने के प्रयास में 
सूखे अधरों पर जमी
पपड़ियाँ फट जाती हैं
अधरों तक आते-आते
मुस्कानें रुक जाती हैं.

पसरा एकांत
बांय-बांय करता
घर-आँगन को लीलता
पल-पल
पैर  फैलाए बढ़ता जाता है
कोना-कोना
लीलता जाता है.

कैसे - कैसे दिन
कैसे- कैसे पल उतर  आते हैं
कैसे-कैसे रंग छितर जाते हैं !
"""""""""""""""""""""""""""""""""
@अशोक लव  [6 अगस्त 2010 ]