Friday 21 May 2010

तुम / अशोक लव

तुम
ज्यों -
अंतिम पहर का स्वप्न ,
ज्यों -
कमल-पाँखुड़ी पर तुहिन- कण ,
ज्यों -
वर्षा धुले आकाश पर इन्द्रधनुष ,
ज्यों-
तितलियों के पंखों पर अंकित गीत,
ज्यों -
मेघों को समर्पित मयूर-नृत्य ,
ज्यों-
जल-तरंगों पर रश्मियों की अठखेलियाँ,
ज्यों-
मानसरोवर में उतरना हंसों का,
ज्यों-
गंगा का भागीरथ हेतु अवतरण ,
ज्यों-
शुष्क चट्टानों पर रुई के फाहों-सा हिमपात,
ज्यों-
भोज-पत्रों पर अंकित ऋचाएँ,
ज्यों-
साधक मन में आलोकित दिव्य-प्रकाश
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* पुस्तक- अनुभूतियों की आहटें ( वर्ष-१९९७)
@सर्वाधिकार : अशोक लव

Thursday 20 May 2010

सहित्यकार के रूप में सम्मानपूर्वक जीना चाहिए

साहित्यकार साहित्य का सृजन आत्म संतोष के लिए करता है अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए करता है वह इसे प्रचार का माध्यम अथवा पहचान का माध्यम नहीं बनाता
श्रेष्ठ रचनाकार की पहचान स्वयं बनती चली जाती है उसकी रचनाएँ इसका माध्यम बनती हैं
वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों में साहित्य मुख्य - धारा नहीं रहा अर्थ और राजनीति प्रधान हो गए हैं इसका यह तात्पर्य यह नहीं है कि साहित्य सृजन नहीं हो रहा या आम व्यक्ति ने साहित्य पढ़ना बंद कर दिया है हाँ प्रतिशत बहुत कम हुआ है
कविता लिखना सबके बस का काम नहीं है और कविता से लगाव भी सबके बस का नहीं है इसलिए सृजन करते रहना चाहिए और सहित्यकार के रूप में सम्मानपूर्वक जीना चाहिए
अपनी रचनाएँ पढ़वाने के लिए -मेल पर - मेल नहीं भेजने चाहिएँ

Sunday 9 May 2010

मेरी तीन कविताएँ

'आखर कलश ' में 20 अप्रैल 2010 को प्रकाशित

अशोक लव की तीन कविताएं



परिचय
प्रकाशित पुस्तकें-
१. लड़कियाँ छूना चाहती हैं आसमान ( कविता-संग्रह)
२.अनुभूतियों की आहटें
( कविता-संग्रह)
३.टूटते चक्रव्यूह (सम्पादित-कविता संकलन)
४.सलाम दिल्ली ( लघुकथा - संग्रह )
५.खिड़कियों पर टंगे लोग ( सम्पादित लघुकथा संकलन )
६.बंद दरवाजों पर दस्तकें (सम्पादित लघुकथा-संकलन)
७.शिखरों से आगे (उपन्यास )
८. हिन्दी के प्रतिनिधि साहित्यकारों से साक्षात्कार
९. प्रेमचंद की लोकप्रिय कहानियाँ (सं)
१०.प्रेमचंद की सर्वोत्तम कहानियाँ (सं )
११.वाल्मीकि रामायण (सं )
१२. महाभारत (सं )
१३.बुद्धचरित (सं )
१४.चाणक्य - नीति (सं)
१५.महक ( बाल गीत )
१६. फुलवारी (बाल गीत )
१७.युग नायक महापुरुष
१८.युग प्रवर्तक महापुरुष
१९.पत्थरों से बंधे पंख ( कहानी -संग्रह)
लगभग १५० पुस्तकों में रचनाएँ संकलित. उपन्यास और कविता संग्रह पर छह एम फिल हुईं. लगभग पचास पाठ्य-पुस्तकें प्रकाशित .

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1.नीले - सफ़ेद फूल
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ये नीले - सफ़ेद फूल
अब पूरी तरह खिल गए हैं ।
कुछ समय पूर्व तक इनका अस्तित्व नहीं था .
प्रतीक्षा थी
इन फूलों के खिलने की
एक -एक कर कितने दिन बीत गए
और अब
ये अपना सौन्दर्य बिखेरने लगे हैं.
क्या विडंबना है !
अब ये खिल गए हैं
और हमीं इन्हें देखने के लिए नहीं रहेंगे।

कितने-कितने स्वप्न सजाते हैं हम

और कैसे स्वप्न भंग होते चले जाते हैं
बस एक टीस टूटे काँच-सी
काटती रहती है हर पल ।

इन नीले - सफ़ेद फूलों को

कहाँ स्मरण रहेगा -
किसी ने
उनके आगमन की प्रतीक्षा में
ऑंखें बिछा रखी थीं.

उनके संग जीने के
कितने-कितने स्वप्न सजा रखे थे !

कौन बदल सकता है
इन कटु सत्यों को ?

न चाहकर भी
जीना पड़ता इन स्थितियों को
और पल-पल टूटे काँच की कटन को
सहते जाना पड़ता है।
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2.लहरों कुछ तो कहो
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पाँवों के नीचे आकर
लौट जाती हैं लहरें
नहीं रुकती हैं पल भर के लिए
कितनी उत्सुकता से रहती है प्रतीक्षा ।

दूर से हिचकोले खाती लहर को आते देखकर
उससे बतियाना चाहता है मन
बहुत कुछ पूछना चाहता है मन
-उसके संसार की बातें
-तरह - तरह के रंग बदलते समुद्र की बातें
- ऐसे समुद्र के संग जीवन बिताने की बातें
लहरें हैं कि बस आती हैं
और झट से लौट जाती हैं ।

वह जिस तेज़ी से आती हैं
आभास होता है
आकर बैठेंगी
हाल-चाल बताएँगी
हाल-चाल पूछेंगी
मिलकर बाँटेंगे अपने - अपने अनुभव।

कितना अच्छा लगता है जब
कोई पास आकर बैठता है
अपनत्व का अहसास
अंतर्मन का स्पर्श करता चला जाता है ।

किसी के पास कहाँ है समय
पास आकर बैठने का,
बतियाने का
पूछने -बताने का ।

लहरों के पास भी नहीं है समय
तो फिर क्यों भागती चली आती हैं
क्यों करती हैं मन में अंकुरित
आशाएँ ?
संभवतः
उन्हें आशाओं की टूटन की
अनुभूति नहीं है।
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3.देह-दीपोत्सव
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कंपकंपाती देह के स्पंदनों ने
भर दिए अधरों में प्रकम्पन
झिलमिला उठा आकाश
महक उठी धरती।
बादलों में चमक गई
विद्युती तरंगें
चुंधिया गई धरती
चुंधिया गया आकाश।
उतर आया प्रकाश - पुंज
जगमगा गया मन - आँगन
देह ने मनाया दीपोत्सव।
पाकर स्पर्श
उमंगित लहरों का
खिल उठे कोने- कोने में
गुलाब।
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- अशोक लव
फ्लैट-363 ,सूर्य अपार्टमेन्ट ,प्लाट-14 ,सेक्टर-6 ,द्वारका,नई दिल्ली-110075