Wednesday 24 December 2008

हम दोनों फिर मिले / * अशोक लव


आज मेरा दोस्त मुझसे लिपटकर
खूब हँसा।

हमने महीनों बाद खाए
रामेश्वर के गोलगप्पे
हमने महीनों बाद खाई
आतिफ़ की दुकान से
देसी घी की गर्म-गर्म जलेबियाँ।

आज न ईद थी
आज न होली थी
फिर भी लगा आज कोई त्योहार था।

आज उसने मस्जिद की बातें नहीं कीं
आज मैंने मन्दिर की बातें नहीं कीं।

उसने महीनों बाद
मेरी पत्नी के हाथों बनी
मक्की की रोटी खाने फरमाइश की
मैंने सबीना भाभी के परांठों का ज़िक्र किया।

हम दोनों ने महीनों बाद
बच्चों के बारे में बातें कीं
हम दोनों ने आज जी भरकर
सियासतदानों को गलियां दीं।

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पुस्तक-लड़कियाँ छूना चाहती हैं आसमान
@सर्वाधिकार सुरक्षित

Tuesday 23 December 2008

गर्म मोम / * अशोक लव


ठंडी जमी मोम सब सह जाती है
छोटी-सी
पतली - सी सुई
उतर जाती है आर - पार
बिंध जाती है मोम।

तपती है जब मोम
आग बन जाती है।

समयानुसार
जीवन को मोम बनना पड़ता है।
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*पुस्तक- लड़कियां छूना चाहती हैं आसमान
@सर्वाधिकार सुरक्षित

Monday 22 December 2008

*अशोक लव, रायजादा बी डी बाली,बी एल छिब्बर



श्रीमती अम्बा बाली, एस के छिब्बर ,अशोक लव ,बी एल छिब्बर , रायजादा बी डी बाली ,मेहता ओ पी मोहन ,जे पी मेहता ,डी वी मोहन,एन डी दत्ता .(१४.१२.०८)
मेजर जनरल के के बक्षी, अशोक लव ,सुरेन्द्र कुमार शर्मा "लौ "(इतिहासवेत्ता)

Thursday 18 December 2008

नया कविता-संग्रह प्रकाशित हुआ है।

Tuesday 16 December 2008

९.११.०८
रवि बक्षी और डॉ भाई महावीर के साथ
जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल श्री जगमोहन के साथ
९.११.०८
डॉ भाई महावीर (पूर्व राज्यपाल मध्य प्रदेश ) के साथ

मोहयाल-दिवस ९.११.०८
मोहयाल-दिवस ९.१२.२००८
अ ल

Saturday 6 December 2008

मारा गया एक खास / * अशोक लव


वह जानता था
वह मारा जाएगा
इसलिए चिंतित था ।
उसने दरवाज़ों- खिड़कियों को बुलेट-प्रूफ़ कराया
उसने घर के कोने- कोने को बुलेट- प्रूफ़ कराया
उसने गृह - मंत्री को पत्र लिखे
उसने प्रधानमंत्री को पत्र लिखे ,
उसे सरकार ने सुरक्षा - कवच पहनाया।
उसे कमांडो मिले
उसे पुलिसकर्मी मिले
उसे बुलेट-प्रूफ़ गाड़ियां मिलीं ,
क्योंकि वह वी आई पी था
खासमखास था-
आम नहीं ,
फिर भी
वह दहशत में था।
वह घर में होता तो-
कमांडो आसपास मंडराते
वह बहार निकलता तो-
कमांडो आसपास मंडराते
वह जहाँ-जहाँ जाता
उसकी गाड़ी के आगे-पीछे गाडियां चलतीं।
वह जन- प्रतिनिधि था
पर जन से बचता फिरता था ,
वह समाजसेवी था
पर समाज से अलग रहता था,
वह राजनेता था
इसलिए लोगों को खूब बरगलाता था।
वह भाषण देता था तो-
उसकी टाँगें कांपती थीं
क्योंकि वह जनता था
किसी भी कोने से गोलियों की बौछार हो जाएगी
किसी भी कोने से बम फेंकें जाएँगें
वह जानता था
वह निशाने पर था।
वह चिंतित था क्योंकि उसे
व्यवस्था के खोखलेपन का पता था
वह व्यवस्था का अंग था
इसलिए सत्य जानता था
वह दूसरों को भ्रमित कर सकता था
स्वयं को नहीं।
एक दिन वही हुआ
वह मारा गया
कमांडो मरे गए
पुलिसकर्मी मारे गए
बुलेटप्रूफ गाडियां उड़ गईं
कोई भी उसे बचा न सका।
झंडे झुक गए
सरकारी स्कूलों में छुट्टी हो गई
विद्यार्थी खुश हुए
अध्यापक- अध्यापिकाएँ खुश हो गए
श्रधांजलि सभाओं में प्रशंसाओं के पुल बाँधे गए
टी वी चैनलों पर दिन भर
चटकारे ले- लेकर खबरें प्रसारित होती रहीं ।
मारनेवाले मारना जानते हैं
वे जिसे चाहते हैं
मार डालते हैं
क्योंकि वे व्यवस्था की कमज़ोरियाँ जानते हैं ।
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पुस्तक-लडकियां छूना चाहती हैं आसमान
*सर्वाधिकार सुरक्षित

Friday 5 December 2008

मारा गया एक और / * अशोक लव

वह जानता था , वह मारा जाएगा
फिर भी निश्चिंत था।
उसने न दरवाज़े बंद किए
न खिड़कियों पर चिटकनियाँ लगाईं
न अख़बारों में बयान छपवाया
न पुलिस - स्टेशन जाकर सुरक्षा माँगी
न सरकार के पास गया
न राष्ट्रपति को पत्र लिखा
न प्रधानमंत्री को।
वह रोजाना की तरह उठा
काम पर गया
हत्यारों ने उसे
बीच चौराहे गोलियों से भून दिया।
वह जानता था जब गोलियाँ चलेगीं
लोग अपने घरों में घुस जाएँगे
वह एक - एक दरवाज़े तक जाएगा
लोग उसके मुँह पर दरवाज़ा बंद कर देंगे
हत्यारे उसे घसीटकर चौराहे तक ले जाएँगे
और गोलियों से छलनी- छलनी कर देंगे।
वही हुआ
और उसी-उसी तरह हुआ
जैसा-जैसा उसने सोचा था
और वह मारा गया
क्योंकि वह जान गया था
पुलिस , फौज, सरकार , लोग
कोई उसे नहीं बचा सकते
उनके लिए आम आदमी का जीना - मरना
निरर्थक होता है।

न झंडे झुके
न शोक सभाएँ हुईं
बस इतनी - सी ख़बर छपी
एक और मारा गया।
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@ सर्वाधिकार सुरक्षित
पुस्तक-लड़कियां छूना चाहती हैं आसमान

Thursday 4 December 2008

बन्दूक थामे हाथ / * अशोक लव






जब हाथों में बन्दूक आ जाती है
तब नहीं सुनाई देतीं
गाती चिड़ियाओं की मधुर ध्वनि
उड़ते पक्षियों के पंखों का शोर
मौत को पसारने आए
भूल जाते हैं
अपने इन्सान होने का वजूद।
यही बंदूकें कर देती हैं
उन्हें भी छलनी - छलनी
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*२६.११.२००८ मुंबई में आतंकवादी घटना
@सर्वाधिकार सुरक्षित

Tuesday 2 December 2008

कंधे पर मानवता / * अशोक लव


घायल भारत
उसका कुछ नहीं लगता था
बस इतना रिश्ता था -
जब गोलियां चलीं तब
वह बच गया
और भारत के माथे को चीरती गोली
खून बहाती निकल गई ,
उसने उठा लिया
कंधे पर
भारत को
और दौड़ पड़ा अस्पताल की ओर।
दनदनाती गोलियों की
बौछारों की परवाह किए बिना
वह दौड़ता चला गया
उसे नहीं याद आई पत्नी
उसे नहीं याद आए बच्चे
उसने नहीं पूछा भारत से उसके प्रान्त का नाम
उसने नहीं पूछा भारत का मज़हब
उसने अल्लाह से यही दुआ की
बस बच जाए उसके कंधे का देशवासी।
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*२६.११.२००८ ( मुंबई में आतंक )
@सर्वाधिकार सुरक्षित

Monday 1 December 2008

अपाहिज शब्द / * अशोक लव

कई बार
शब्द कुछ नहीं कह पाते ,
वेदना जब असहनीय हो जाती है
भावनाएँ जब गोलियों से छलनी-छलनी हो जाती हैं
चारों ओर बस खून ही खून बहता दिखता है
तब स्तब्ध मन
भावनाहीन
सुन्न -सा ताकता रह जाता है
शब्द कुछ नहीं कह पाते
देखते हुए भी नहीं देखती
कुछ भी आँखें
बस एक शून्य तैरता है आँखों में
अपाहिज हो जाते हैं शब्द
कुछ नहीं कह पाते हैं शब्द।
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* २६.११.२००८ (मुंबई में आतंक )
*सर्वाधिकार सुरक्षित

Friday 28 November 2008

देह - दीपोत्सव / * अशोक लव

कंपकंपाती देह के स्पंदनों ने
भर दिए अधरों में प्रकम्पन
झिलमिला उठा आकाश
महक उठी धरती।
बादलों में चमक गई
विद्युती तरंगें
चुंधिया गई धरती
चुंधिया गया आकाश।
उतर आया प्रकाश - पुंज
जगमगा गया मन - आँगन
देह ने मनाया दीपोत्सव।
पाकर स्पर्श
उमंगित लहरों का
खिल उठे कोने- कोने में
गुलाब।
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*सर्वाधिकार सुरक्षित (पुस्तक - लड़कियां छूना चाहती हैं आसमान )

विवश वृक्ष / * अशोक लव


नदी की लहरों ने
अपने स्पर्शों से
किनारे खड़े वृक्ष में भर दिए
प्राण ,
पुनर्जीवित हो उठा वृक्ष
हरे हो गए पत्ते
चहकने लगीं टहनियां।

लहरों की प्रतीक्षा में
अपलक निहारता है दूर-दूर तक
मौन तपस्वी - सा ,
संबल बनी नदी
बदल न ले मार्ग अपना
सोच-सोच
कांप - कांप जाता है वृक्ष।

उछलती कूदती आती हैं नदी की लहरें
छूकर भाग जाती हैं नदी की लहरें
वृक्ष भी चल पाता
तो , चलता दूर तक नदी के संग
विवश वृक्ष केवल सुनता रहता है
लौटती नदी की पदचापें ।
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*सर्वाधिकार सुरक्षित (पुस्तक-लड़कियाँ छूना चाहती हैं आसमान )

Saturday 22 November 2008

झिलमिलाती रोशनी / * अशोक लव

मई की गरमाती रात में
युकिलिप्ट्स के लंबे वृक्षों पर
निस्पंद पत्ते
मौन हैं।
शहर में छाया है घुप्प अँधेरा
बहुमंजिले भवन की छत से
दूर दिख रही है टिमटिमाती
रोशनी की लकीर।
उदासियों के सागर में
झीनी - झीनी झिलमिलाती
तुम्हारी देह के समान
मन में उतार जाती है
टिमटिमाती रोशनी की लकीर।
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पुस्तक - लडकियां छूना चाहती हैं आसमान ( प्रेम खंड )
@सर्वाधिकार सुरक्षित

Thursday 20 November 2008

लड़कियां छूना चाहती हैं आसमान / * अशोक लव




लड़कियाँ छूना चाहती हैं आसमान
परन्तु उनके पंखों पर बाँध दिए गए हैं
परम्पराओं के
पत्थर ताकि वे उड़ान न भर सकें
और कहीं छू न लें आसमान।

लड़कियों की छोटी - छोटी ऑंखें
देखती हैं बड़े-बड़े स्वप्न
वे देखती हैं आसमान को ,
आँखों ही आँखों में
नापती हैं उसकी ऊंचाइओं को।

जन्म लेते ही
परिवार में जगह बनने के लिए
हो जाता है शुरू उनका संघर्ष
और होती जाती हैं ज्यों-ज्यों
बड़ी उनके संघर्षों का संसार बढ़ता जाता है।

गाँवों की लड़कियाँ
कस्बों-तहसीलों की लड़कियाँ
नगरों-महानगरों की लड़कियां
लडकियां तो लड़कियाँ ही होती हैं
उनके लिए जंजीरों के नाप
एक जैसे ही होते हैं।


लड़कियाँ पुरुषों की मांद में घुसकर
उन्हें ललकारना चाहती हैं
वे उन्हें अंगड़ाई लेते समय से
परिचित कराना चाहती हैं।

पुरुष उनके हर कदम के
आगे खींच देते हैं लक्ष्मण-रेखाएं
लड़कियाँ जान गई हैं -
पुरुषों के रावणत्व को
इसलिए वे
अपाहिज बन नहीं रहना चाहतीं बंदी
लक्ष्मण - रेखाओं में ,
वे उन समस्त क्षेत्रों के चक्रव्यूहों को भेदना
सीख रही हैं
जिनके रहस्य समेटरखे थे पुरुषों ने।

वे गाँवों की गलियों से लेकर
संसद के गलियारों तक की यात्रा करने लगी हैं
उनके हृदयों में लहराने लगा है
समुद्र का उत्साह
अंधडों की गति से
वे मार्ग की बाधाओं को उडाने में हैं सक्षम।

वे आगे बढ़ना चाहती हैं
इसलिए पढ़ना चाहती हैं
गांवों की गलियों से निकल
स्कूलों की ओर जाती
लड़कियों की कतारों की कतारें
सड़कों पर
साइकिलों की घंटियाँ बजाती,
बसों में बैठी
लड़कियों की कतारों की कतारें
लिख रही हैं
नया इतिहास।

लोकल ट्रेनों -बसों से
कालेजों - दफ्तरों की ओर जाती लडकियां
समय के पंखों पर सवार होकर
बढ़ रही हैं
छूने आसमान।

उन्होंने सीख लिया है -
पुरूषपक्षीय परम्पराओं के चिथड़े -चिथड़े
उन्होंने कर लिया है निश्चय
बदलने का अर्थों को ,
उन ग्रंथों में रचित
लड़कियों विरोधी गीतों का
जिन्हें रचा था पुरुषों ने
अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए।

लड़कियाँ
अपने रक्त से लिख रही हैं
नए गीत
वे पसीने की स्याही में डुबाकर देहें
रच रही हैं
नए ग्रंथ।

वे खूब नाच चुकी हैं

पुरुषों के हाथों की कठपुतलियाँ बनकर ,

पुरुषों ने कहा था --लेटो

वे लेट जाती थीं ,

पुरुषों ने कहा था --उठो

वे उठ जाती थीं,

पुरुषों ने कहा था - झूमो

वे झूम जाती थीं।

अब लड़कियों ने थाम लिए हैं

कठपुतलियाँ नचाते ,

पुरुषों के हाथ

वे अब उनके इशारों पर

न लेटती हैं

न उठती हैं

न घूमती हैं

न झूमती हैं

वे पुरुषों के एकाधिकार के तमाम क्षेत्रों में

कराने लगी हैं प्रवेश

लहराने लगी हैं उन तमाम क्षेत्रों में

अपनी सफलताओं के ध्वज ,

गाँवों - कस्बों, नगरों - महानगरों की लड़कियों का

यही है अरमान

वे अब छू ही लेंगीं आसमान।

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* पुस्तक - लड़कियां छूना चाहती हैं आसमान

@सर्वाधिकार सुरक्षित







Tuesday 18 November 2008

कोई नहीं है आसपास / * अशोक लव


कोई नहीं है आसपास
फिर भी हवाओं में है
किसी की सुगंध
महका रही है भीतर तक
कर रही है उल्लसित।

वृक्षों के पत्तों में प्रकम्पित
चूड़ियों की खनखनाहट
आकाश में टंगा सूर्य
माथे की बिंदी - सा
चमक रहा है।

जनवरी की कोसी-कोसी धूप
किसी की निकटता -सी
लग रही है सुखद ।

दूरियों की दीवार के पार
है कोई
और यहाँ हैं -
नदी से नहाकर निकली
हवाओं का गीलापन लिए
निकटता के क्षणों के अहसास।

किसी के संग न होने पर भी
आ रही है
हवा के प्रत्येक झोंके के साथ
सुपरिचित महक ।
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* पुस्तक _ लड़कियां छूना चाहती है आसमान ( प्रेम खंड )

तुम्हारा जादुई आवरण / * अशोक लव


मेरी स्मृति पर
निरंतर दस्तक देते तुम
बाँध लेते हो मेरी अस्मिता को।

जुड़ जाती हूँ तुमसे
जैसे नदी सागर से
एक साथ -
जादुई आवरण हो जैसे अभिलाषाओं का
अंतहीन
अनदेखा
अछूता।

एक स्पर्श
छू जाए कुआरी साध को
सुहाग चुनरी की
झिलमिलाती आभा से ।

एक मन
उद्वेलित तुमसे
चिर पिपासित चातक
हेरे नूतन घन ।

एक उन्माद
जैसे व्याकुल हो नदी
अपने कूल तोड़ने को ,
नई पहचान बनने को ।


भीषण गर्मी में
तारकोल पिघलाती सड़क को
कर दे परिवर्तित
क्षण भर में
कोमल मखमली दूर्वा में
तुम्हारे अस्तित्व की महक ,
और सजा दे उन स्वप्नों को
जो हैं केवल मेरे अपने।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
* पुस्तक - लड़कियां छूना चाहती हैं आसमान ( प्रेम खंड )

Saturday 15 November 2008

तुम्हारे आगमन के पश्चात् / * अशोक लव




। । एक । ।
यूँ ही रख दिया
चांदनी बयार ने अपना हाथ
अमलतास के कन्धों पर
पीले फूलों से भर गया अमलतास
महक उठा चंदन- सा
कल तक था जो उदास
आज खिल उठा ।

। । दो । ।
अंधेरे जंगलों में
रूखा- रूखा खड़ा था बांस
बढ़े दो हाथ
तराशा - संवारा
अधरों से लगाया
बज उठा बांस।

। । तीन । ।
पुस्तकों के पृष्ठों में
बंद थे शब्द
कोमल उँगलियों ने खोल दी जंजीरें
पुस्तकों से निकल आए शब्द
अधरों ने गुनगुनाये
गीत बन गूँज उठे शब्द।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
पुस्तक- लडकियां छूना चाहती हैं आसमान ( प्रेम खंड )

आज पहली बार / * अशोक लव




ओ मलयानिल !
तुम आए आज
आकाश - गंगा में नहा गई
चंद्र की पहली किरण
गालों पर गमक उठे
सुगन्धित गुलाब।
स्पन्दनशील हुआ जीवन
बालों में महक रही है
कच्चे सेबों की खुशबू।
क्या तुमने भी अनुभव की है
कस्तूरी-गंध ?
मन
स्रोतस्विनी -सा
अपनत्व से जुड़ा
समीपता से आप्लावित
आज पहली बार
जैसे हुआ हो अवतरित ।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
* पुस्तक- " लड़कियां छूना चाहती हैं आसमान " ( प्रेम खंड )

लहरों के कामना दीप / * अशोक लव



लहरों को सौंप दिया है कामना - दीप
जहाँ चाहें ले जाएँ
उन्हीं पर आश्रित है अब तो
कामना - दीप का अस्तित्व।
हथेलियों में रखकर सौंपा था
लहरों को कामना - दीप
बहाकर ले जाने के लिए अपने संग
मंद-मंद हिचकोले खाता
बढ़ता जाता है लहरों के संग ।
कामना - दीप का भविष्य होता है
लहरों के हाथ
ज़रा - सा प्रवाह तेज़ होते ही
डोलने लगता है
और अंततः समां जाता है लहरों में।
कामना-दीप -सा समां जाना चाहता हूँ
सदा-सदा के लिए
तुम्हारे हृदय की स्नेहिल लहरों में ।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
* पुस्तक - " लडकियां छूना चाहती हैं आसमान " ( प्रेम खंड )

देवालय की घंटियाँ / * अशोक लव


नील नभ
छा गए श्यामल मेघ
नर्तकी के घुंघरुओं - सी
लगी बूँदें बजने
हुआ आरंभ जल-नृत्य।
स्मृतियों के आकाश पर
लगे घुँघरू बजने
हुआ था यूँ ही जल-नृत्य
कौंधी थी चपला
तुम्हारा रूप बन
प्रकाशमय हो गया था जीवन
हुआ शंखनाद जैसे
बज उठी घंटियाँ देवालय की
हुई थी पूरी साध
अतृप्त मन की ।
चल पड़ा करने उद्यापन मन
हुए थे फलीभूत व्रत
प्रश्नों के गाँव छुट गए थे पीछे
बिछ गई थी दंडवत देह
देह सम्मुख
अंजुरी में गिर गया था
आशीष पुष्प
हृदय में भर गई थी गंध
हुई चिर साध पूरी
जल - नृत्य किया था मन ने उस दिन।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
* " लड़कियाँ छूना चाहती हैं आसमान " पुस्तक ( प्रेम खंड )

Monday 10 November 2008

तुम / * अशोक लव


तुम
ज्यों
अन्तिम पहर का स्वप्न
ज्यों
कमल पंखुडी पर तुहिन - कण
ज्यों
वर्षा धुले आकाश पर इन्द्रधनुष
ज्यों
तितलियों के पंखों पर अंकित गीत
ज्यों
जल-तरंगो पर रश्मियों की अठखेलियाँ
ज्यों
मानसरोवर में उतरना हंसों का
ज्यों
गंगा का भागीरथ हेतु अवतरण
ज्यों
शुष्क चट्टानों पर रुई के फाहों सा हिमपात
ज्यों
भोज - पत्रों पर अंकित ऋचाएं
ज्यों
साधक मन में आलोकित दिव्य - प्रकाश।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
* पुस्तक - अनुभूतियों की आहटें

चल बिटिया चल / * अशोक लव



नन्हीं बिटिया
उंगली छुड़ा
काली नंगी सड़क पर
टेढ़े-सीधे पग रखती
भाग खड़ी हुई
पकड़ पाता उसे
वह तब तक गिर गई थी
छिल गए थे उसके घुटने।
उसे उठाया
घुटने सहलाये
ले चला फिर घुमाने
उंगली पकड़ ।
छुड़ा ली उसने
उंगली
छिले घुटनों की पीड़ा भूल
दौड़ गई वह ।
इस बार नहीं दौड़ा
उसके पीछे
उसे जाने दिया
बिना उंगली पकड़े चलने का
अपना ही सुख होता है।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
पुस्तक - अनुभूतियों की आहटें (१९९७)

ठूंठ / * अशोक लव




मौसम बदला है
ठूंठ देखने लगा है
सपने वसंत के ,
सपने हरियाली के
भूल गया है
भीतर तक सूख चुके भावों में
हरियाली नहीं उगती
ठूंठ के लिए
सभी मौसम
एक से होते हैं।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
"अनुभूतियों की आहटें" से

Friday 7 November 2008

शब्द - सामर्थ्य / * अशोक लव




मेरे पास शब्द हैं
लिखते हैं शब्द
नंगे पर्वतों पर
बर्फ़ के गीत ।
शब्द तैरते हैं
सागर के अंतर्मन के स्पंदनों के संग
शब्द पढ़ आते हैं
नयनों में तैरते प्रेम , स्वप्न ।
यही शब्द जाते हैं डूब जब
तेजाब में
तड़क जाती हैं चट्टानी व्यवस्थाएं ।
मत छीनो मुझसे
आकाश, धरती,पवन
गाने दो मुझे
शब्दों से रचे
मिट्टी के गीत।
_______________________
मेरा कविता संग्रह - अनुभूतियों की आहटें

आसमान पाने के लिए / * अशोक लव


फैली उंगलियाँ
नहीं बाँध पातीं हथेलियों में
हवाएं
बहुत दूर रहता है उनसे
आसमान ,
जुडकर उंगलियाँ
ले लेती हैं मुट्ठी का रूप
बाँध लेती है हवाएं
पा लेती हैं अपने हिस्से का
आसमान।
________________
कविता-संग्रह " अनुभूतियों की आहटें "
वर्ष -१९९७

विषैली हवा / * अशोक लव




न जाने
किस अँधेरी गुफ़ा से
निकल आई है
विष बुझे बाण-सी हवा
न जाने कैसा विष उतार दिया है
इसने
हर कोई सौंप बना
फुफकार रहा है।
---------------------------
* पुस्तक- अनुभूतियों की आहटें
प्रकाशन-1997

" लड़की " कविता पर आशावरी दास

सर नमस्कार
..यह कविता बचपन की याद दिलाती है।
आपको याद नही होगा पर यह कविता आप स्कूल में मुझे , और नेहा नंदा को कभी- कभी सुनाते थे
बहुत अच्छी है ।
....हमेशा मन करता है की अगर प्रांशु यहाँ नही आया तो जब में दिल्ली मैं रहूंगी तो हफ्ते में कमसे कम एक दिन आप मेरे घर पे खाने पे आयेंगे और आपको बिना लहसुन और प्याज़ का खाना खिलाऊँगी । --आशावरी दास
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
*आशावरी दास मेरी उन छात्राओं में से है जो बेटिओं की तरह आज भी हालचाल पूछती है ।सुख-दुःख बांटती है। फ्लोरिडा (यू एस ) के विश्वविद्यालय में पढ़ाती है।
वर्षों पूर्व जिन्हें पढ़ाया था , आज भी उनसे संपर्क दर्शाता है कि सामाजिक मूल्य आज भी जीवित हैं। मेरा व्यक्तिगत अनुभव यही है कि मूल्यों का चाहे कितना ह्रास हो जाए , फिर भी मूल्यों को जिंदा रखनेवाले लोग हमेशा बने रहते हैं।
-7.11.2008

Thursday 6 November 2008

लड़की / * अशोक लव



झट बड़ी हो जाती है लड़की
और ताड़ के पेड़ -सी लम्बी दिखने लगती
उसकी में तैरने लगते हैं
वसंत के रंग- बिरंगे सपने
वह हवा पर तैर
घूम आती है
गली- गली , शहर - शहर
कभी छू आती है आकाश
कभी आकाश के पार
चांदी के पेड़ों से तोड़ लाती है
सोने के फल ।
मन नहीं करता उसे सुनाएँ
आग की तपन के गीत
मन नहीं चाहता
उसकी आंखों के रंग-बिरंगे सपने
हो जायें बदरंग ।
हर लड़की को लांघनी होती है दहलीज
और दहलीज के पार का जीवन
सटापू खेलने
गुड्डे - गुड्डियों की शादियाँ रचाने से
अलग होता है।
इसलिए आवश्यक हो जाता है
हर लड़की सहती जाए आग की तपन
सटापू खेलने के संग
ताकि पार कराने से पूर्व दहलीज
वह तप चुकी हो
और उसकी आंखों में नहीं तैरें केवल
वसंत के सपने।
------------------------------
पुस्तक - अनुभूतियों की आहटें
प्रकाशन - 1997

Wednesday 5 November 2008

चलो भूल जाएँ / * अशोक लव


किस- किसकी
किस-किस बात को याद करें
चलो सब भूल जाएँ ,
न मन में चुभन होगी
न मन में घुटन होगी
अच्छा है कुछ याद न कर पाएँ
चलो सब भूल जाएँ ।
*५ नवम्बर २००८

मेरे विद्यार्थी की मेल : अतीत की यादें

Dear Sir,
I sent this poetry out to many of my school friends and here is what I felt about it...
I got many calls from friends in India with questions...
I hope you like my expressions of the times I spent in class as a student and how I felt at that point of time..I am sure many other students also shared similar thoughts.. Bachpana tha sir, kya karein ...

Regards,
Sandip Bhatia..--- On Sun, 11/2/08, Sunny B wrote:
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From: Sunny B Subject: SQUIRRELS IN TAFS!!!To: "aabha k singh" , "ABHI GHITE" , "ajay dhawan" , "amitabh gupta" , "Anil Bhatia" , "anil kr singh" , "anirudh takle" , "Anjali Kumar Nayyar" , "anuj kaura" , "ashish gulati" , "ASHA RISHI KAPOOR" , "bikram yadav" , "danny pawa" , "Dhananjay Bharat" , "dharma thapa" , "Gauri Tipnis" , "gautam sarna" , hemant_krishna@yahoo.com, hirengbam@yahoo.co.in, "hemant chaturvedi" , innocent_stud@hotmail.com, "jyotika kumar" , "kulvinder s kapoor" , kavitagra@gmail.com, "Anil Kr Singh" , "kanishk" , "kawal makhija" , labeers1@yahoo.com, "manish bhatia" , "Mohan Charan" , "Montri bhatia" , "neilnyjar@aol.com" , nupur.bhargava@intl.pepsi.com, "nagendra sharman" , "Nandita" , "NICK PAWA" , "nikhilesh" , "niti bhatia" , pallavi@lawyer.com, privatearun@yahoo.com, puneetvij@yahoo.com, "pankaj" , "pankaj mehra" , "renuka sharma" , "rajinder chadha" , raghavsood@yahoo.com, rajanl@rogers.com, rajvirtoor@hotmail.com, rakesh@seagull-adhesives.com, ritikaranjan1@hotmail.com, "rachna kunwar" , "rajan venkitachalam" , "roy" , "rohit barman" , shantisapam@yahoo.co.in, "sameer saxena" , "sanjay mohla" , "sanjay ratan" , "sanjay suri" , "seema singh" , "shard ramdas" , "simmi bhatia" , "Sunil Makhijani" , "susheel sirivastav" , "TARUN DALAYA" , "tito ghosh" , "Vipul TAFS Bhutani" , "v malik" , "vikas kakkar" , "Amrish Bhatia" Date: Sunday, November 2, 2008, 12:09 PM
Dear Friends,For the recent few months I have been in constant interaction with my school friends and some teachers too and in one of those i met up with up Mr. Ashok Kumar Lav who taught me Hindi for a good 3 years. Here below is one of the latest poems in hindi written by our teacher Mr. Ashok Kumar Lav who taught hindi in The Air Force School. Today he is a very renowned poet and has achieved high esteem for himself and made our school and all of us his students very proud of him and also ourselves to have been his students. I am very lucky to have received this from him and want to share this with all my friends. Hope you all like it? I am sure you will.... I did!!
गिलहरियाँ / *अशोक लव
नन्हीं गिलहरियाँ pedon से उतरकर आ जाती हैं नीचे / उठा लेती हैं छोटी- छोटी उँगलियों से बिखरे दाने।/ टुक-टुक काटती खाती हैं/ टुकर-टुकर तकती हैं ,/लजा जाती है उनकी चंचलता के /कौंधती बिजलियाँ झाडियों में दुबकी बिल्ली/ झट से झपटती है /चट से चढ़ जाती है
हैं / पेड़ों पर गिलहरियाँ /खूब चिढाती हैं /; खिसियाई बिल्ली गर्दन नीचे किए/ खिसक जाती //की ओर बढ़ा देता हूँ मित्रता का हाथ ,/देना चाहता हूँ उढेल स्नेह ,/बहुत भली होती हैं /
पास आकर भाग जाती हैं गिलहरियाँ।
blog_(अशोक लव) ___________________________________________________________________
http://www.ashoklavmohayal.blogspot.com/
I did because of the deapth in it!! This poem took me back to my childhood in अरावली lodge
e where he looked after me and it reminded me of the school days when he used to teach us while walking up and down the class room reciting a poem from the book and explaining the meaning. And we used to sit there listening to him and sometime casually looking out side the windows gazing far beyond the trees at the slow moving traffic on the Dhaula Kuan road going towards the Gopinath Bazaar and also wondering when the class was going to finish while looking at the squirrels running around with so much freedom on top of the trees...and then suddenly hearing someone calling out my name loud "Sandip, kahaan dekh rahe hai, kuch phar likh liya karo exams mein fail ho jayoge nahin toh tumhare nanaji bahut naraaz ho jayeinge." Then I broke my gaze from those squirrels and looked at him in silence and again wondered "maine aisa kya paap kar diya hai yaar jo itna gussa ho rahe ho." Those were the silly days when we didn't realize the value of all this because it was sheer fun and entertainment that we looked for in the classes and beyond that......Now you see where this short poem of his took me in memory lane...at least 28 yrs back when I was in class 8th in 1980. WOW!!! "Mann bhi kitna chanchal hota hai yaaroan, yeh na left na right dekhta hai, bass apni hi rahoan mein nikal jaata hai aur kahaan tak challe jaatta hai. Kyuon dostoan mujhe lagta hai maine aap sab ki kuch yaadein taaza kar di hain. I am sure many of you have been through this and know exactly what went by in my mind??" Love and regards,Sandip BhatiaP।S Please feel free to go and vist his blog to read more of these poems....and know more about him...
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They are wonderful....Sunny Bhai...+66816275407Bangkok..

अपर्णा चतुर्वेदी प्रीता का कहानी-संग्रह " आस-पास "/ * अशोक लव

आज ही डाक से डॉ अपर्णा चतुर्वेदी प्रीता का कहानी -संग्रह मिला है। उन्हें बधाई! लगभग ३० वर्षों से उनसे सम्पर्क बना हुआ है । पुस्तक पढ़कर विस्तृत चर्चा करना आवश्यक है। इसलिए आज इतना ही।* ५ नवम्बर २००८
<> डॉ अपर्णा चतुर्वेदी प्रीता : ऐ -५११, सिद्धार्थ नगर, निकट जवाहर सर्किल, जे एल एन मार्ग ,जयपुर-३०२०१७
(एम) ९३१४८८४९६१

एन एल गोसाईं का कविता संग्रह- "बहुत दिनों के बाद"/ *अशोक लव

सार्थक प्रयास के वरिष्ठ उपाध्यक्ष एन एल गोसाईं का कविता संग्रह इसी वर्ष प्रकाशित हुआ है। इसमें ५०गीत संग्रहित हैं। स्वर्गीया पत्नी श्रीमती सावित्री गोसाईं को समर्पित इस संग्रह में आचार्य बलदेव राज शांत ,पारसनाथ बुलचंदानी , डॉ उपकार सागर भारद्वाज और प्रकाश लखानी के इन कविताओं पर लेख संकलित हैं।
विभिन्न भावों की यह कवितायें कवि की जीवन और परिवेश के प्रति गहरी संवेदनशीलता दर्शाती हैं।
कवि के अनुसार- " ये कवितायें पुरवाई के झोंके के समान शीतल, मन्दिर में आरती के दीये की भांति मनभावनी , शिशु की किलकारी के समान मोहक तथा प्यार की भावनाओं से परिपूरित लगें तो मेरे प्रति अपनापन दर्शाने के लिए ........."
गीत आनंदमय हैं ।
संपर्क : एन एल गोसाईं , ५बी / १८ ऐ ,एन आई टी , फरीदाबाद -१२१००१( मो ) 9213899770

नई मिली पुस्तक - तन मन वतन के नाम / *अशोक लव

19 अक्टूबर 2008 को फरीदाबाद के स्थापना - दिवस पर "सार्थक प्रयास " द्वारा आयोजित कार्यक्रम में अजय अज्ञात ने कविता पाठ किया था तो लगा था कि इस कवि में विशिष्टता है। पहली भेंट थी। कार्यक्रम के पश्चात बातचीत भी हुई। श्री एन एल गोसाईं ने कार्यक्रम के फोटोग्राफ्स भेजे और साथ में अजय "अज्ञात "का कविता -संग्रह भी भेजा। इसमें 70 गीत संग्रहित हैं। आचार्य बलदेव राज 'शांत' , एन एल गोसाईं, नरेन्द्र 'विवेक' के कविताओं पर लेख हैं। जैसा नाम से ही पता चलता है इसमें देश-प्रेम के गीत अधिक हैं। अन्य भावों के गीत भी
हैं।

* अजय अज्ञात , 37 / Sector -31 , Faridabad (Haryana)

Tuesday 4 November 2008

सुदर्शन रत्नाकर का कहानी- संग्रह- " नहीं,यह नहीं होगा "/ * अशोक लव

१९ अक्टूबर को फरीदाबाद शहर का स्थापना-दिवस था । 'सार्थक प्रयास ' संस्था की ओर से आयोजित कार्यक्रम में मुख्य - अतिथि के रूप में भाग लिया था। कवि- गोष्ठी भी आयोजित हुई थी।
श्रीमती सुदर्शन रत्नाकर ने अपना कहानी-संग्रह ' नहीं, यह नहीं होगा ' भेंट किया। पूनो, प्रभात किरण, झूठे बंधन,नव निर्माण, अनंत साधना, दर्द के घेरे,दादा की सिम्मी, शेष दो पत्र, गहराते साए, नया सूट, आदर्शवादिता, अन्तर,नहीं यह नहीं होगा और विकृत आकृतियाँ --कहानियाँ इसमें संकलित हैं। भूमिका मदन शर्मा 'राकेश'(३१७२,/४६ सी , चंडीगढ़ ) ने लिखी है।
श्रीमती सुदर्शन के अनुसार "इस कहानी - संग्रह में मेरे साहित्यिक जीवन के शैशव कल की कहानियाँ हैं। ....अधिकतर कहानियाँ नारी प्रधान हैं जिनमें नारी मन की पीड़ा है.,त्याग है। "
सभी कहानियाँ प्रभावित करती हैं।
*श्रीमती सुदर्शन रत्नाकर , ई -२९,नेहरू ग्राउंड,फरीदाबाद- 421001

Friday 31 October 2008

गिलहरियाँ / *अशोक लव


नन्हीं गिलहरियाँ
पेड़ों से उतरकर
आ जाती हैं नीचे ,
उठा लेती हैं
छोटी- छोटी उँगलियों से बिखरे दाने।
टुक-टुक काटती खाती हैं
टुकर-टुकर तकती हैं ,
लजा जाती है
उनकी चंचलता के समक्ष
कौंधती बिजलियाँ ।
झाडियों में दुबकी बिल्ली
झट से झपटती है
चट से चढ़ जाती है पेड़ों पर
गिलहरियाँ
खूब चिढाती हैं ;
खिसियाई बिल्ली
गर्दन नीचे किए
खिसक जाती है।
गिलहरियों की ओर बढ़ा देता हूँ
मित्रता का हाथ ,
देना चाहता हूँ उढेल
स्नेह ,
बहुत भली होती हैं गिलहरियाँ
पास आकर भाग जाती हैं गिलहरियाँ।


Monday 27 October 2008

शुभकामनायें

मंगलमय दीपावली
शुभ हो
जीवन में
सुख ही सुख हो
यही है कामना
दीपोत्सव पर
हर पल आपका
उत्सव ही उत्सव हो।

* अशोक लव

Thursday 23 October 2008

नव आगमन *अशोक लव






गूंजी एक किलकारी
गर्भाशय से निकल
ताकने लगा नवजात शिशु
छत, दीवारें, मानव देहें।

प्रसव पीड़ा भूल
मुस्करा उठी माँ
सजीव हो उठे
पिता के स्वप्न।

बंधी संबंधों की नई डोर
तीन प्राणियों के मध्य ,
हुई पूर्णता
नारी और पुरुष के वैवाहिक संबंधों की।

नन्हें शिशु के संग जागी
आशाएं ।

पुनः तैरने लगे
नारी और पुरुष के मध्य
नए - नए स्वप्न
नवजात शिशु को लेकर।
-------------------------------------------
( * लड़कियां छूना चाहती हैं आसमान, पुस्तक से )
*सर्वाधिकार सुरक्षित



Wednesday 22 October 2008

विनायक - २००८ स्मारिका

मेला गणेश चौथ ,चंदौसी के अवसर पर प्रकाशित यह स्मारिका का ३९ वाँ अंक है।
* प्रधान संपादक - प्रजीत कुमार 'लालू' , *संपादक - अमित के एस वार्ष्णेय *सह-संपादक - रवेन्द्र 'रूपी'
*गोपाल भवन, २५-देवी स्ट्रीट,चंदौसी-२०२४१२ (उ.प्र।)
१६४ पृष्ठों की इस स्मारिका का भव्य प्रकाशन हुआ है। गत लगभग १० वर्षों से इसके साथ लेखक के रूप में जुड़ने का सौभाग्य मिला हुआ है। श्री प्रजीत जिस आदर और स्नेह से रचनाएँ भेजने का अनुरोध करते हैं वैसा बहुत कम देखने के अवसर मिले हैं । चंदौसी में गणेशोत्सव का भव्य और विशाल मेला आयोजित करना और हर वर्ष स्मारिका प्रकाशित करना समर्पित समाजसेवियों के कारन सम्भव होता है। लाखों रुपयों का खर्च , प्रबंधन करना और विशाल समारोह आयोजित करना सहज नहीं है।
समाज को संस्कारवान बनाने में ऐसे लोगों की जितनी प्रशंसा की जाए कम है।
श्री भूपाल विनायक गणेश मन्दिर ट्रस्ट के समस्त पदाधिकारियों और सदस्यों को बधाई।

Thursday 16 October 2008

नई टहनी *


मधुमक्खियाँ गुनगुनाती हैं
सुनाती हैं फूलों को
मधुर गीत ,
पाती हैं फूलों से
गंध , रस
सहेजती हैं इन्हें
नन्हीं -नन्हीं स्निग्थ दूधिया कोठरियों में
जुटी रहती हैं
संवारने में अपना मधुमय संसार।

वे आते हैं
लूटकर ले जाते हैं
मधुमक्खियों के एक-एक दिवस का श्रम
झोंक जाते हैं आंखों में
तेज़ धुआँ।

मधुमक्खियाँ नहीं होतीं हताश
तलाशती हैं नई टहनी
बसाती हैं पुनः
मधुमय संसार।












*अशोक लव (पुस्तक : मधु पराग, अनुभूतियों की
आहटें)

Tuesday 7 October 2008

डॉ आनंद सुमन सिंह (३)

मैं हिंदू क्यों बना पुस्तक में डॉ आनंद सुमन सिंह ने विस्तृत रूप में अपने हिन्दू धर्म में लौटने के कारण दिए हैं । प्रत्येक सहृदय पाठक को यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए।
२००८ का संस्करण नए तथ्यों के साथ प्रकाशित हुआ है.

मैं हिंदू क्यों बना : डॉ आनंद सुमन सिंह (२)

डॉ आनंद सुमन सिंह का हिंदू बनना अचानक नहीं हुआ। वे पब्लिक स्कूल में पढ़े , चिकित्सा-विज्ञान स्नातक थे। वे कट्टर इस्लामी विचार के थे। उनके शब्दों में,"काफी अरसे से मैं वैदिक धर्म के बारे में कुछ पुस्तकें पढ़ रहा था। इसका खास मकसद नहीं था। हिंदुत्व के बारे में जब-तब चर्चा होती रहती थी। एक बार मुझे संघ के रक्षाबंधन कार्यक्रम में मुख्य-अतिथि बनाया गया। मेरे इस्लामी जज़्बात इतने कट्टर थे की उस कार्यक्रम में मुझे प्यार का प्रतीक धागा बाँधा गया तो नफरत से मैंने उसे सबके सामने तोड़ दिया। पिछले वर्ष (१९८०) जनवरी में घर गया तो देखा कि मेरे ७६ वर्षीय पिता ने एक युवा महिला से ब्याह रचा लिया था।"
इससे उनके मन को धक्का लगा था। 30 August 1981 को डॉ आनंद सुमन सिंह ने हिंदू धर्म को अपना लिया।
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*मैं हिंदू क्यों बना , लेखक -डॉ आनंद सुमन सिंह , SARASVATEE PRAKASHAN,MANSAROVAR, 1-B.N. CHHIBBER MARG,DEHRADOON -248001 (UTTRAKHAND)

Saturday 4 October 2008

डॉ आनंद सुमन सिंह :मैं हिंदू क्यों बना

डॉ आनंद सुमन सुमन सिंह की नई पुस्तक " मैं हिंदू क्यों बना " प्रत्येक साहित्य के सुधि पाठक को अवश्य पढ़नी चाहिए। इसके लिए पठन की दृष्टि में संकीर्णता नहीं होनी चाहिए।
पुस्तक मिलने पर इसे पढने की उत्सुकता हुई और १७६ पृष्ठों की पुस्तक ने सप्ताह भर स्वयं में निमग्न रखा। अनेक नए तथ्य उजागर हुए। अभी तक हिन्दुओं का अन्य धर्मों में अनेक कारणों से धर्मांतरण सुना-पढ़ा था। इस्लाम से हिंदू धर्म में आने वाले के विषय में जानने की उत्सुकता तो स्वाभाविक थी।
पुस्तक पर बात करने से पहले डॉ आनंद सुमन सिंह के विषय में बात कर लें। वे देहरादून से "सरस्वती सुमन" पत्रिका प्रकशित करते हैं। हिन्दी की श्रेष्ठ पत्रिका है। मेरी अनेक रचनाएँ इसमें प्रकाशित हुई हैं। राष्ट्रीय स्तर की पत्रिका है। उनके कुशल संपादन की प्रशंसा करनी पडेगी । देश भर के साहित्यकार इसमें छपते हैं।
यही आनंद सुमन सिंह इस्लाम धर्म से हिंदू धर्म में आए हैं।
उन्हीं के शब्दों में _"वैदिक धर्म में दीक्षित होकर मैंने कोई धर्म - परिवर्तन नहीं किया,अपितु सन१७५२ में अपने राजपूत पूर्वजों द्वारा किए गए पाप का प्रायश्चित मात्र किया है। जहाँ तक धर्म परिवर्तन का प्रश्न है मेरी मान्यता यह है कि संसार में मात्र एक ही धर्म है- सत्य सनातन मानव (वैदिक) धर्म। ....जारी

Monday 29 September 2008

गलतफहमी में जीते लोग

कुछ लोग जीते हैं
गलतफहमी में
उन्हें यही लगता है कि
बस वही हैं
और बस वही हैं ,
सूर्य -से -
केन्द्र -बिंदु बने हैं ,
घूमते हैं ग्रहों -से लोग
उनके चारों ओर।
प्रकाश- पुंज
सूर्य - सा कहाँ है उनके पास !
उन्हें बस गलतफहमी है कि वे
सूर्य हैं
क्योंकि उनके पास सत्ता है।
चाटुकारों के चरण-चुम्बनों ने
उनमें रावणत्व जगा दिया है,
वे नहीं जानते कि रावण कहाँ रहा
जो वे रहेंगे ।
उन्हें गलतफहमी में जीते देखकर
मुस्कराते हैं
वास्तविकता को जानने वाले।
काश!
वे उतार पाते सूर्य - सा प्रकाश- पुंज
मन में
तब हो जाते उदार सूर्य- से।


Thursday 25 September 2008

मोहयालों का इतिहास

मोहयाल ब्राहमण योद्धा ब्राहमणों के रूप में प्रसिद्ध हैं । अफगानिस्तान , अविभाजित भारत के पकिस्तान में चले गए अनेक भागों, जम्मू , कश्मीर और अविभाजित पंजाब (पाकिस्तान में चला गया पंजाब, वर्तमान पंजाब ,हिमाचल प्रदेश,हरयाणा,दिल्ली ) में इनका शासन था। मोहयाल रामायण काल में महाराजा दशरथ के कुल-गुरु ऋषि वशिष्ठ , भृगु ऋषि के वंशज योद्धा-ब्राहमण परशुराम ; महाभारत - काल में गुरु द्रोणाचार्य आदि को अपने पूर्वज मानते हैं।
मोहयालों की सात जातियाँ हैं--बाली ( गोत्र पाराशर , ऋषि पराशर के वंशज) ; भीमवाल ( गोत्र कौशल ,कौशल ऋषि के वंशज) ; छिब्बर (गोत्र भृगु /भार्गव ,भृगु ऋषि के वंशज ) ; दत्त (दत्ता) (गोत्र भारद्वाज , भरद्वाज ऋषि के वंशज ) ; लौ (लव) (गोत्र वशिष्ठ,वशिष्ठ ऋषि के वंशज) ; मोहन ( गोत्र कश्यप ,स्त्रक्च्य स्त्रक्य के वंशज ) ; वैद ( वैद्य ) (गोत्र भारद्वाज , धनवंतरी के वंशज ) ।
मोहयालों के इतिहास पर उर्दू और इंगलिश में अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं । हिस्ट्री ऑफ़ दी मुहियाल्स ( लेखक -टी पी रुसेल stracy )

Wednesday 17 September 2008

* नई पुस्तक : डॉ नीना छिब्बर का कविता- संग्रह "आकांक्षा की ओर "

सीधी बातें करती कविताएँ
__________________*अशोक लव
कविताएँ जीवन के अनुभवों की , भावनाओं की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति हैं। मन जितनी कल्पनाएँ कर सकता है , भावनाएं अनुभूतियों को जितनी गहनता से अनुभव करती हैं , कविता के स्वर उतने ही प्रभावशाली बनकर अभिव्यक्त होते हैं। कविता सीधे हृदय से संचरित होती है,हृदय के तारोंकी सुरमय अभिव्यक्ति कविता है। कवि के हृदय के भाव जितने गहन होते हैं , कविता उतनी गहन होती है।
डॉ नीना छिब्बर की कविताओं से गुज़रते समय यही लगा की कवयित्री ने जीवन - यात्रा के क्षण-क्षण जीवन्तता से जिए हैं। अनुभवों को संवेदनाओं के साथ शब्दों के आवरण में लपेटा है। यूँ अनुभव करना,भावनात्मक स्तर पर जीना पूर्णतया भिन्न होता है। कवयित्री ने इनमें सामंजस्य का प्रयास किया है।
" आकांक्षा की ओर " की कविताओं में कवयित्री की भिन्न भावों की कविताएँ संकलित हैं। लेखन से जुड़े उन्हें दशक से अधिक से अधिक हो गया है। प्रकाशन की दिशा में यह उनकी प्रथम कृति है। उनकी लेखन प्रतिभा का परिचय मुझे संपादक के रूप में हुआ था। "मोहयाल मित्र " पत्रिका का संपादन करते दो दशक से अधिक हो गए हैं । इसके लिए उनकी रचनाएँ आने लगीं तो लगा की इस लेखिका / कवयित्री में गाम्भीर्य है। भावों को कलमबद्ध करने की क्षमता है। उनकी अनेक रचनाएँ प्रकाशित कीं। इसी के साथ उनके साथ संपर्क हुआ और संबंधों में पारिवारिकता आती चली गई।
उनकी कविताएँ सहज हैं। एकदमआम बोलचाल की भाषा में लिखी गई हैं। कहीं दुरूहता नहीं है। साहित्यिक मानदंडों के संसार से दूर डॉ नीना छिब्बर जो अनुभव करती हैं उसे सहजता से कविता का रूप देती चली जाती हैं। इसलिए इनमें विषय-वैविध्य है। प्रेम है तो संघर्ष भी है। हृदय पक्ष प्रबल है तो कहीं बुद्धि का आश्रय लेती भी दिखाई देती हैं।
आए हो तुम यह कहा जब किसी ने
आँखें भर आईं मुद्दत के बाद
विरहाग्नि में दग्ध कवयित्री का हृदय मिलन की अनुभूति मात्र से सिहरित हो उठता है और अश्रु आंखों को भिगो देते हैं। 'मुद्दत के बाद ' श्रृंगार रस की श्रेष्ठ कविता है। 'प्रतीक्षा' में भी कवयित्री प्रेम भाव में डूबी है। कलियाँ, बादल, बिजली, धरती, आकाश- इन प्रतीकों के माध्यम से कवयित्री अपनी विरह वेदना अभिव्यक्त करती है। प्रियतम के आने के संदेश की प्रतीक्षा करते हुए वे कहती हैं-
इस मौसम में ठंडी लहरों जैसी बरखा
मुझको छूकर तेरे प्रणय का संदेश दे जाती है
तभी तो कब से खिड़की पर बैठी करती हूँ प्रतीक्षा।
कवयित्री ने माँ ,बेटियों और नारियों पर श्रेष्ठ कविताएँ लिखी हैं । इनके माध्यम से नारी के जीवन का संघर्ष उभरकर आया है। स्वयं नारी और माँ होने के कारण इन कविताओं के स्वर विशिष्टता लिए हैं। 'बेटियाँ' कविता की ये पंक्तियाँ -
बेटियाँ होती हैं छुई- मुई का पौधा
जो स्पर्श ही नहीं , नज़रों की चमक से शरमा जाती हैं
अथवा
बूढी माँ अपनी आंखों से रात भर
खून और जल के आंसू पीती है।
इनमें एक ओर ममत्व छलकता है तो दूसरी ओर वृद्धा की पीडाएं मन को भिगो देती हैं।
कवयित्री की रचनाएँ उनके कवित्व की संभावनाएं समेटे हैं। हिन्दी साहित्य को समर्पित यह उनका प्रथम पुष्प कवि-हृदयों को सुगन्धित करेगा। मेरी हार्दिक शुभकामनाएं। आशा है वे निरंतर सृजनरत रहेंगी और हिन्दी साहित्य को श्रेष्ठ कृतियों से समृद्ध करेंगी। **
* डॉ नीना छिब्बर , ६५३/ ,चौपासनी हाऊसिंग बोर्ड , जोधपुर (राज )
फ़ोन 0291-2712798

Tuesday 16 September 2008

स्व श्रवण राही : मुक्तकों के राजकुमार


साहित्य के क्षेत्र में हमारी सहयात्रा २५ वर्ष से अधिक की रही। दिल्ली छावनी के सुब्रोतो पार्क में हम निकट ही रहते थे। वे एयर फ़ोर्स में ऑडिटर थे और हम एयर फ़ोर्स स्कूल में हिन्दी -संस्कृत विभागाध्यक्ष थे। हर शाम साथ-साथ सैर पर निकलते और साहित्यिक चर्चाएँ करते। वे मधुर कंठ के धनी गीतकार थे। कई कवि-सम्मेलनों में एक साथ कविता-पाठ किया था। अनेक गोष्ठियों का आयोजन किया था। वे "सुमंगलम" संस्था के अध्यक्ष थे और हम महासचिव थे।
२२ मार्च २००८ ( होली के दिन ) शाम को दिल्ली के उत्तम नगर में कवि-सम्मेलन से लौटते समय हार्ट अटैक हुआ और पुत्र दुष्यंत राही के स्कूटर के पीछे बैठे-बैठे ही उनका निधन हो गया। ऐसे परम प्रिय मित्र का विछोह आजीवन सालता रहेगा ।
वे लिखते थे और मैं उनकी रचनाओं का पहला श्रोता होता था। मेरी जितनी पुस्तकें प्रकाशित हुईं उनकी पहली प्रति हमेशा उन्हें ही भेंट की थी।
अभी तक विशवास नहीं होता कि हमारे संग नहीं हैं। १३ सितम्बर को उनकी स्मृति में "सुपथगा " की ओर से उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
ऐसे सरल सहज व्यक्तित्व को विनम्रता पूर्वक उनके प्रसिद्ध मुक्तकों के साथ स्मरण करते हुए श्रद्धा -सुमन अर्पित हैं।
*गर्द में भी खिले हम गुलों की तरह
दर्द में भी हँसे बुलबुलों की तरह
हम अमर गीत की भांति हो जायंगे
लोग मिट जायेंगे चुटकलों की तरह।

*रोशनी पर अंधेरों के पहरे हुए
ज़ख्म जितने सिले उतने गहरे हुए
पीर की बांसुरी क्या सुनेंगे भला
लोग शहनाइयां सुनके बहरे हुए।

*प्रेम के गीत लिख व्याकरण पर न जा
मन की पीड़ा समझ आचरण पर न जा
मेरा मन कोई गीता से कम तो नहीं
खोलकर पृष्ट पढ़ आवरण पर न जा।

*बागबान से गुलों की सिफारिश न कर
अपने रहमो करम की यूँ बारिश न कर
माँगने की मुझे दोस्त आदत नहीं
मौत से ज़िंदगी की सिफारिश न कर।

*स्व श्रवण राही के गीतों और मुक्तकों का संग्रह "आस्थाओं के पथ "१९९५ में प्रकाशित हुआ था। इसकी भूमिका "श्रवण राही : शब्दों एवं भावों को जीवन्तता प्रदान करने वाले कवि " लिखने का सौभाग्य हमें मिला.
@सर्वाधिकार सुरक्षित : अशोक लव

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Monday 15 September 2008

मेरी चर्चित लघुकथाएँ : मृत्यु की आहट *

*यह लघुकथा अनेक लघुकथा-संग्रहों में संकलित है। पाठ्य - पुस्तकों में पढाई जा रही है। मेरे लघुकथा -संग्रह "सलाम दिल्ली" से--
राजधानी का पश्चिम क्षेत्र धमाकों से गूँज उठा। रसोई-गैस के सिलेंडर पटाखों के समान फट-फटकर आसमान में उड़ने लगे। उनके टुकड़े साथ लगे गली-मौहल्लों में गिरने लगे। पूरे क्षेत्र में कोहराम मच गया। लोग छतों पर चढ़कर दूर लगी आग को देखने लगे। बात ही बात में ख़बर फैल गई कि विशाल टैंकों में भरी रसोई-गैस को भी आग लग गई है। दस-बारह किलोमीटर तक सब स्वाहा हो जायेगा ।
अभी तक रसोई-गैस के सिलेंडरों का उड़ना लोगों के लिए एक तमाशा था। अब तमाशा मौत बन गया। लोग घर-बार छोड़कर भागने लगे। स्त्रियों ने धन-गहने ही संभाले। सभी जल्दी से जल्दी मौत के दायरे से बाहर निकल जाना चाहते थे।
नरेन्द्र अपने मित्र के घर राजौरी गार्डन गया हुआ था। आग लगने का समाचार सुन मोटरसायकिल दौडाता आया । जल्दी-जल्दी पत्नी और दोनों बच्चों को पीछे बिठाया। मोटरसायकिल स्टार्ट करने ही वाला था कि माँ रोती-चिल्लाती आई - " बेटे !मुझे भी साथ ले चल। यहाँ ज़िंदा जलने के लिए मत छोड़ जा।"
नरेन्द्र ने मोटरसायकिल स्टार्ट करते हुए कहा-"इन्हें छोड़कर अभी आता हूँ। आकर तुम्हें ले जाऊंगा। "
देखते ही देखते मोटरसायकिल आंखों से ओझल हो गया। माँ अवाक दहलीज पर खड़ी देखती रही। फिर आँगन में आकर आग के रूप में आती मृत्यु की आहट सुनने लगी। उसकी आंखों के सामने वैधव्य और नन्हें नरेन्द्र को जवानी तक पहुंचाने के कष्टप्रद दिनों के अनेक चित्र घूम गए। आंखों से अश्रुओं की धाराएं फूटती चली गईं ।
अचानक गली में शोर मचा। आग पर दमकलवालों ने नियंत्रण पा लिया था। गैस से भरे विशाल टैंकों तक आग पहुँची ही नहीं थी। माँ ने तटस्थ भाव से जीवन को लौट आते महसूस किया।
तभी मोटरसायकिल रुकने की आवाज़ आई । नरेन्द्र पत्नी और बच्चों के साथ घर में दाखिल हो रहा था। माँ की आंखों से दो बूँद अश्रु निकलकर लुढ़क गए। वह उठकर अपनी कोठरी की ओर बढ़ गई। *


@सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday 14 September 2008

मधुर गीतकार श्रवण राही :स्मृतियाँ

१३ सितम्बर २००८ को साहित्य अकादमी सभागार (नई दिल्ली ) में " सुपथगा " संस्था की ओर से स्वर्गीय श्रवण राही की स्मृति में "काव्य - रसधार " कार्यक्रम का आयोजन किया गया। डॉ शेरजंग गर्ग की अध्यक्षता में आयोजित कार्यक्रम में मेरे अतिरिक्त लक्ष्मी शंकर वाजपई और असीम शुक्ल मुख्य वक्ता थे। श्रीमती ममता किरण, डॉ श्याम निर्मम, राजगोपाल सिंह , डॉ राजेंद्र गौतम और सुरेश यादव ने कवि के रूप में भाग लिया। नरेन्द्र लाहड़ ,महासचिव -सुपथगा और दुष्यंत राही (सुपुत्र स्व.श्रवण राही ) ने समारोह का आयोजन किया । इस अवसर पर सुपथगा का " श्रवण राही विशेषांक" फोल्डर रूप में प्रकाशित किया गया जिसका लोकार्पण मुख्य - अतिथि डॉ परमानन्द पांचाल ने किया।वरिष्ट कवि सत्यनारायाण एवं डॉ नरेन्द्र व्यास विशिष्ट - अतिथि थे ।

विनोद बब्बर (सं -राष्ट्र किंकर ), आरिफ जमाल (सं- न्यू ऑब्ज़र्वर पोस्ट), किशोर श्रीवास्तव ( सं -हम सब साथ - साथ), ॐ सपरा ( साहित्य सं - मित्र संगम पत्रिका) , जगदीश त्रयम्बक (सं- राष्ट्रीय लोकमानस ), सुषमा भंडारी ,मनोहर लाल रत्नम, परवेज़ ,सत्यदेव हरयाणवी , मुसाफिर देहलवी, काका , चिराग जैन, शंभू शेखर ,जीतेन्द्र आदि साहित्यकारों और पत्रकारों की उपस्थिति उल्लेखनीय थी।
सबने स्व श्रवण राही के प्रति भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की।*
* स्व श्रवण राही पर संस्मरण शीघ्र .

Thursday 11 September 2008

माँ और कविता / अशोक लव


एक कविता है जिसे मैं जीता हूँ एक कविता है जिसे माँ जीती है
हमारी अपनी- अपनी कविताएँ हैं ।

मेरी कविता में शब्द हैं
जन्म लेने से पूर्व
अंतस के भावों को जीकर आते हैं शब्द
भाव- सागर में डूबकर आते हैं शब्द
जितना मुटठियों में भर पाता हूँ
उतने रूप धारण करते हैं शब्द
मेरी कविता बनते हैं शब्द
बहुत अच्छी लगती हैं मुझे अपनी कविताएँ ।

एक कविता माँ के आसपास
वः उसे जीती है
माँ की कविता में शब्द नहीं हैं
माँ की कविता कागजों पर नहीं उतरती
माँ रचती है ज़िंदा कविताएँ ।

माँ की देह से सर्जित देहें
उसकी कविताएँ
बहुत अच्छी लगती हैं
माँ को अपनी कविताएँ ।

महीनों सहेजकर रखा था माँ ने उन्हें
अपनी कोख में
मुस्काई थी माँ उनके संग
खेली थी माँ उनके संग
दुलारती- पुचकारती रही माँ
अपनी कविताओं को ।

बूडा गई है माँ अब
तलाशते हैं उसके कांपते हाथ
अपनी कविताओं को
न जाने कौन -सी हवा
ले गई है बहाकर उसकी कविताएँ ?

सुनाता हूँ माँ को अपनी कविताएँ
वह अपलक ताकती है
पता नहीं समझ आती हैं या नहीं
शब्दों से सर्जित मेरी कविताएँ
माँ को?

वह फेरती है सर पर हाथ
नहीं कहती है कुछ भी
भर लेती है हथेलियों में मुख,
बोलती कुछ भी नहीं।

भावातुर हो बह आती है
उसकी आंखों से स्नेह- नदी
डूब-डूब जाता हूँ उस नदी में।

माँ की कविता में शब्द नहीं हैं
शब्दों की कविताएँ
नहीं कर पाती स्पर्श
माँ की कविताओं का ,
काश! हम माँ-सी कविताएँ लिख पाते।

(*पुस्तक : लडकियां छूना चाहती हैं आसमान )
*सर्वाधिकार अशोक  लव  

Wednesday 10 September 2008

चिरैया


नन्हीं चिरैया
चोंच में तिनका दबाये
डोलती है
इधर से उधर
उधर से इधर
वृक्ष की फुनगियों पर।

एक ही दिन में नहीं सीख लिया था
चिरैया ने गाना-झूमना
उसने सीखा था पहले
उड़ना
अपने पंखों से उड़ना ।

वह नहीं चढी फुनगियों पर
सीढियों के सहारे
इसीलिये मस्त गाती है
झूलती है
झूमती है।

( पुस्तक: अनुभूतियों की आहटें)

मन-पाखी


क्या- क्या नहीं चाहता मन
कैसे-कैसे सजाता है स्वपन ।
आंखों में
उतार लेना चाहता है
सुनयनों में तैरती झीलें
बांहों में भर लेना चाहता है
आकाश ।

तपती दोपहरियों में चाहता है
तुहिन-कणों की शीतलता
कंपाते शीत में भर लेना चाहता है
देह की सम्पूर्ण ऊष्मा
कभी चाहता है क्षितिज को छूना।

मन है न अबोध शिशु-सा नहीं जानता सीमाएं
नहीं पढी उसने परिभाषाएं
विविशताओं की
इसीलिये
क्या-क्या नहीं चाहता मन।

(*पुस्तक: अनुभूतियों की आहटें ,अशोक लव )
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Tuesday 9 September 2008

अधिकार

बाजों के पंजों में

चिडियों का मांस देख

नहीं छोड़ देत् चिडिया

खुले आकाश की सीमायें नापना


उड़ती है चिडिया

गुंजा देती है

चह-चहाटों से आकाश का कोना-कोना

बाज़ चाहे जिस गलतफहमी में रहें

चिडिया नहीं छोड़ती

आकाश पर अपना अधिकार


*समर्पित है मेरी यह कविता सुश्री कंचन सिंह चौहान को ,जिन्होंने इसे अपने ब्लॉग पर उद्धृत किया और मेरा ब्लॉग पर आने का सिलसिला आरम्भ हुआ

( पुस्तक --अनुभूतियों की हटें )

Monday 8 September 2008

अशोक लव : कवि या संत

कहाँ से पाई है
तुमने यह सहनशीलता
यह उदारता
यह नम्रता
कभी न शोक में रहने वाला
अशोक वृक्ष - सा व्यक्तित्व ?
तुम्हारे साहित्य को लेकर
क्या- क्या न कहा था
कुछ पूरावाग्रहों से ग्रस्तों ने
और तुमने तुलसी-वाणी को सत्य कर दिया था --
"बूँद आघात सहहीं गिरी कैसे
खल के वचन संत सह जैसे "
तुम कवि हो या संत?
की कवि रूप में संत ?
या संत रूप में कवि
की दोनों हो तुम?
भीतर - बाहर से एक
मनोविज्ञान भी नहीं मानता यह
पर तुम हो
तुम हो मनोविज्ञान के लिए एक चुनौती
आज के आदमी के लिए
एक सुंदर पाठ
और आज के साहित्य का जीवन -द्रव-अमृत ।
*आभा पूर्वे (सम्पादक - नया हस्तक्षेप , मशाकचक ,भागलपुर ) की इस कविता को सुप्रसिद्ध आलोचक डाक्टर अमरेंदर ने " अनुभूतियों की आहटें : ताज़ा गंधों की तलाश" लेख में उधृत किया है।
maine "समय साहित्य सम्मलेन" पुनसिया ,भागलपुर में apne लघुकथा - संग्रह "सलाम दिल्ली " पर आयोजित कार्यक्रम में पटना के एक लघुकथाकार के षडयंत्र का शालीनता से उत्तर दिया था । उसीसे प्रभावित होकर आभा पूर्वे ने यह कविता लिखी थी। वह लघुकथाकार समारोह से मुंह छिपाकर भाग गया था। मैंने साहित्य में राजनीती का हमेशा विरोध किया है।


कविता जब लोहा हो जाती है

आंच के तीखे प्रहार सह
पिघलने के पश्चात
लोहा जब ठोस रूप लेता है
और चोट करता है
तो मज़बूत से मज़बूत दीवारें
चरमरा जाती हैं।

परिवेशी आंच
देह और भावों को पिघलाती हैं
मन के छापेखाने से शब्द
धडा धड छपते चले जाते हैं
इन्हें ही कविता कहतें हैं।

इसकी चोट आंच में तपे लोहे से कम नहीं हुती।

इसलिए कहीं
लोहा थामने वाले हाथ कटते हैं
कहीं कविता लिखने वाले।

इन कटे हाथों पर उग आते हैं
नए हाथ
इन नए हाथों से चलते लोहे कविता हो जाते हैं
इन नए हाथों से लिखी कवितायें लोहा हो जाती हैं।

(*अशोक लव ;पुस्तक -अनुभूतियों की आहटें )

Sunday 7 September 2008

कंचन सिंह चौहान : संवेदनशील कवयित्री

ब्लॉग की दुनिया में मेरा प्रवेश अचानक ही हो गया। अचानक " हृदय गवाक्ष " ब्लॉग में अपनी कविता "अधिकार" को पढ़कर चौंक गया। पता चला नासिरा शर्मा जी ने अपनी पुस्तक में इसे उद्धृत किया था ,जिसे कंचन सिंह चौहान ने अपने ब्लॉग में चर्चित किया था। सुखद अनुभव हुआ। अपनी प्रतिक्रिया लिखी ओर एक दिन मेल मिली। यहाँ से आरम्भ हुआ इस कर्मठ , संघर्ष शीला कवयित्री से सम्पर्क का सिलसिला। छोटी हैं पर ब्लॉग के संसार में लाने की प्रेरक हैं। "शिखरों से आगे " मेरा चर्चित उपन्यास है , जिस पर तीन एम् फिल हुई हैं , उसी के आधार पर ब्लॉग का नामकरण करने का श्रेय भी कंचन जी को ही जाता है। ब्लॉग बनने का कार्य भी उन्होंने ही किया। *.......

लड़की

झट बड़ी हो जाती है लड़की
और ताड़ के पेड़-सी लम्बी दिखने लगती है ,
उसकी आंखों में तैरने लगते हैं
वसंत के रंग-बिरंगे सपने
वह हवा पर तैर
घूम आती है गली-गली , शहर-शहर
कभी छू आती है आकाश
कभी आकाश के पार
चांदी के पेड़ों से तोड़ लाती है
सोने के फल ।
मन नहीं करता उसे सुनाएं
आग की तपन के गीत
मन नहीं चाहता
उसकी आंखों के रंग-बिरंगे सपने
हो जायें बदरंग।
हर लड़की को लांघनी होती है दहलीज
और दहलीज के पार का जीवन
सतापू खेलने ,गुड्डे-गुड्डियों की शादियाँ रचाने से
अलग होता है।
इसलिए आवश्यक हो जाता है हर लड़की
सहती जाए आग की तपन
सतापू खेलने के संग-संग
ताकि पार करने से पूर्व
वह तप चुकी हो और उसकी आंखों में नहीं तैरें
केवल वसंत के सपने ।*
(अनुभूतियों की आहटें , अशोक लव -१९९७)

Wednesday 3 September 2008

सदाबहार बेटियाँ / * अशोक लव



बेटियाँ होती हैं ठंडी हवाएं,


तपते हृदय को शीतल करने वाली,


बेटियाँ होती हैं सदाबहार फूल,


खिली रहती हैं जीवन भर,


रहती हैं चाहे जहाँ,


महकाती हैं,


सजाती हैं,


माता पिता का आँगन


बेटियाँ होती हैं मरहम,


गहरे से गहरे घाव को भर देती हैं,


संजीवनी स्पर्श से


जीते हैं माता पिता,


बेटियों के संसार को सजाने की ललक लिये


बेटियाँ होती हैं,


माता पिता के सुनहरे स्वप्न।


पल भर में छोड़ जाती हैं बेटियाँ


माता पिता का आँगन


लेती हैं उनके धैर्य की परीक्षा।
असहाय माता पिता,


ताकते रह जाते हैं,


और चली जाती हैं बेटियाँ,


छोड़ जाती हैं पीछे पल पल की स्मृतियाँ।


माँ स्मृति के पिटारे से निकालती है,


छोटी छोटी फ्रॉकें


लगाती हैं उन्हे हृदय से


पिता निहारते हैं उँगलियाँ,


जिन्हे पकड़ा कर


सिखाया था बेटियों को


टेढ़े मेढ़े पाँव रख कर चलना,


कितनी जल्दी बड़ी हो जाती हैं बेटियाँ


कितनी जल्दी चली जाती हैं बेटियाँ