Friday 28 November 2008

विवश वृक्ष / * अशोक लव


नदी की लहरों ने
अपने स्पर्शों से
किनारे खड़े वृक्ष में भर दिए
प्राण ,
पुनर्जीवित हो उठा वृक्ष
हरे हो गए पत्ते
चहकने लगीं टहनियां।

लहरों की प्रतीक्षा में
अपलक निहारता है दूर-दूर तक
मौन तपस्वी - सा ,
संबल बनी नदी
बदल न ले मार्ग अपना
सोच-सोच
कांप - कांप जाता है वृक्ष।

उछलती कूदती आती हैं नदी की लहरें
छूकर भाग जाती हैं नदी की लहरें
वृक्ष भी चल पाता
तो , चलता दूर तक नदी के संग
विवश वृक्ष केवल सुनता रहता है
लौटती नदी की पदचापें ।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
*सर्वाधिकार सुरक्षित (पुस्तक-लड़कियाँ छूना चाहती हैं आसमान )

No comments: