Tuesday, 21 December, 2010

Tuesday, 14 December, 2010

कोई नहीं है आसपास / अशोक लव

कोई नहीं है आसपास
फिर भी हवाओं में है
किसी की सुगंध
महका रही है भीतर तक
कर रही है उल्लसित।
वृक्षों के पत्तों में प्रकम्पित
चूड़ियों की खनखनाहट ,
आकाश में टंगा सूर्य-
माथे की बिंदी - सा
मक रहा है।
जनवरी की कोसी-कोसी धूप
किसी की निकटता -सी
लग रही है सुखद । 
दूरियों की दीवार के पार
है कोई
और यहाँ हैं -
नदी से नहाकर निकली
हवाओं का गीलापन लिए
निकटता के क्षणों के अहसास।
किसी के संग न होने पर भी
आ रही है
हवा के प्रत्येक झोंके के साथ
सुपरिचित महक ।@अशोक लव 

Thursday, 25 November, 2010

सबका धन्यवाद (Thanksgiving Day :25th November )

 इस देह को जन्म देने वाले अब मेरे संग नहीं हैं सर्वप्रथम उनका धन्यवाद !शब्दों से क्या उनका धन्यवाद दिया जा सकता है ? पर भीगा मन कहता है सर्वप्रथम उन्हें धन्यवाद दूँ.
जीवन-यात्रा के मध्य इसे बहुतों  ने सजाया- संवारा. उन सबका धन्यवाद.
जो अपने नहीं थे उन्होंने भी अपनत्व से जीवन के बहुत दिनों को सुखमय बनाया. कुछ वर्षों से साथ हैं, कुछ ,कुछ पल साथ रहे. कुछ अधिक समय साथ रहे और अब न जाने कहाँ कैसी स्थिति में हैं. उन सबका धन्यवाद !
कुछ  स्वार्थवश संग रहे और स्वार्थ पूरे कर चले गए. उनका भी धन्यवाद. उनसे भी बहुत कुछ सीखने को मिला. 
कुछ अपनों का मुखौटा ओढ़कर संग रहे और छल करके चले गए. उनका भी धन्यवाद. 
कुछ अब भी मुखौटा ओढ़े संग  हैं . उनका भी धन्यवाद !

Saturday, 13 November, 2010

13 नवम्बर

कटते-कटते कट गए  देखो कितने साल ,
2010  तक भी वही है देखो  अपना हाल!
--अशोक लव 

Sunday, 7 November, 2010

यादों का सिलसिला

वक्त अपनों को बहाकर कहाँ-कहाँ ले गया l
हाथों में सिर्फ यादों का सिलसिला  दे गया ll
*अशोक  लव 

Wednesday, 3 November, 2010

' वुमेन ऑन टॉप ' पत्रिका के नवम्बर अंक में कविता 'आओ आगे बढें '

' वुमेन ऑन टॉप ' पत्रिका के नवम्बर अंक में कविता 'आओ आगे बढें '

Tuesday, 2 November, 2010

9 फरवरी 1990 उपराष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा द्वारा ' हिन्दी के प्रतिनिधि साहित्यकारों से साक्षात्कार ' का लोकार्पण

9 फरवरी 1990 उपराष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा द्वारा अशोक  लव की पुस्तक  ' हिन्दी के प्रतिनिधि साहित्यकारों से साक्षात्कार ' का लोकार्पण हुआ

Saturday, 30 October, 2010

शुक्रिया / अशोक लव

शुक्रिया कदमों से कदम मिलाने का 
मुश्किलों में  यहाँ तक साथ आने का  
लगता है कुछ दिन और जी लेंगे हम 
 इंतज़ार है वक्त के ठहर  जाने   का.
--अशोक लव

Thursday, 28 October, 2010

सलाम दिल्ली : अशोक लव की लघुकथाएँ

'सलाम  दिल्ली' लघुकथाओं का संग्रह है जिसका प्रकाशन 1991 में हुआ था. इसकी अनेक लघुकथाएँ पाठ्य -पुस्तकों में और अनेक सम्पादित लघुकथा -संग्रहों में संकलित हैं.

Saturday, 16 October, 2010

काश ऐसा होता कि हम..........! --- अशोक लव

त्योहारों के संग कितनी स्मृतियाँ सजीव हो उठती हैं. वे सब आसपास तैरने लगते हैं जिनकी उंगलियाँ पकड़ कभी रामलीला देखने जाते थे, कभी जलते रावण , कुम्भकरण और मेघनाद के पुतले. जीवन के पृष्ठों पर इन सबकी कथाएँ उन्होंने लिखीं जो अब नहीं हैं.
समय जिस तेज़ी से भागता है, पता ही नहीं चलता कैसे सब लीलता चला जाता है.कुछ  नहीं  छोड़ता. केवल रह जाती है टीस !
 किसी को इससे कुछ लेना-देना नहीं. यह एकदम व्यक्तिगत होती  है.
इस संसार में सबका अपना-अपना एक भिन्न संसार बसा होता है. अपनी-अपनी भावनाएँ,अपनी-अपनी संवेदनाएँ,अपनी -अपनी प्रसन्नताएँ, अपनी-अपनी उदासियाँ. स्वयं के हृदय की धड़कनों को स्वयं ही सुनना.
कितना अकेला होता है मनुष्य , सबके बीच रहते हुए भी एकदम अकेला !
जीवन-यात्रा के मध्य उनका आभार आवश्यक हो जाता है जिन्होंने अपने जीवन के अमूल्य क्षण हमारे जीवन को सजाने-संवारने में लगा दिए.आज कल करते-करते समय यूं निकल गया . जिनके प्रति आभार प्रकट करने के विषय में सोचते रहे ,वही नहीं रहे.
उन सबका आभार तो प्रकट कर ही देना चाहिए जो हमारे आसपास हैं. उन क्षणों के लिए जो उन्होंने अपने समय से निकालकर हमें समर्पित किए.
इस बार भी इन त्योहारों के संग वे बहुत याद आ रहे हैं जिनके संग इन्हें मनाया था.
एक शब्द है--काश !
काश! ऐसा होता कि हम समय को बाँधने  की सामर्थ्य रखते. काश ऐसा होता कि हम..........!

Wednesday, 22 September, 2010

सतनाम श्री वाहे गुरु ! तुहानूं ते सभ नूँ वधाईयां !

Tuesday, 21 September, 2010

Print Media

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Tuesday, 14 September, 2010

हिंदी-दिवस के बहाने चलो हिंदी की बात करें.

व्रत-त्योहार और दिवस आते हैं और अपने -पराए शुभकामनाएँ लेते-देते हैं. 'हिंदी-दिवस' भी इसी श्रेणी का दिवस बन गया है. इसे केवल शुकामनाओं का दिवस नहीं बनाना चाहिए. यह तो जीवन-शैली है. आत्मा में रची-बसी है.इसे अपनाएँ.
हिंदी में सक्रिय लेखन करते हुए  चार दशक से अधिक बीत गए हैं. अनेक साहित्यिक और शैक्षिक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं. अनेक हिंदी कार्यशालाओं में भाषण दिए हैं. अनेक स्कूलों के हिंदी शिक्षकों को संबोधित किया है. हिंदी-दिवस पर आयोजित अनेक कवि-सम्मेलनों में भाग लिया है. अनेक हिंदी पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया है.लगभग तीस वर्षों तक अध्यापन किया है. आज हिंदी की स्थिति देखकर गर्व होता है.
लेह-लद्दाख से लेकर मणिपुर और अंडमान तक देश भर में हिंदी ही एक-दूसरे के साथ संवाद का माध्यम है. विदेशों में बसे भारतीय हिंदी में बातचीत करके गर्वित होते हैं. कुछ माह अमेरिका में रहने के मध्य इस प्रकार के अनेक अवसर आए. वहाँ मिले भारतीय अनजान होने पर भी मिले और तुरंत हिंदी में बातें करने लगे. होटलों में भी यही अनुभव  किया. वहाँ बसे भारतीय अपनी मातृभाषा में और हिंदी में बातचीत करके स्वयं को देश के साथ जुड़ा महसूस करते हैं.
हमें अधिक से अधिक भाषाओँ का अध्ययन करना चाहिए. सुप्रसिद्ध साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन तेरह से अधिक भाषाओँ के विद्वान थे. हिंदी का किसी से वैर नहीं है. राजनेताओं ने देश का जो हाल लिया है,सबके सामने है. उनके कारण हिंदी का हित नहीं हुआ है , यह तो इस भाषा की विशेषता  है कि यह स्वयं पल्लवित-पुष्पित हुई है. आज हिंदी में लाखों (हजारों  नहीं ) लेखक हैं.14 सितम्बर 1946 संविधान में  को इसे राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकृत किया गया. आज यह जन-मानस में रच-बस गई है. हमें  अन्य भारतीय भाषाओँ के साथ हिंदी पर गर्व है. यह संसार की श्रेष्ठ भाषाओँ में से एक है.

Saturday, 28 August, 2010

पुण्य-तिथि पर नमन पिता !

नमन पिता !
28 अगस्त 1980
28 अगस्त 2010
विदा  हुए  हो  गए  वर्षों
और हो तुम पल-पल संग .
स्मृतियों की लहरें उमड़-उमड़ आती हैं
बचपन से युवावस्था तक का
लम्बा जीवन
कितने - कितने रूप देखे थे तुम्हारे,
जूझते हुए
संघर्षरत
विपरीत परिस्थियों से
--नहीं मिट पाता स्मृति पटल से
यह चित्र तुम्हारा.

स्नेह का निर्झर
अब कहाँ है ?

भावनाएँ जब प्रबल हो जाती हैं
 शब्द बिखर-बिखर जाते हैं .
नमन तुम्हें पिता
नमन!

इस देह में हैं जब तक
श्वास तब तक तुम जीवित रहोगे
इसके संग .
हृदय 
की प्रत्येक धड़कन के संग
तुम सदा धड़कते रहोगे
पिता !

बहुत छोटा -सा शब्द
समेटे एक संसार
जिसे तुमने बनाया था
इस संसार में अब भी तुम हो पिता
हाँ हो तुम पिता . 
पुण्य-तिथि पर नमन पिता !

Thursday, 26 August, 2010

कविता- "लड़कियाँ होती हैं लड़कियाँ "- अशोक लव

 लड़कियाँ होती हैं लड़कियाँ 
'''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
पींगों पर झूलती कविता
झुलाती लड़कियाँ
पांवों में घुँघरू बजाती
छनछनाती लड़कियाँ
गीतों को स्वर देती
 गुनगुनाती लड़कियाँ
घर-आँगन बुहारती
संवारती लड़कियाँ .


मर्यादाओं की परिभाषा
होती हैं लड़कियाँ
संस्कारों को जीती
जगाती हैं लड़कियाँ
पैरों में आसमान
झुकाती हैं लड़कियाँ.

'''''''''''''''''''''''''''''''''
@अशोक लव
सेक्टर-6, द्वारका
नई दिल्ली-110075

Tuesday, 24 August, 2010

रक्षा-बंधन के पावन पर्व पर समस्त भाई-बहनों को हार्दिक शुभकामनाएँ !

रक्षा-बंधन के पावन पर्व पर समस्त  भाई-बहनों को हार्दिक शुभकामनाएँ ! आपसी प्रेम की भावना बनी रहे।

Saturday, 21 August, 2010

Monday, 9 August, 2010

प्यासे जीवनों के पनघट ! / अशोक लव

कतारों की कतारें
अभावों से बोझिल क़दमों के संग
सूखे होठों की पपड़ियों को
सूखी  जीभ से गीलेपन का अहसास दिलाते
प्यासी आँखों में पानी के सपने लिए
कुएँ को घेरे
प्रतीक्षारत !
कुएँ में झाँकती
प्यासी आशाएँ
कुएँ  की दीवारों से टकराते
झनझनाते खाली बर्तन.
बिखरती आशाओं 
प्यासे जीवनों के पनघट !
असहाय ताकते
जनसमूह
शायद..शायद ..होठों को तर करके
हलक से नीचे तक उतर जाए
पानी !!
''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
@अशोक लव , 9 अगस्त  2010

Friday, 6 August, 2010

कैसे - कैसे पल / अशोक लव

डगमगाते पग  
नन्हें शिशु
तुतलाती ध्वनियाँ
स्नेह भरी कल-कल बहती नदी
अंतर्मन में समा-समा जाती
निश्छल मुस्कानें!
उफ़!
खो गए तुतलाते स्वर
सूख गई नदी
तार-तार अंतर्मन
न सहने
न कहने की स्थिति.

तुतलाते स्वरों ने सीख लिए
शब्द
बोलते हैं  अनवरत धारा प्रवाह
सिखाया था उन्हें ठीक-ठीक बोलना
अब वे बात-बात पर
सिखाते हैं.

नदी आँगन छोड़
कहीं ओर बहने लगी है
किन्हीं अन्य गलियों को
सजाने लगी है.

मुस्कानें
अपनी परिभाषा भूल गई हैं
मुस्कराने के प्रयास में 
सूखे अधरों पर जमी
पपड़ियाँ फट जाती हैं
अधरों तक आते-आते
मुस्कानें रुक जाती हैं.

पसरा एकांत
बांय-बांय करता
घर-आँगन को लीलता
पल-पल
पैर  फैलाए बढ़ता जाता है
कोना-कोना
लीलता जाता है.

कैसे - कैसे दिन
कैसे- कैसे पल उतर  आते हैं!
कैसे-कैसे रंग छितर जाते हैं !
"""""""""""""""""""""""""""""""""
@अशोक लव  [6 अगस्त 2010 ]

Thursday, 5 August, 2010

कैसे- कैसे पल / अशोक लव

डगमगाते पग
नन्हें शिशु
तुतलाती ध्वनियाँ
स्नेह भरी कल-कल बहती नदी
अंतर्मन में समा-समा जाती
निश्छल मुस्कानें!

उफ़!
खो गए तुतलाते स्वर

सूख गई नदी
तार-तार अंतर्मन
न सहने
न कहने की स्थिति.

तुतलाते स्वरों ने सीख लिए
शब्द
बोलते हैं  अनवरत धारा प्रवाह
सिखाया था उन्हें ठीक-ठीक बोलना
अब वे बात-बात पर
सिखाते हैं.

नदी आँगन छोड़
कहीं ओर बहने लगी है
किन्हीं अन्य गलियों को
सजाने लगी है.

मुस्कानें
अपनी परिभाषा भूल गई हैं
मुस्कराने के प्रयास में 
सूखे अधरों पर जमी
पपड़ियाँ फट जाती हैं
अधरों तक आते-आते
मुस्कानें रुक जाती हैं.

पसरा एकांत
बांय-बांय करता
घर-आँगन को लीलता
पल-पल
पैर  फैलाए बढ़ता जाता है
कोना-कोना
लीलता जाता है.

कैसे - कैसे दिन
कैसे- कैसे पल उतर  आते हैं
कैसे-कैसे रंग छितर जाते हैं !
"""""""""""""""""""""""""""""""""
@अशोक लव  [6 अगस्त 2010 ]

Wednesday, 28 July, 2010

बच्चो जाना मत / अशोक लव


 वे आए
 वर्षों बाद गूँज उठी  दीवारें
गूँज उठे घर-बाहर के कोने- कोने 
सन्नाटा ठहाकों में खो गया.

बच्चो तुम कहाँ थे
अभी तक ?

इन ठहाकों की तलाश में गुज़ार दिए
न जाने कितने -कितने वर्ष.
जाना मत यहाँ से अब
कहीं फिर से न पसर जाएँ सन्नाटे 
यहाँ 
चारों ओर. 
............... *@अशोक  लव



Saturday, 24 July, 2010

आभा खेतरपाल की कविता पर ...

"लाखों क्षण रेत से हैं /या बिखरी आशाएं /कंटीली झाड़ियाँ हैं /या आँखों में चुभते सपने /तपती धूप है /यासुलगती यादें /चीखता सन्नाटा है /या मेरा अकेलापन /सूखी धरती है /या मेरा प्यासा मन /आखिर कोईतो बताये /ये मैं हूँ या मरुस्थल !"-आभा खेतरपाल
आभा जी आपकी कविता जीवन के उस पक्ष की पीड़ाओं की अभिव्यक्ति है जो मनुष्य के सामर्थ्य से परे है।विवशताएँ हैं हमारी , आपकी। प्रत्येक व्यक्ति जीवन में हरियाली चाहता है और उसके पाँव के नीचेमरुस्थल की गरम-गरम रेत जाती है। इन विवशताओं की है यह कविता।
...हरियाली आपके आसपास है...मरुस्थल नहीं !

जेन्नी शबनम के पिताजी को श्रद्धांजलि !

जेन्नी शबनम जी
एक पीढ़ी थी श्रद्धा योग्य ,नमन योग्य !आपके पिता जी उस पीढ़ी के साक्षात् प्रमाण हैं। वह संघर्षरत पीढ़ी थी। मूल्यों के लिए जीना, जीवन- दर्शन को जीवन में उतारना, मात्र अपने लिए ही नहीं समाज के लिए भी जीना।
हमने भी उस पीढ़ी को निकट से देखा और जिया है।
हमने कई बार सोचा कि जेन्नी जी इतनी संस्कारवान कैसे हैं ? अब पता चला। आप धन्य हैं। जिनके पिता ऐसे होते हैं उनका आपकी भाँति होना स्वाभाविक है ।
आपने आपने पिता जी के विषय में जितना लिखा है, उससे आँखों के समक्ष उनका गंभीर श्रद्धा-योग्य व्यक्तित्व साकार हो गया है। उनका अभाव पल-पल खटकना स्वाभाविक है। वे प्रकाश-पुंज थे। उनका चला जाना जीवन भर के लिए ऐसा अभाव छोड़ गया होगा जिसे न तो कोई व्यक्ति और न ही कुछ शब्द पूर्ण कर सकते हैं।
जब किसी की बहुत आवश्कता होती है तब उसका न होना कितना पीड़ाजनक होता है इसकी अनुभूति हमें है। हमारी अपनी सीमाएँ हैं, मृत्यु के क्रूर हाथों के समक्ष असहाय हैं।
काश आप जैसी बेटियाँ सभी की हों , जो आज भी आपने पिता के साथ इतनी गहनता से सम्बद्ध हैं ।
मन बहुत उदास हो गया है। कुछ दिनों के पश्चात् ही पिता जी की पुण्य-तिथि है।
आपकी माता जी ने जो संघर्ष किए हैं , उन्हें नमन !
--अशोक लव
जेन्नी शबनम :लिंक -http://saajha-sansaar.blogspot.com

Tuesday, 20 July, 2010

बदलते आंगन (कविता ) / अशोक लव

The Super Human

बदलते आँगन/खंड नारी

आँगन में जन्मती हैं
पलती-बढती हैं
खिलखिलाती हैं
घर-द्वार महकाती हैं |

तितलियों-सी उड़ती हैं
प्रकृति की समस्त छटाएँ छितराती हैं
कोयल-सी कुहकती हैं
घर को स्वर्ग बनाती हैं |

माँ के चरण-चिह्नों पर
पाँव रखती हैं
आटा गूंथना सीखती हैं
चपातियों को गोल करना सीखती हैं
सब्जियों-मसालों में सम्बंध बनाना सीखती हैं |

पिता की आय का हिसाब रखने लगती हैं
माँ की थकान का हिसाब रखने लगती हैं
घर के उत्तरदायित्व बांटने लगती हैं |

इतना सब जब सीख जाती हैं
सहसा चिड़िया-सी उड़ जाती हैं
अपना संसार बसाती हैं |
कहाँ जनमती हैं,
कहाँ पलती हैं,
कहाँ घर बसाती हैं!
ऐसी होती हैं बेटियाँ!
-------------------------

बेटियां ,
सुनने मैं ये शब्द जितना मीठा लगता है , जीवन मैं यह शब्द उतना ही सुन्दर और शाश्वत होता है , है न दी ,
जीवन के सच की सदृश्य बेटियाँ , सिर्फ माता , पिता , की बेटी न होकर आंगन का उजाला , घर की रौनक , दो परिवारों का सम्मान , और कई जीवनों का आधार होती हैं बेटियां ।
सच में दी , ये बहुत बहुत बहुत अच्छी रचना लगी है , अशोक जी को , हृदय की अतल गहरे से बधाई ।

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'लड़कियाँ छूना चाहती हैं आसमान' की कविताओं को सुश्री आभा खेतरपालऑरकुट में' सृजन का सहयोग ' में पोस्ट कर रही हैंइस कविता पर प्राप्त प्रतिक्रिया सहित इसे यहाँदिया जा रहा है

Sunday, 18 July, 2010

चल बिटिया चल

नन्हीं बिटिया
उंगली छुड़ा
काली नंगी सड़क पर
टेढ़े -सीधे पग रखती
भाग खड़ी हुई
पकड़ पाता उसे
वह तब तक गिर गई थी
छिल गए थे उसके घुटने।

उसे उठाया
घुटने सहलाए
ले चला फिर घुमाने उंगली पकड़।
छुड़ा ली उसने फिर उँगली
छिले घुटनों की पीड़ा भूल
दौड़ गई वह

इस बार नहीं दौड़ा उसके पीछे
उसे जाने दिया
बिना उंगली पकडे चलने का
अपना ही सुख होता है।
'''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''

@सर्वाधिकार -अशोक लव
पुस्तक-अनुभूतिओं की आहटें ( वर्ष-1997)

Wednesday, 14 July, 2010

कुछ दो वक्त की रोटी को तरसते हैं इस देश में
कुछ एक झटके में दो सौ करोड़ कमाते हैं।
देश को रखकर जेब में बैठे हैं कुर्सियों पर
पसीने में नहाए लोग गलियों में बैठे हैं।

जगन्नाथपुरी के भगवान श्री कृष्ण ,सुभद्रा और बलराम / अशोक मेहता

Friday, 9 July, 2010

संगीता स्वरूप जी , लघुकथा पाठकों के लिए बहुत कुछ छोड़ जाती है। यही इस विधा की विशेषता है। यदि टिन्नी इस लघुकथा को पढ़ ले तो ऐसी मूर्खता करे वैसे हमारी कामना यही है कि टिन्नी को समझ जाए।
गिन-गिन दिन,
आया जन्म-दिन
खुशियों भरें रहें,
हर
पल-छिन !


Thursday, 8 July, 2010

नहीं मरेगी टिन्नी?( लघुकथा ) / अशोक लव

 
प्रिय गौतम
उसे बचा सकूँगी नहीं जानती ? वह जिस स्थिति में है हर पल आशंका बनी रहती है , वह कहीं आत्महत्या कर लेउसे समझा-समझाकर परेशान हो चुकी हूँसमझाने और समझने की सीमा होती हैवह केवल एक ही रट लगाए है निक्कू से विवाह करूंगी
माँ का रो-रोकर बुरा हाल हैपिताजी उसके कहने पर निक्कू के माता-पिता से बातचीत करने गए थेवह किसी भी हालत में अभी निक्कू का विवाह करने के लिए राज़ी नहीं हैंवह अपनी जगह ठीक हैंअभी एम बी करके कॉलेज से निकला ही हैघर का बड़ा बेटा हैपिता अकेले कमाते हैदो छोटी बहनें कालेज में पढ़ रही हैंअभी उसकी पढ़ाई लिए लोन की किश्तें जा रहीं हैं
मैंने निक्कू से बात की थीउसका कहना है-" टिन्नी से उसकी दोस्ती भर हैकॉलेज में एक साथ पढ़ने , एक्टिविटिस में एक साथ भाग लेने का मतलब प्रेम होना नहीं होताठीक है वह सबसे खुलकर हँसता है, मज़ाक करता है, अपनापन जताता हैइसका यह अर्थ तो नहीं है कि वह सबसे प्रेम करने लगा हैक्लास में बाकी लड़कियाँ भी तो थींउसने टिन्नी को कभी अलग से इसका अहसास ही होने दिया कि वह उसके लिए ख़ास हैक्लास में जैसे लड़के-लड़कियाँ आपस में रहते हैं , उसके साथ ऐसे ही रहा हैमैंने कभी भी किसी भी तरह से उसे नहीं कहा कि वह मेरे लिए स्पेशल हैमेरी इतनी जिम्मेदारियाँ हैंपिताजी को हाई ब्लड प्रेशर है माँ शूगर पेशेंट हैंबहनें पढ़ रहीं हैंमेरा अपना करियर अभी शुरू हुआ हैयह लड़की पागल हो गई हैमेरे घर में अपने पिताजी को भेज दियामेरा तो मरण हो गयामेरे फ्रेंड्स को ऑरकुट और फेसबुक पर तरह-तरह के मेसेज कर रही हैमैडम आप बताइए इसे मैं क्या कहूँ ?"
टिन्नी के पास इन बातों का कोई जवाब नहीं हैकहती है -"निक्कू कभी कभी तो विवाह करेगा हीयह एक बार कह दे तो मैं दो-तीन-चार वर्ष तक भी रुक जाऊंगीठीक है इसने कॉलेज में कभी नहीं कहा कि वह मेरे साथ विवाह करेगापर हाव-भाव भी तो मायने रखते हैंइसका यूं खुलकर मज़ाक करना , कैंटीन में मेरे साथ कॉफ़ी पीना ! कॉलेज फ्रेंड्स पिक्चर देखने गए तो यह मेरे साथ ही बैठा थामैंने कितनी बार कहा था निक्कू जब विवाह करूंगी तो तेरे जैसे लड़के के साथ ही करूंगीअब घर में मेरे विवाह की बात चली तो मैंने पिताजी से कह दियादीदी आप नहीं जानती मैं निक्कू से कितना प्यार करती हूँमैं इसके बिना जी नहीं सकतीआप देख लेनामैं आत्महत्या कर लूंगीप्यार किया है तो इसी के साथ ही जीऊँगीनिक्कू के बिना अपनी ज़िंदगी के बारे में मैं सोच भी नहीं सकती।"
गौतम, टिन्नी की जिद्द ने दो घरों का सुख-चैन छीन लिया हैनिक्कू के माता-पिता परेशान हैंयदि टिन्नी ने आत्महत्या के लिए निक्कू और उसके माता-पिता को ज़िम्मेदार लिखकर आत्महत्या कर ली तो उनका सारा परिवार तो जेल जाएगा ही
टिन्नी का यह एकतरफा प्यार कैसा तूफ़ान लाएगा नहीं जानतीउसे ज़िंदगी में सिर्फ निक्कू ही दिखाई दे रहा हैमैंने हर तरह से प्रयास कर लिया हैवह नहीं जानती ब्लैकमेल करके किया गया विवाह कितने दिन चलेगानिक्कू के पक्ष को देखें तो वह एकदम ठीक लगता है
तुम आकर एक बार टिन्नी के माता-पिता की हालत देखोगे तो तुम्हारी आँखों में आँसू जाएँगे
तुम टिन्नी को बचपन से जानते होशायद तुम्हारी बातों का असर हो ! मैं नहीं चाहती उसकी ज़िन्दगी इस तरह ख़त्म हो
कल की फ्लाईट से जाओ
तुम्हारी मित्र
आनंदिता
..............................................
@अशोक लव
यह मात्र लघुकथा हैइसका किसी के वास्तविक जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं है.