Tuesday 9 September 2008

अधिकार

बाजों के पंजों में

चिडियों का मांस देख

नहीं छोड़ देत् चिडिया

खुले आकाश की सीमायें नापना


उड़ती है चिडिया

गुंजा देती है

चह-चहाटों से आकाश का कोना-कोना

बाज़ चाहे जिस गलतफहमी में रहें

चिडिया नहीं छोड़ती

आकाश पर अपना अधिकार


*समर्पित है मेरी यह कविता सुश्री कंचन सिंह चौहान को ,जिन्होंने इसे अपने ब्लॉग पर उद्धृत किया और मेरा ब्लॉग पर आने का सिलसिला आरम्भ हुआ

( पुस्तक --अनुभूतियों की हटें )

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