Thursday, 11 September, 2008

माँ और कविता / अशोक लव


एक कविता है जिसे मैं जीता हूँ एक कविता है जिसे माँ जीती है
हमारी अपनी- अपनी कविताएँ हैं ।

मेरी कविता में शब्द हैं
जन्म लेने से पूर्व
अंतस के भावों को जीकर आते हैं शब्द
भाव- सागर में डूबकर आते हैं शब्द
जितना मुटठियों में भर पाता हूँ
उतने रूप धारण करते हैं शब्द
मेरी कविता बनते हैं शब्द
बहुत अच्छी लगती हैं मुझे अपनी कविताएँ ।

एक कविता माँ के आसपास
वः उसे जीती है
माँ की कविता में शब्द नहीं हैं
माँ की कविता कागजों पर नहीं उतरती
माँ रचती है ज़िंदा कविताएँ ।

माँ की देह से सर्जित देहें
उसकी कविताएँ
बहुत अच्छी लगती हैं
माँ को अपनी कविताएँ ।

महीनों सहेजकर रखा था माँ ने उन्हें
अपनी कोख में
मुस्काई थी माँ उनके संग
खेली थी माँ उनके संग
दुलारती- पुचकारती रही माँ
अपनी कविताओं को ।

बूडा गई है माँ अब
तलाशते हैं उसके कांपते हाथ
अपनी कविताओं को
न जाने कौन -सी हवा
ले गई है बहाकर उसकी कविताएँ ?

सुनाता हूँ माँ को अपनी कविताएँ
वह अपलक ताकती है
पता नहीं समझ आती हैं या नहीं
शब्दों से सर्जित मेरी कविताएँ
माँ को?

वह फेरती है सर पर हाथ
नहीं कहती है कुछ भी
भर लेती है हथेलियों में मुख,
बोलती कुछ भी नहीं।

भावातुर हो बह आती है
उसकी आंखों से स्नेह- नदी
डूब-डूब जाता हूँ उस नदी में।

माँ की कविता में शब्द नहीं हैं
शब्दों की कविताएँ
नहीं कर पाती स्पर्श
माँ की कविताओं का ,
काश! हम माँ-सी कविताएँ लिख पाते।

(*पुस्तक : लडकियां छूना चाहती हैं आसमान )
*सर्वाधिकार अशोक  लव  

No comments: