Wednesday 6 February 2013

विषमय बेल और व्यक्ति /अशोक लव

गुरु के निर्देशानुसार नया शिष्य तन्मय होकर पौधों को सिंचित करता था. एक बेल अत्यंत सुंदर थी. शिष्य विशेष रूप से उसे सिंचित करता. उसने उसके आस-पास ईंटों का घेरा बना दिया. प्रतिदिन खुदाई करता,जल देता. बेल निकट के विशाल वृक्ष के सहारे बढ़ने लगी.
गुरु जी प्रतिदिन ध्यान से शिष्य को देखते रहते.
एक दिन शिष्य गुरु जी को बेल दिखाने ले आया. गुरु जी मंद-मंद मुस्कराने लगे. शिष्य ने उनकी मुस्कान का अर्थ जानना चाहा.
" शिष्य, तुम इस  बेल को इतने दिनों से मन लगाकर सिंचित कर रहे हो.मैं चुपचाप देख रहा था. तुम्हें नहीं पता यह विष-बेल है. यह इतनी विषैली  है कि कुछ समय के पश्चात इस विशाल वृक्ष को भी विषमय कर देती."
"गुरु जी, अब क्या किया जाए ? "
"इसे तुरंत काट दो. गहराई से खोदकर इसकी जड़ों को नष्ट कर दो. "
शिष्य ने तुरंत गुरु की आज्ञा का पालन किया.
गुरु जी ने समझाया, " प्रत्येक कार्य  करते समय सतर्क रहना चाहिए. पेड़-पौधों को आंख मूँदकर सिंचित नहीं करना चाहिए. हमें  देखना चाहिए कि कहीं ऐसे पेड़-पौधों को सिंचित तो नहीं कर रहे,जो भविष्य में वन को ही दूषित कर दें,विषमय कर दें. इसी प्रकार हमें  अपने आसपास के व्यक्तियों के प्रति भी सतर्क रहना चाहिए. विषमय व्यक्ति सुंदर बेल के समान बाहर से अच्छे लगने का अभिनय करते हैं. ऊपर से मीठी-मीठी बातें करते हैं. अवसर पाते ही तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति हेतु डस लेते हैं."
---@अशोक लव

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