Saturday 6 February 2010

तुम / अशोक लव

तुम
ज्यों -
अंतिम पहर का स्वप्न ,
ज्यों -
कमल-पाँखुड़ी पर तुहिन- कण ,
ज्यों -
वर्षा धुले आकाश पर इन्द्रधनुष ,
ज्यों-
तितलियों के पंखों पर अंकित गीत,
ज्यों -
मेघों को समर्पित मयूर-नृत्य ,
ज्यों-
जल-तरंगों पर रश्मियों की अठखेलियाँ,
ज्यों-
मानसरोवर में उतरना हंसों का,
ज्यों-
गंगा का भागीरथ हेतु अवतरण ,
ज्यों-
शुष्क चट्टानों पर रुई के फाहों-सा हिमपात,
ज्यों-
भोज-पत्रों पर अंकित ऋचाएँ,
ज्यों-
साधक मन में आलोकित दिव्य-प्रकाश
''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
* पुस्तक- अनुभूतियों की आहटें ( वर्ष-१९९७)
@सर्वाधिकार : अशोक लव

Thursday 4 February 2010

हरियाणा के लघुकथाकार और लघुकथाएँ

डॉ रूप देवगुण के संपादन में हरियाणा के लघुकथाकारों पर महत्वपूर्ण ग्रन्थ प्रकाशित हुआ है--'हरियाणा की प्रतिनिधि लघुकथा। ' इसमें इक्यावन लघुकथाकारों की तीन -तीन लघुकथाएँ संकलित हैं। ' हिन्दी लघुकथा को हरियाणा का योगदान ' - शीर्षक लेख में डॉ रूप देवगुण ने तीस पृष्ठों में हरियाणा और राष्ट्रीय स्तर पर हरियाणा के लघुकथाकारों के योगदान को रेखांकित किया है। यह लेख गहनता लिए है।
इस 199 पृष्ठों के ग्रन्थ के इक्यावन लघुकथाकार हैं-
१.विष्णु प्रभाकर २.डॉ मदन लाल वर्मा ३.पूरन मुदगल ४.डॉ शिवनाथ pराय ५.सुगनचंद मुक्तेश ६.डॉ सुधा जैन ७.रक्षा शर्मा 'कमल' e८.प्रो जितेन्द्र सूद ९.उर्मि कृष्ण १०.प्रो रघुवीर ' अनाम' ११.पृथ्वीराज अरोड़ा e१२.सुखचैन सिंह भंडारी १३.विधिश्री पवन चौधरी ' मनमौजी' १४.प्रो रमेश सिद्धार्थ १५.डॉ सुरेन्द्र गुप्त d१६.डॉ रूप देवगुण १७.रामकुमार आत्रेय १८.प्रो इंदिरा खुराना १९.प्रेमसिंह बरनालवी २०.डॉ सुरेन्द्र वर्मा २१.बन्सीराम शर्मा २२.डॉ अशोक लव २३.डॉ श्याम सखा 'श्याम' २४.विकेश निझावन २५.मधुकांत २६.मधुदीप r२७.हरनाम शर्मा २८.डॉ मुक्त २९.कमलेश भारतीय ३०.डॉ राजकुमार निजात ३१.कमल कपूर ३२.डॉ रामनिवास मानव ३३.डॉ अशोक भाटिया ३४.रोहित यादव ३५.सत्यप्रकाश भारद्वाज ३६.कृष्णलता यादव ३७.डॉ स्नेही ३८.डॉ शील कौशिक ३९.डॉ सत्यवीर मानव ४०.सुरेन्द्र कुमार अंशुल ४१.रामकुमार गहलावत ४२.संतोष गर्ग ४३.सुशील डावर 'साथी' ४४.इंदु गुप्ता ४५.सुरेश जांगिड उदय ४६.अनिल शूर आज़ाद ४७.डॉ बीजेन्द्र जैमिनी ४८.डॉ प्रद्युमन भल्ला ४९.अरुण कुमार ५०.अशोक माधव ।
ग्रन्थ के अंत में लघुकथाकारों के परिचय दिए गए हैं। इनसे उनसे संपर्क में सुविधा रहेगी।
डॉ रूप देवगुण कुशल संपादक हैं। यह ग्रन्थ उनके इस स्वरूप का परिचायक है। लघुकथा पर शोध करने वाले विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए यह अत्यंत उपयोगी है।
पुस्तक प्राप्त करने के लिए संपर्क :
डॉ रूप देवगुण , डॉ गांधी वाली गली,१३/६७६,गोबिंद नगर,सिरसा (हरियाणा)
(एम) 09812236096

Sunday 31 January 2010

पुत्तर दे व्याह दा गीत /पंजाबी लोक - गीत

हरया नी मालण हरया नी भैणे
हरया ते भागी भरया
जित दिहाड़े मेरा हरया नी जमया
सोयिओ दिहाड़ा भागी भरया।
जमदा हरया पट्ट वलेटिया
कुछड़ देयो एना माईआं।
नाहता ते पोता हरया रेशम लपेटिया
कुछड़ दयो सक्कियाँ भैणां।
की कुझ मिल्या दाईआँ ते माईआँ?
की कुझ मिल्या सक्कियाँ भैणां ?
पंज रुपये एनां दाईआँ ते माईआँ
पट्ट दा तरेवर सक्कियाँ भैणां।
पुछदी पुछांदी मालण नगरी विच आई
शादी वाला घर केहड़ा ?
उचड़े तम्बू सब्ज़ कनातां
शादी वाला घर इहो ।
आ मेरी मालण बैठ दहलीजे
कर सेहरे दा मुल्ल।
इक लक्ख चंबा , दो लक्ख मरूआ
तिन्न लक्ख सेहरे दा मुल्ल।
ली मेरी मालण बन्न नी सेहरा
बन्न लाल जी दे मत्थे भागी भरया सेहरा । *
'''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
* इह लोकगीत पुत्तर दे व्याह वेले गाया जांदा हैऐनू घोड़ी कहंदे हन

Friday 29 January 2010

आ मिल यार .../ बुल्लेशाह

मिल यार सार लै मेरी
मेरी जान दुखन ने घेरी
अन्दर ख़्वाब विछोड़ा होया
खबर पैंदी तेरी
सुन बन विच लुट्टी साईयाँ
चोर संग ने घेरी
मुल्ला काज़ी राह बतावन
दें धर्म दे फेरे
इह तां थक जग दे झीवर
लावन जाल चुफेरे
करम शरां दे धर्म बतावां
संगल पावन पैंरी
जात मज़हब इह इश्क पुछदा
इश्क शरा दा वैरी
नदियों पार मुल्क सज्जन दा
लोभ लहर ने घेरी।
...........................
प्रतिक्रियाएँ
Muktesh Chibber commented on your Note "आ मिल यार .../ बुल्लेशाह":

"fantastic....how do u do the script ...fasinating..."

Vijay Datta Raheja commented on your Note "आ मिल यार .../ बुल्लेशाह":

"Another beauty.............u r on a roll.............!!!"

Kshama Bali commented on your Note "आ मिल यार .../ बुल्लेशाह":

"nice one just now heard gazal from nusrat...bulleshaw's....makke gayan gal mukdi nahi............its so meaningful..........."
Ashoke Mehta
Ashoke Mehta
excellent work

* ब्लॉग पर प्रतिक्रिया
Blogger Fauziya Reyaz said...
ACHHA HAI....PAR SAMJHNE MEIN KUCH KUCH DIKKAT HUI...BUT ACHHA LAGA
Blogger Suman said...
nice


कोई नहीं है आसपास / अशोक लव

कोई नहीं है आसपास
फिर भी हवाओं में है
किसी की सुगंध
महका रही है भीतर तक
कर रही है उल्लसित।

वृक्षों के पत्तों में प्रकम्पित
चूड़ियों की खनखनाहट
आकाश में टंगा सूर्य
माथे की बिंदी - सा
मक रहा है।

जनवरी की कोसी-कोसी धूप
किसी की निकटता -सी
लग रही है सुखद ।

दूरियों की दीवार के पार
है कोई
और यहाँ हैं -
नदी से नहाकर निकली
हवाओं का गीलापन लिए
निकटता के क्षणों के अहसास।

किसी के संग न होने पर भी
आ रही है
हवा के प्रत्येक झोंके के साथ
सुपरिचित महक ।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
* पुस्तक _ लड़कियां छूना चाहती है आसमान ( प्रेम खंड )
प्रतिक्रियाएँ
Vikram DuttVikram Dutt bahut khub sir ji.....

Jenny Shabnam
Jenny Shabnam
ashok ji,
dubara padhi, utni hin achchhi lagi, bahut bahut badhai aur shubhkamnayen.



Neeraj Sharmaa
Neeraj Sharmaa
Sundar..................♥



Shreesh Chandra
Shreesh Chandra
बेहतरीन लाजवाब


Vijay Datta Raheja
Vijay Datta Raheja
I loved it such beautiful words................loved it !!



Sarojini Sahoo
Abha KhetarpalAbha Khetarpal
बेहद खूबसूरत

Sudhir Mehta
Wah Ashok ji ...

Kshama Bali
Kshama Bali beautiful...........enjoyed

Vinay Mehta
Vinay Mehta
bahut khoob, Sir!!

Thursday 28 January 2010

Prashant Bakshi commented on your Note "Become a man of value":

"I CONCURRR WITH WHAT EINSTEIN BUT IN THE WORLD OF TODAY PEOPLE HAVE SACRIFICED THEIR VALUES TO BE SUCCESSFUL , THE MORE CROOK & CUNNING YOU ARE THE MORE SUCESSFUL YOU BE THIS IS THE MANTRA IN KALYUG"

Wednesday 27 January 2010

Become a man of value

" Try not to become a man of success but rather try to become a man of value''

*Albert Einstein.....

''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
फेस बुक पर जिन्होंने पसंद किया


Prashant Bakshi
Prashant Bakshi
I CONCURRR WITH WHAT EINSTEIN BUT IN THE WORLD OF TODAY PEOPLE HAVE SACRIFICED THEIR VALUES TO BE SUCCESSFUL , THE MORE CROOK & CUNNING YOU ARE THE MORE SUCESSFUL YOU BE THIS IS THE MANTRA IN KALYUG

Friday 22 January 2010

Ashok Lav From Wikipedia





Dr. Ashok Lav(Delhi) is a noted Hindi language author and poet[1].

Works and honours

A recipient of numerous awards related to Hindi literature, including the Eklavya award, his more well known works include:

  • Shikhron se aage (novel- literally, "Beyond peaks")
  • Anubhootiyon ki aahaten (collection of poems,literally, "The approaching footsteps of sensations")
  • Larhkiyan Choonaa Chahtee Hain Aasmaan (collections of poems- literally, "Girls want to touch the sky")
  • Phulvaree (songs for children- literally, "A garden of flowers")
  • Band darvaazon par dastaken (short stories- literally, "Knocking on locked doors")
  • Salaam Dilli (short stories- literally, "A salute to Delhi")
  • Pathron se bandhe pankh (short stories- literally, "Feathers tied to stones")
  • Khidkiyon Par Tange Log (short stories(ed)-literally,"People Hanged on Windows"

His book Hindi ke Pratinidhi Saahityakaaron se Saakshaatkaar, a collection of interviews with writers representative of Hindi literature, was released by the Vice President of India, Dr. Shankar Dayal Sharma on February 9, 1990.[2]

Personal life

Dr. Lav belongs to the Mohyal community, usually more noted for its tradition of military service. Besides being a writer, he is also the Managing Director of an IT firm.[citation needed] He also is the editor of the Hindi section of the Mohyal community magazine, the Mohyal Mitter since July 1987.

References

  1. ^ Who's Who of Indian Writers, by Kartik Chandra Dutt, Sahitya Academy 1999 Page 668
  2. ^ Dr. Lav honoured with The Eklavya Award

धुंध / अशोक लव

धुंध
"""
मित्र !
जब धुंध जब इतनी घिर जाए
कि शीशे के पार कुछ दिखाई न दे
तब -
हथेलियों से शीशे को पोंछ लेना
फिर
शीशे के पार देखना
सब कुछ साफ़ साफ़ दिखने लगेगा।

मैं तो वहीँ खड़ा था
जहाँ अब दिखाई देने लगा हूँ
सिर्फ धुंध ने तुम्हे
बहका रखा था।
'''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
फेस बुक पर जिन्होंने पसंद की
Kshama Bali
Kshama Bali
bilkul sahi...............sirf dund saf karne ki der ha.......

Thursday 21 January 2010

वरिष्ठ कवि-समीक्षक डॉ ब्रज किशोर पाठक : परिचय / अशोक लव

जन्म : १५ फरवरी १९३८
शिक्षा :एम ( लब्ध स्वर्ण पदक ), पी एच डी (१९६६)
शोध का विषय : भारतेंदु की गद्य भाषा ( प्रकाशित १९७२)
संपादन: ज्योति प्रकाश : व्यक्तितत्व और कृतित्व ( प्रकाशित १९८०)




कृतित्व
कविताएँ -

*उत्तम
पुरुष : एकवचन
*गौतम
की चिंता ( लम्बी कविताएँ)
*द्रवित
गीत
*लंगड़े कुत्ते का भाषण
*आम के पेड़ का अर्थ
* परमेसर की चिंता
*यह विजय अभियान है
*आजादी दुपहरी ढल गई
*भारत
गीता
*पंचम वेद का सृजन
*मैं अकेला

आलोचना

(शोध-आलेख)
* बोधीदास : जीवनी और कृतित्व
*जन
हरिनाथ : व्यक्तित्व और कृतित्व
*तुलसीराम
:व्यक्तित्व और कृतित्व
*
बिसेसर प्रसाद केशरी और अशोक पागल के व्यक्तित्व और कृतित्व ( सम्मिलित रूप में इन दो शोध आलेखों को अन्तरंग- के रूप में प्रकाशित )
*अशोक लव के कृतित्व पर आधारित ' साहित्यकार अशोक लव : बहुआयामी हस्तक्षर ' ( प्रकाशित, आलेख-संग्रह )
लघुकथा पर आधारित शोध आलेख प्रकाशित
....................................................................
*लघुकथा का शरीर विज्ञान
*लघुकथा की लघुकथा
* तत्पश्चात का दायरा
*बलराम अग्रवाल की लघुकथाएँ
* श्यामल की लघुकथाएँ
*लघुकथा एक विधा है
*अशोक लव की लघुकथाएँ
*लघुकथा : दशा और दिशा
मूल्यांकन
...............
* डॉ लालजी वर्मा की काव्य पुस्तकें
.सरकंडों के बीच
.मुट्ठी भर धूप
*अशोक लव की काव्य पुस्तक
लड़कियाँ छूना चाहती हैं आसमान
*सिद्धेश्वर नाथ ओंकार की कविता पुस्तकें
प्रकाश्य
............
साहित्य-इतिहास के अचर्चित पृष्ठ ( जिन पर लिखा नहीं गया , संस्मरण )

शोध कार्य निर्देशन और परीक्षण
.....................................................
अनेक शोधार्थियों का निर्देशन
अनेक शोध ग्रंथों का परीक्षण
* संपर्क : निकट-बी एस एन एल कार्यालय , श्रीराम पथ- ,पांकी रोड , रेड़मा , डाल्टनगंज ( मेदिनीनगर) झारखण्ड

Wednesday 20 January 2010

माँ सरस्वती वंदन :वसंत पंचमी

। । वंदना । ।
या कुंदेंदु तुषार हार धवला या शुभ्र वस्त्र आवृता
या वीणा वर दंड मंडित करा या श्वेत पद्मासना । ।
या ब्रह्मा अच्युत शंकर प्रभृति भिर्देविः सदावंदिता
सा
मां पातु सरस्वती भगवती निःशेष जाड्यापहा । ।
। । वंदना । ।
शुक्लां ब्रह्म विचार-सार-परम आमाद्यं जगत व्यापिनीं
वीणा पुस्तक धारिनीम भयदां जाड्या अन्धकार अपहां । ।
हस्ते स्फटिक मालिकां विदधतीं पद्म आसने संस्थितां
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धि प्रदां शारदां । ।
सरस्वती
महाभागे विद्ये कमल लोचने
विद्या रूपे विशाल अक्षे विद्यां देहि नमो: स्तुते । ।

Wednesday 13 January 2010

Be nice

Be nice to people on your way up because you might meet them on your way down.
~Alexandre Dumas pere

मन रे संतोष कर !

सन्तोषः परमो लाभः सत्सङ्गः परमा गतिः ।
विचारः परमं ज्ञानं शमो हि परमं सुखम् ॥
Contentment is the highest gain, Good Company the highest course, Enquiry the highest wisdom, and Peace the highest enjoyment.

Tuesday 5 January 2010

Happy new year

Sarojini Sahoo 31 December
New is the year, new are the hopes and the aspirations, new is the resolution, new are the spirits and forever my warm wishes are for you. Have a promising and fulfilling new year.

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Rameshwar Prasad With… Beauty,.. Freshness,.. Dreams,.. Truth,.. Imagination,.. Feeling,.. Faith,.. Trust,.. Welcome The Beginning of a new year!... I Wish U a VERY HAPPY NEW YEAR 2010!... R. Prasad, Director,

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Soumi Roy 01 January
Dear Sir, wish you and your family a very happy, prosperous, fun filled and successful new year ahead.
with warm regards
Soumi
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Helpthe Humanity 01 January
Wishing you, your family and all your loved ones a New Year filled with good health, good luck, eternal joy, countless smiles and ever escalating prosperity :-)
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Susan Apollon 31 December
Wishing you all a very HAPPY NEW YEAR!
Buddhism Isis 01 January
HAPPY NEW YEAR 2010
MAY WE FULFILL OUR DREAMS TOGETHER

BONNE ET HEUREUSE ANNEE 2010!

Isis
Sri
angelaa
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Tajendar Singh Bedi
Happy New Year

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Ankur Sancheti 31 December
My Friend,

Better than any New Year has been and will be, Better than any joy known or to be known, Better than any wish realized or to be realized-that's how, this New Year should be for you.

Have a great 2010. :-)

Attract a Woderful Life ahead for your family, friends and for Yourself.

We believe to see a peaceful 2010, hope No More Wars... "Lets Make the World, He Meant it to Be."

Your Friend,
Ankur Sancheti

http://www.powerlawofattraction.com
http://www.powerlawofattraction.com/forum
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Shiv Kumar 01 January
Wish you very happy new year !!
Thanks for being member of swar Foundation group
Swar Foundation India and Swar International France are working for the promotion of Indian arts, music and culture all over
thanks again for being part of this
kind regards
and happy new year !!
shivkumar
www.ptshivkumar.com
www.myspace.com/shivkumars
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Atul Mishra 01 January
नव प्रभात,नव सूर्य उदय हो !
नया वर्ष शुभ मंगलमय हो !!
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S Bedi 31 December 2009 at 08:55 Reply
Happy New Year! - bonne année! - Feliz Ano Novo! - Feliz año nuevo! - 新年快乐! - Szczęśliwego - Nowego Roku! - Boldog új évet! - Gelukkig nieuwjaar! - La Mulţi Ani! - İyi seneler! - Gott Nytt År! - Buon anno! - Onnellista uutta vuotta! - Godt nytt år! - Štastný nový rok - Sretna Nova godina! - Ευτυχισμένος ο καινούργιος χ...ρόνος - Godt nytår! - Feliĉan novjaron! - Srečno novo leto - Feliç Any Nou! -

Happy New Year by ABBA
http://www.youtube.com/watch?v=csJt_ceU2iM&NR=1
'''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''

Aroon Kumar *•~♥♥♥~•* Love & Light always all ways *•~♥♥♥~•* Love you*•~♥♥♥~•*


Priya Deelchand My dearest friend,
Wish you a Very Happy New Year 2010 ♥ ♥ ♥ May you have a year filled with love, health, wealth, joy, success, abundance, peace and wonderful people। May 2010 be your best year ever!!! ♥ lots of love, Priya :)) ♥ ♥ ♥


Pam Richmond As we look at a block of time. We see 12 months, 52 weeks, 365 days, 8760 hours, 525,600 minutes, 31,536,000 seconds. And all is a gift from God. We have done nothing to deserve it, earn it, purchase it. Like the air we breathe, time comes to us as a part of life. The gift of time is given equally to each person. ... We all have the same 24 hours every day...every day...How will you invest your time? Choose to make every minute count. Walk in love

Spirited Daydreams Sent with Love, Joy and Happiness for you!

Parvatimaa Carina
may this new year be full of peace and love and joy and grace for all the creatures...BE YOURSELF AND SPREAD THE UNITY...

Barbara E. Babich-Savin Wishing everyone a Happy, Healthy, Joyful and filled with Love, NEW YEAR 2010!!! to our New Beginnings!!!

Astrid Kowlessar Win in 2010! All the best

Deborah Morrison Dearest Friend,
May Peace & Prosperity manifest in your life now, throughout this New Year & forever...


Rahul Ranjan Happy new year friends


Piyali Ganguly May the New Year be replete with blessings, love, peace, prosperity, health, joy and laughter for you and yours। May all your dreams, wishes and hopes come true। Remember to befriends your Soul and the Let the hand of God work through you. :-) ♥


माया:

आया है नव वर्ष दो हजार दस,
भ्रस्टाचार,आंतकवाद
शोषण,प्रदुषण,
महिलाओ बच्चो पर अत्याचार,
दलितों को दुत्कार,
अब करो बस,
कब तक रहेंगे हम बेबस,
सब मिलकर हम करे
बेरोजगारी को विवश,
काम क्रोध मद मोह,
को करे हम अपने वश,
स्वागत करे नव वर्ष
दो हजार दस।
''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
Sarojini Sahoo 03 January

Wishing you a happy and prosperous 2010.
Hope to share more in this new year.
'''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
Chakshu Dutta 02 January at 11:41
happy new year.sir sorry i was lost my cell.pls can u gve me call or number.thanx
''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
Pushkar Pushp 02 January
मीडिया खबर ग्रुप के सभी साथियों को नए साल की बधाई. आप सभी के लिए नया साल मंगलमय हो. www.mediakhabar.com
'''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
Tonio Mario 01 January at 23:58
Hello Ashok, Happy New Year
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Geoffrey Keyte 01 January at 13:04 Reply
May 2010 bring you everything that your heart desires
May your mind be filled with wondrous joy, peace and light
And an everlasting energy that never tires
Of creating a loving universe, day and night.

With many healing blessings

Geoffrey
'''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''

Nenari Diamondlady Diamond May all your dreams come true in 2010 and always, in all ways. Happy New Year! Infinite Love and Light ~Nenari

Tuesday 22 December 2009

माँ नहीं रहीं / अशोक लव

२० दिसंबर २००९ को माँ ने इस संसार से विदा ले ली देह पंचतत्व में , आत्मा परमात्मा में विलीन हो गई शब्द माँ के चले जाने की वेदना को अभिव्यक्त करने में असमर्थ हैं
''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
*Mr. Ashok Lav / Mr.Raman / Mr.Kamal,

We are aggrieved to learn about the sad demise of your beloved mother. No words of sympathy can bring you solace, but one can share it,being the sailor of the same boat.
Loss of one's * mother is like loosing the shelter in heavy rains or from burning sun in summer, but one can feel the nearness of its beloved by sharing memorable moments of his/her with his Nears & Dears.
May GOD, your mother's soul lay calm in heaven & showers thy blessings on all in the family.

With love &affection
Yours
Subhash Mehta
Divyaa Mehta
{Ex-Gen.Secy. UP Mahila congress}
Divyalok
Gandhi Colony.


*Dear Sir,
Please accept our heartfelt condolence on the sad demise of your mother. Inspite of her golden age; a mother is the mother and the is irreparable. May the God bless her soul.
Highest regards
Suresh and Anita

*आदरणीय अशोक जी!
आपकी माता जी के देहावसान की सूचना मिली, हम सपरिवार इस दुःख की घड़ी में आपके साथ हैं .ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें, व आपको मातृ-विछोह से उपजे कष्ट को सहन करने का साहस प्रदान करें.......
आपके दुखों में भी आपके साथ----- ज्योत्स्ना & नामदेव पाण्डेय ,

*
आरिफ जमाल
आप की माता जी के निधन की सूचना से काफी सदमा पहुंचा.कुछ बातें इंसान के हाथ में नहीं है -यहाँ पर ही उस सर्वोच्च-सर्व सक्तिमान के आगे सब बेबस हैं.इश्वर आप सब परिवार के सदस्यों को इस दुःख को सहने की शक्ति दे और दिवंगत आत्मा को अपने चरणों में स्थान प्रदान कर उनको शान्ति प्रदान करे.
न्यू आब्ज़र्वर पोस्ट परिवार के सभी सदस्य इस दुखद समाचार पर अपनी शोक संवेदना प्रकट करते हैं.
''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''

आदरणीय डा० लव जी ,
नमस्कार
पूजनीय माता जी के निधन के समाचार से काफी दुःख पहुंचा .आज जब मैं नव
वर्ष के दिन जय मोहयाल वेबसाइट देख रहा था तभी इस बारे में पता चला .
परमपिता परमात्मा उनको मोक्ष प्रदान करे तथा आप लोगो को ये सदमा सहने की
शक्ति दे

नरिंदर छिब्बर,अंजू छिब्बर
पानीपत
''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''

Dear Ashok uncle ji

I was deeply saddened to hear about the sudden and tragic demise of your mother Smt.Krishana mehta ji Lau, I know how difficult this must be for you and your family. You are in our thoughts and prayers. Smt.Krishana mehta ji Lauwas such a kind, gentle soul. She would do anything to help someone in need.

I know how much you will miss the departed soul. I encourage you to draw on your strength and the strength of your family. May God bless you and your family during this time and always.

With profound grief I extend my Heartiest Condolences.

For Mohyal sabha Amritsar

(Anil Dutta)

(Sec. Youth Affairs)

(M) 9878391830


Wednesday 16 December 2009

लड़कियाँ छूना चाहती हैं आसमान


लड़कियाँ छूना चाहती हैं आसमान
कविताएँ

Saturday 12 December 2009

'खिड़कियों पर टंगे लोग' के लघुकथाकार -१/ अशोक लव



खिड़कियों पर टंगे लोग ( लघुकथा - संकलन ) में मेरे अतिरिक्त डॉ राम कुमार घोटड़ , डॉ नीना छिब्बर, आर के मोहन,सुषमा भंडारी , सत्य प्रकाश भारद्वाज और शोभा रस्तोगी 'शोभा' की लघुकथाएँ इसमें संकलित हैं। इनकी लघुकथाओं को यहाँ दिया जा रहा है।
इस कड़ी में सर्वप्रथम ' सत्य प्रकाश भारद्वाज ' की लघुकथाएँ
*परिचय
जन्म- ५ दिसंबर १९५५,दिल्ली , एम ए बी एड ।
प्रकाशित कृति : लुटेरे छोटे-छोटे ( लघुकथा-संग्रह) इस पर एम फिल हुई।
सचिव-हरियाणा प्रादेशिक हिन्दी साहित्य सम्मेल्लन ( सिरसा )
स्थायी -निवास : ६१५,बांकनेर , दिल्ली -११००४९
संपर्क- द्वारा डॉ रूप देवगुण,डॉ गांधी गली, ५/१९०,गोविन्द नगर,सिरसा (हरियाणा)
(एम)०९४६६२६६५३६
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खिडकियों पर टंगे लोग ( लघुकथा संग्रह): संपादक अशोक लव


KHIRKHIYON PAR TANGE LOG
by ASHOK LAV
ISBN: 9788190858700
Subject: STORIES
Price: INR 125.00

Thursday 10 December 2009

" महात्मा की बेटी और सियासत " उपन्यास का विमोचन कार्यक्रम

पलामू (डाल्टनगंज ) के साहित्यकार-पत्रकार श्री मनोज ज्वाला के उपन्यास " महात्मा की बेटी और सियासत " का लोकार्पण १३ दिसंबर २००९ को हिन्दी भवन , विष्णु दिगंबर मार्ग (निकट आई .टी..),नई दिल्ली में प्रातः १०:३० बजे होगा
अध्यक्षता : श्रीमती मृदुला सिन्हा
( पूर्व अध्यक्षा -केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड,भारत सरकार)
लोकार्पण: श्री श्रीकांत जोशी
( संरक्षक-हिन्दुस्थान समाचार )
वक्ता: श्री राम बहादुर
( संपादक-प्रथम प्रवक्ता , नई दिल्ली )
डॉ कुलदीप चाँद अग्निहोत्री
( निदेशक, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय )
उदघाटन : अशोक लव
( वरिष्ठ साहित्यकार)
समारोह " राष्ट्रीय पत्रकारिता कल्याण न्यास , नई दिल्ली द्वारा आयोजित किया जा रहा है
निवेदक : राज कुमार शर्मा ( सचिव)

Wednesday 9 December 2009

कुछ छिन रहा है / अशोक लव

घबराहट है
वेदना है
छटपटाहट है
छिन रहा है
बहुत-बहुत प्रिय।

और विवशता है कि
असहाय हैं
मूक दर्शक हैं
रोक पाने की सामर्थ्य है
हठ करने का साहस
बस निवेदन और निवेदन
प्रार्थनाएँ ही प्रार्थनाएँ !

कितना असहाय हो जाता है
मनुष्य
और नियति को स्वीकार करने को
हो जाता है बाध्य।
'''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
* .१२.०९ , माँ के लिए

Thursday 3 December 2009

ऑरकुट : 'जी भाई साहब ' कविता पर कमेंट्स


Kavi Kulwant:
बाकी सब क्या कहें
कविता लिखना अलग बात है
ज़िंदगी जीना अलग बात है। "
,,.bahut khoob lazwab..
(ऑरकुट)

शेफाली पाण्डे:
बहुत सुन्दर ...
(ऑरकुट)

shyamal:

रचना के भाव ने प्रभावित किया अशोक भाई।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot .com

Jenny:
अशोक जी,
प्रणाम! आपकी ये कविता ''जी भाई साहब'' बिल्कुल अलग अंदाज़ में है, लेकिन इसमें भी समाज के सच का हीं एक रूप है, हमेशा की तरह कुशल लेखन|

Saturday 28 November 2009

फेसबुक पर " जी , भाई साहब " कविता पर कमेंट्स

*Purnima Varman
सही कहा यथार्थवादी रचना तो है ही प्रस्तुति भी ज़बरदस्त है।

*Anand Rai
"भाई साहब बहुत ही गहराई है। एक साथ कितने चेहरों से पर्दा उठा दिया. विश्वविद्यालयों में, समाज में या सियासत में जो कुछ हो रहा है, उसका नंगा सच. रिश्तों के टूटने की कशिश. एक बेचैनी. और सबसे बड़ी चीज मनुष्य के अन्दर की गहरी संवेदना, फोन कटते ही और घनीभूत हो जाती है. बधाई. "

*Rani Thompson
"मन रूंध गया। "

*Nira Rajpal
"दिखना कम हो गया है
अब पढ़ना - पढ़ाना छूटता जा रहा है।
तुम्हारी कविता वाली पुस्तक मिल गई है
समीक्षा भी लिख देंगे
एक लड़की आती है
पी एच डी कर रही है
बोल-बोलकर उससे लिखवा देंगे।
bahut hi reality base poem hai jisme dard ki saaf jhalak dikhayi deti hai"

*Ranju Bhatia कहते बुनते यह लफ्ज़ ..सुन्दर

*Rajeev Chhibber
"yahi zindagi ka sach hai aur marm bhi .ese hi likhte rahiye ashok ji mohyals bandook se ladna jante hain aur kalam se bhi ."

*Rakesh Naraian
"तुम्हारी भाभी ने आम का जो पेड़ लगाया था वह तेज़ आँधी से उखड़ गया है। वह तो चली गई कई बरस हो गए आम का पेड़ देखकर फल खाकर अच्छा लगता था अब और सन्नाटा पसर गया है
wah ..bhabhi ke lagaye aam ke ped ki ukhadne ki ghatna se aaj ki vastvik sthithi ka ahsas keraya aapne ..wah ...bahut hi gahan vedna se ggunthi hue ye panktiyan bahut kuch kah gayi..."

*Kuldeep Singh
"ashok sir
akhir kab tak vastvikta se munh churaya jaye
ek din to jwalamukhi bisfotit hona hi hai
dekhte hain vo sunahla waqt kab aaata hai "

*Ashoke Mehta
"यही हमारी नियति है ,जीवन की सच्चाई को बहुत सुंदर ढंग से आपने प्रस्तुत किया है !"

*Narinder Kumar Vaid "
"Aak kal ke satithi or jeewan ka ekdam sahi ucharan kiya hai aap ne.

*Manish Jain
"nice one."

*Rajesh bali



* Jenny Shabnam
"ashok ji,
aapki kavita itni saralta se behad gahri baat kah jati hai jo aam jiwan se judi hoti hai, behad tathyapurn abhivyakti in shabdon mein...
बाकी सब क्या कहें
कविता लिखना अलग बात है
ज़िंदगी जीना अलग बात है। "
bahut badhau aur shubhkamnayen"


*Abha Khetarpal

"bahut kuchh keh daalti hain hamesha apki panktiyan..."

*अशोक राठी
"बस एक ही बात कहूँगा सर... गागर में सागर ... साधुवाद "

Friday 27 November 2009

जी भाई साहब !/ अशोक लव


"बस अब कविता- कहानी सब छूट गया है
घुटनों का दर्द बढ़ गया है
तुम्हारी भाभी ने आम का जो पेड़ लगाया था
वह तेज़ आँधी से उखड़ गया है।
वह तो चली गई
कई बरस हो गए
आम का पेड़ देखकर
फल खाकर
अच्छा लगता था
अब
और सन्नाटा पसर गया है।

इधर पानी एक बूँद नहीं पड़ा है
एकदम सूखा पड़ गया है
लोग भूखे प्यासे मर रहे हैं
नक्सली और मार रहे हैं
नेता लोग सब क्या करेंगे?

यहाँ तो एक-एक मिनिस्टर भ्रष्ट है
सी बी आई के छापे पड़े हैं
कई मिनिस्टर छिप-छिपा रहे हैं
खिला-विला देंगे
सब केस बंद हो जाएँगे।

दिखना कम हो गया है
अब पढ़ना - पढ़ाना छूटता जा रहा है।
तुम्हारी कविता वाली पुस्तक मिल गई है
समीक्षा भी लिख देंगे
एक लड़की आती है
पी एच डी कर रही है
बोल-बोलकर उससे लिखवा देंगे।

बाकी सब क्या कहें
कविता लिखना अलग बात है
ज़िंदगी जीना अलग बात है। "

और उन्होंने फ़ोन रख दिया।


Thursday 26 November 2009

रंगहीन / अशोक लव


हिल गए सब रंग
रंग-बिरंगी रोशनियाँ बिखर गईं
बिखरती चली गईं।

रंगहीन
उत्साहहीन
सुबह-शाम।

क्षितिज के छोर अंधियाले
किसी के आने की
संभावनाएँ।

बिखरन और सिर्फ़ बिखरन
मुट्ठियों से सरकते
पल-पल

आहट
दस्तक
बस
बंद किवाड़ों के पीछे
पसरा ज़िंदगी का रंगहीन कैनवस।

Wednesday 25 November 2009

रश्मि प्रभा द्वारा की समीक्षा " लड़कियाँ छूना चाहती हैं आसमान'

सूर्य और अशोक लव
अशोक लव जी एक बहुआयामी प्रतिभा के विशिष्ट लेखक हैं--उनके विषय में लिखना,मुझे गौरवान्वित तो कर रहा है,पर एक-एक शब्द सूर्य के निकट दीये की मानिंद ही प्रतीत होंगे

अशोक लव जी से मेरे परिचय का माध्यम उनका ब्लॉग बना - "लडकियां छूना चाहती हैं आसमान" विषय ने मुझे आकर्षित किया। लड़कियों के प्रति आम मानसिकता हमसे छुपी नहीं है.....उससे अलग उनकी ख्वाहिशों को किसने परिलक्षित किया , यह जानने को मेरे कदम उधर बढ़े,
'बेटियाँ होती ठंडी हवाएं
तपते ह्रदय को शीतल करनेवाली,
बेटियाँ होती हैं सदाबहार फूल ,
खिली रहती हैं जीवन भर .....'
मैं मुग्ध भाव लिए पढ़ती गई और अपने विचार भी प्रेषित किए, मेरी खुशी और बढ़ी,जब मैंने उन्हें ऑरकुट पर भी
पाया और विस्तृत रूप से उनकी उपलब्धियों के निकट आई।
इनको पढ़ते हुए लगा , समाज की संकीर्ण मानसिकता के आगे लड़कियों की महत्वकांक्षा को इन्होंने बखूबी परिलक्षित किया है;
' लड़कियाँ
अपने रक्त से लिख रही हैं
नए गीत
वे पसीने की स्याही में डुबाकर देह
रच रही हैं
नए ग्रन्थ !'
लड़कियों की खुद्दारी को परिभाषित करती हैं,वरना पूर्व समाज का ढांचा था,
'पुत्रियाँ होती हैं जिम्मेदारियाँ
जितनी जल्दी निपट जाए जिम्मेदारियाँ
अच्छा रहता है..........'
दर्द का एक आवेग उभरता है इन पंक्तियों में -
'पिता निहारते हैं उंगलियाँ
जिन्हें पकड़कर सिखाया था
बेटियों को टेढ़े - मेढ़े पाँव रखकर चलना...........
कितनी जल्दी बड़ी हो जाती हैं बेटियाँ '
कविताओं की यात्रा के दौरान मुझे लगा कि आए दिन की घटनाओं से इनकी निजी ज़िन्दगी भी प्रभावित होगी, यानी किसी बेटी की ज़िन्दगी का कोई पक्ष और अपने विचारों की रास थामकर मैंने पूछ ही लिया........मुझे बहुत खुशी हुई ,जब मैंने जाना कि इनकी तीन पुत्रियाँ (ऋचा,पल्लवी,और पारुल),इनके विचारों की उज्जवल प्रवाह हैं, काव्य की स्तम्भ हैं ।
इनकी सूक्ष्म विवेचना इनके सूक्ष्म संवेदनशील मन को दर्शाती है,जो समाज के घृणित घेरे से निकलकर लड़कियों के आसमानी ख्यालों को,उनकी ऊँची उड़ान को, शब्दों की बानगी देती है।
अशोक जी ने स्त्री के हर रूप को सामाजिक कैनवास पर उतारा है और विभिन्न विशिष्ट रंगों से संवारा है - माँ के रूप को चित्रित करते हुए कहा है;
'माँ !
उर्जावान प्रकाशमय सूर्य-सी
रखती आलोकित दुर्गम पथ
करती संचरित हृदयों में
लक्ष्यों तक पहुँचने की ऊर्जा !'
एक युवती,एक बहन,एक पत्नी को शब्दों की अद्भुत बानगी दी है।
भ्रूण ह्त्या के ख़िलाफ़ भी एक लड़की को दृढ़ता दी है -
' माँ !
तुम स्वयं को भूल गई,
तुम भी बालिका थी,
पर नहीं की थी
तुम्हारी माँ ने तुम्हारी ह्त्या
दिया था तुम्हें जन्म
दिया था तुम्हें ज़िंदा रहने का,
जीने का अधिकार !'
इसी समाज का कवि भी है,पर अपनी कलम को तलवार बनाकर पुरुषों की मानसिकता पर हर तरह से वार किया है,जो वन्दनीय है। मन के हर भावों को प्रस्तुत करते हुए , अपनी लम्बी यात्रा के हर अनुभव को सार्थक बनाया है। सत्य का पुट हर कविता में है , जिसने स्त्री के हर दर्द और निश्चय को चित्रमान कर दिया है दुःस्वप्न और वर्तमान के अंतःकरण में खुले आकाश को विस्तार दिया है। सृजन के क्षणों में अचेतन का दर्द अधिक मुखर है,हर कविता जीवंत लगती है -
'बेटियाँ होती हैं मरहम
गहरे-से-गहरे घाव को भर देती हैं
संजीवनी स्पर्श से ...........
लड़की के कोमल स्वरुप को दर्शाती है
मातृत्व को कवि ने 'कविता' का दर्जा दिया है-

'माँ की देह से सर्जित देहें
उसकी कविताएँ हैं
बहुत अच्छी लगती हैं माँ को
अपनी कविताएँ !'
संघर्ष का ताना-बाना रचते हुए कवि ने नारी की जिजीविषा को एक सांकेतिक स्वरुप में पिरोया है;
'तपती है मोम
आग बन जाती है
चिपककर झुलसा देती है !
...

समयानुसार जीवन को मोम बनना पड़ता है..'
कविताओं में शुरू से अंत तक प्रवाह बना रहता है. कविताएँ दिल को छूती हैं। हर सन्दर्भ में कवि की चेतना जागृत है। संकलन की बहुत सारी रचनाओं में प्राणों की आहत वेदना झलकती है ।
रचनाओं के बीच से गुजरते हुए मुझे हर पल एहसास हुआ कि कवि ने सामाजिक विषमता को नज़दीक से महसूस किया है. एक अनुभवी दस्तावेज़ की तरह उनकी भावनाएँ पुस्तक को एक नया आयाम देती हैं।
इनदिनों अपने समय का आइना बनकर लड़कियों कि छवि को दर्शानेवाला धारावाहिक 'बालिका वधू' लड़कियोंकी स्थिति को उजागर करता है । एक13-14साल की लडकी , एक 35वर्ष का पुरूष ! ऐसी बंदिशों से बाहर निकलकर लड़कियों ने अपनी मर्यादा की नई तस्वीर बनाई है , जिसे अशोक लव जी ने अपने काव्य में ढाला है ।
इस काव्य के उज्ज्वल पक्ष को यदि पुरूष समाज पढ़े और लड़कियों के आसमान को मुक्त करे तो बात बन सकती है। युगों से दबाकर रखी गई प्रकृति की सबसे मजबूत शख्सियत को आगे लेकर जाने में अगर पुरुष पाठक सहयात्री की भूमिका निभा सकें तो अपने पूर्वजों की उन गलतियों का प्रायश्चित कर सकेंगे , जो लड़कियों के साथ की गई हैं।
कवि के इस संग्रह का सार यही है।

भाषा की सरलता का ध्यान कवि ने पूरी तरह से रखा है ताकि एक आम परिवेश तक इसमें छुपा संदेश पहुँच सके। *
.....................................................................................................................................
*पुस्तक - लड़कियाँ छूना चाहती हैं आसमान *कवि- अशोक लव *प्रकाशन वर्ष-2008, प्रकाशक-सुकीर्ति प्रकाशन,कैथल *मूल्य-100.*कवि सम्पर्क - फ्लैट-363सूर्य अपार्टमेन्ट ,सेक्टर-6,द्वारका,नई दिल्ली-110075 (मो) 9971010063

Monday 23 November 2009

डॉ चन्द्रमणी ब्रह्मदत्त का पत्र

नारायणी साहित्य अकादमी
पंजीकृत कार्यालय : 220, सेक्टर- 18 ,वीर आवास, द्वारका , नई दिल्ली
पत्राचार कार्यालय : 12/ 109 डी, गीता कालोनी , नई दिल्ली-110031
______________________________________________________________________________________
संरक्षक : प्रो नामवर सिंह -9811210285, अध्यक्ष : डॉ चन्द्रमणी ब्रह्मदत्त-9311447793,9818182201,सचिव :डॉ पुष्प सिंह ' विसेन '-9873338623
______________________________________________________________________________________
पत्र सं / 428 /एन एस / ऑफिस/12 नवम्बर / नई दिल्ली

सेवा में
परम आदरणीय
श्री अशोक लव जी
सादर नमस्कार,
माननीय
आपकी ' खिड़कियों पर टंगे लोग ' कृति को पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। माननीया सुषमा भंडारी जी से उपरोक्त कृति मिली जिसमें आपकी बात एवं लघुकथाएँ पढ़ने का मौका मिला। ' सबूत गवाह ' , 'राजनीति बाला', 'बस बलात्कार' , 'औकात', तमाम रचनाएँ धरातल पर रची बसी हैं और आम जन मानस का चित्र प्रस्तुत करती हैं। एवं वर्तमान समाज एवं व्यवस्था का सही मूल्यांकन करती हैं। आपने निःसंदेह एक पुस्तक में वह सामग्री पाठकों को देने का प्रयास किया है जो वर्तमान में कम मिलता है। एवं नए एवं पुराने साहित्यकारों को एक साथ , एक रूप में माला में पुरो दिया है। बधाई स्वीकार करें। नारायणी साहित्य अकादमी आपके उज्ज्वल भविष्य की कामना करती है।
शुभकामनाओं के साथ
आपका
डॉ चन्द्रमणी ब्रह्मदत्त
चेयरमैन
नारायणी साहित्य अकादमी
नई दिल्ली

Sunday 22 November 2009

आभा खेतरपाल : संघर्षमय जीवन / अशोक लव


अशोक लव और आभा खेतरपाल

आभा खेतरपाल संघर्षमय जीवन की पर्याय हैं. दृढ़ संकल्प-शक्ति और जीवन को पूर्णतया जानने और जीने की ललक ने उनकी शारीरिक अक्षमता को आड़े नहीं आने दिया. तीन वर्ष की आयु में पोलियो ने उनकी देह को असामान्य बना दिया. अन्य बालिकाओं के सामान वे स्कूल न जा सकीं. खेल-कूद न सकीं. अध्ययन की लगन थी. घर में ही पढ़ती रहीं. बीमारी का इलाज चलता रहा. ऑपरेशन हुए. रीढ़ की हड्डी में छड़ डाली गई ताकि वे कमर सीधी रख सकें. लम्बी कष्टदायक प्रक्रियाएँ चलती रहीं और आभा उन्हें आभा खेतरपाल के पिता जी अशोक लव और आभा खेतरपाल
झेलती रहीं. पीड़ाओं को झेलते-झेलते वे और दृढ़ होती चली गईं.
वे हाथ से लिख नहीं नहीं पाती थीं. हथेली का ऑपरेशन करके उँगलियों को चलाने लायक किया गया. और आभा ने नौवीं कक्षा में स्कूल जाना शुरू किया. माता-पिता दोनों शिक्षक थे. आभा के लिए वे प्रेरणास्रोत बने. ' कैम्ब्रिज फौंडेशन स्कूल ' ( राजौरी गार्डन, नई दिल्ली ) की अध्यक्षा श्रीमती शीला वर्मा ने उन्हें दाखिल कर लिया. आभा कहती हैं , ' मैं आजीवन उनकी कृतज्ञ रहूँगी. वे न होतीं तो मेरे लिए शिक्षा के द्वार कभी न खुलते.'
इसके पश्चात् तो आभा के सामने एक नई दुनिया थी. उस दुनिया में पुस्तकें ही पुस्तकें थीं और नई-नई उपाधियाँ ग्रहण करने की लगन थी. आकाश को छूने के सपने थे. इन्हीं को पूरा करने के लिए उन्होंने बारहवीं के पश्चात् बी.ए.(दिल्ली विश्वविद्यालय),एम.ए.(इकोनोमिक्,पंजाब विश्वविद्यालय) ,एम.ए.(इंग्लिश,अन्नामलाविश्वविद्यालय), एम.एस.सी.(सायकोथेरपी एंड काउंसलिंग,मुंबई) से की.
वे यहीं नहीं रुकीं, उन्होंने ' कंप्यूटर सौफ्टवेयर एप्लीकेशंज़ ' में पी.जी. डिप्लोमा किया.
आश्चर्य होता है, व्हील-चेयर का सहारा और उन्होंने वह सब कर दिखाया जो सामान्य व्यक्ति नहीं कर पाता. हमारे आस-पास ही ऐसे व्यक्तित्व हैं जिनका जीवन प्रेरणा प्रदान कर सकता है. आभा खेतरपाल ऐसा ही व्यक्तित्व है.आरिफ जमाल (संपादक-न्यू ऑब्ज़र्वर पोस्ट)
अध्ययन के साथ उन्होंने अध्यापन आरंभ कर दिया. आर्थिक रूप से आत्मनिर्भरता आवश्यक थी. पंद्रह वर्षों से अध्यापन करते हुए उन्होंने अपने विद्यार्थिओं का मार्गदर्शन किया. कहीं जाकर पढ़ाना संभव न था. वे घर पर ही ट्यूशन पढ़ाती हैं. ऑनलाइन करियर-काउंसलिंग भी करती हैं.
आभा सशक्त कवयित्री हैं. वे हिन्दी में लेखन करती हैं. स्वयं साहित्य से संबद्ध तो हैं ही , इसके साथ वे साहित्यप्रेमियों को लेखन के लिए प्रोत्साहित करती रहती हैं. युवा साहित्यकारों में लेखन की रुचि जाग्रत करना उनका लक्ष्य है.
उन्होंने ऑरकुट पर 'सृजन का सहयोग' ' कम्युनिटी' का आरंभ जनवरी २००८ में किया था. आज इसके ३६० सदस्य हैं. इसमें अनेक वरिष्ठ साहित्यकार भी हैं. यह उनके कुशल संयोजन का प्रमाण है. वे इसके लिए और बहुत कुछ करना चाहती हैं. वे श्री वीनू की आभारी हैं,जिन्होंने इस प्रयास में उनका साथ ही नहीं दिया अपितु प्रेरणा भी दी.
आभा खेतरपाल माता-पिता की सबसे अधिक आभारी हैं जिन्होंने इन शिखरों तक पहुँचाने के लिए उनकी वर्षों तक अनथक सेवा की.
संघर्षों में मानसिक संतुलन किस प्रकार बनाया जाता है --आभा इसकी जीवंत प्रमाण हैं. देह उनके मानसिक और बौद्धिक विकास में बाधक नहीं बनी. कविता उनकी भावनाओं की अभिव्यक्ति बनी. जीवन के इकतालीस वर्ष पार कर चुकी हैं और वे पल-पल जीवन्तता के साथ जीना चाहती हैं. दृढ़ निश्चय और लक्ष्यों को प्राप्त करने के संकल्प उनके प्रत्येक स्वप्न साकार करेंगे. उनका जीवन दूसरों के लिए प्रेरक बनेगा.

Tuesday 10 November 2009

आज की हिंदी कविता में स्त्री : पठनीय लेख / अशोक लव

आज की हिंदी कविता में स्त्री

औरतें हैं अस्मिता

औरतें हैं आजादी

औरतें गौरव हैं
औरतें हैं लज्जा
औरतें हैं शील
स्वाभिमान

औरतें औरतें नहीं हैं
औरतें हैं संस्कृति
औरतें हैं सभ्यता
औरतें मनुष्यता हैं
देवत्व की संभावनाएँ हैं औरतें


ऋषभदेव शर्मा की इस कविता ’औरतें औरतें नहीं!’ को सुनकर पहले पहल तो हम चौंकते हैं लेकिन ध्यान देने पर कवि का यह मंतव्य स्पष्ट होता है कि स्त्री न तो मनोरंजन का साधन है और न ही बाज़ार की वस्तु. वे उन मूल्यों को सहेज कर रखती है जिनसे मनुष्यता के संस्कार का निर्माण होता है. यही कारण है कि स्त्रियाँ किसी देश की मर्यादा और संस्कृति का पर्याय होती हैं. लज्जा,शील,अस्मिता,आजादी,स्वाभिमान,सभ्यता,संस्कृति,मनुष्यता -और यहाँ तक कि मनुष्य के भीतर निहित देवत्व की संभावना को स्त्री के स्त्रीत्व में निहित माना गया है. वह श्रद्धा और विश्वास की मूर्ती है. लेकिन सामाजिक दबावों ने उसे ’अबला ’ बनाकर रख दिया. लोकतांत्रिक व्यवस्था का तकाजा है कि स्त्री को इस अबलापन से मुक्त किए जाए और उसका सशक्त रूप आनेवाली पीढ़ियों के सामने उभर कर आए.

साहित्य समाज की आलोचना है. सामंती संस्कारवाले साहित्य के शुरुआती दौर में नारी की निंदात्मक और प्रशंसात्मक दोनों दशाओं का चित्रण मिलता है. मध्यकालीन साहित्य में स्त्री के प्रति वैराग्यजनित कुंठाओं का चित्रण हुआ है. भोगवादी दौर में तो स्त्री विलासिता का केंद्र बन गई. आधुनिक काल में स्त्री अपने अस्तित्व एवं अस्मिता के प्रति जागरूक हुई. यही कारण है कि प्राचीन और मध्य्कालीन साहित्य की तुलना में आज की हिंदी कविता में स्त्री की छवि बदली हुई है. आज के हिंदी कवियों एवं कवयित्रियों ने स्त्री के हर रूप को,उसके दिल की हर धड़कन को बारीकी से उकेरा है.

सदियों से यही रीति चली आ रही है कि घर-बार और बच्चे संभालना ही औरत का काम है. सामाजिक मर्यादाओं एवं पारिवारिक मूल्यों का बचाव भी औरत की ही जिम्मेदारी है. बेटी,बहन,प्रेयसी,बहू,पत्नी और माँ की जिम्मेदारी निभाते-निभाते वह खुद को भूल गई है. कविता वाचक्नवी की कविता ’माँ बूढ़ी है ’ में मातृत्व का जीवंत पक्ष दिखाई देता है -दिन भर भागा करती /चिंतित /इसे खिलाती,उसे मनाती /दो पल का भी चैन नहीं था /तब इअस माँ को, /अब फुर्सत में खाली बैठी /पल-पल काटे /पास नहीं पर अब कोई भी. /फुर्सत बेमानी लगती है /अपना होना भी बेमानी /अपने बच्चों में अनजानी /माँ बूढ़ी है." (मैं चल तो दूँ ; कविता वाचक्नवी ;’माँ बूढ़ी है ’;पृ.२३)

माँ की ममता की कोई मिसाल नहीं होती. माँ की ममता को ठीक तरह से वही जान पाता है जो माँ के रिश्ते की गहराई जनता है.माँ की ममता जब स्वयं से होकर गुजरती है तब माँ की याद अपने आप तरोताजा हो जाती है - " माँ! /तुम्हारी लोरी नहीं सुनी मैंने, /कभी गाई होगी /याद नहीं /फिर भी /जाने कैसे /मेरे कंठ से /तुम झरती हो /मेरा मस्तक /सूँघा अवश्य होगा तुमने /मेरी माँ! /ध्यान नहीं पड़ता /परंतु /मेरे रोम-रोम से /तुम्हारी कस्तूरी फूटती है."( मैं चल तो दूँ ; कविता वाचक्नवी ;’माँ बूढ़ी है ’;पृ.२५)

कविता वाचक्नवी की कविताओं में मातृत्व की अनुपमेयता अत्यंत स्पष्ट है. कवयित्री बार-बार माँ को याद करती हैं- " माँ! /यदी तुम होती, /ऊँची भट्ठियों में दहकती आग का धुआँ /गिरने देती मेरे आँगन में? /सारे विकराल स्वपनों में घिर /सुबकने और चौंक कँपने देतीं मुझे?"(मैं चल तो दूँ ; कविता वाचक्नवी ;’माँ,यदि तुम होती... ’;पृ.१६१)

हमारा समाज मूलतः पितृसत्तात्मक समाज है. एक ओर स्त्री की पूजा की जाती है और दूसरी ओर उसे जिंदा जलाया जाता है. जहाँ लड़की का जन्म अवांछित या ’गले पड़ा ढोल ’ समझा जाता है वहाँ अहम मुद्दा नारी के अस्तित्व का है.लैंगिक भेदभाव के कारण कन्या भ्रूण हत्या आम बात हो गई है. कन्या भ्रूण हत्या की बढ़ती हुई घटनाएँ एक ऐसी विभीषिका है जिसने मानव विकास की यात्रा पर प्रश्न चिह्न लगा दिया है. आधुनिक जीवन शैली की इस विसंगति ने मानव अस्तित्व और अस्मिता को ही झकझोर कर रख दिया है. कवयित्री कविता वाचक्नवी ने ऐसी वर्जित और बेसहारा बेटियों के आर्त्नाद को अपनी कविता ’बिटियाएँ ’ के माध्यम से सशक्त रूप में सुनाया है -"पिता! /अभी जीना चाहती थीं हम /यह क्या किया... /हमारी अर्थियाँ उठवा दीं! /अपनी विरक्ति के निभाव की /सारी पगबाधाएँ हटवा दीं...!! /***अब कैसे तो आएँ /तुम्हारे पास? /अर्थियाँ उठे लोग(दीख पड़ें तो) / ’भूत’ हो जाते हैं /बहुत सताते हैं. /*** हम हैं-भूत /-अतीत /समय के /वर्तमान में वर्जित.../विड़ंबनाएँ.../बिटियाएँ..."(मैं चल तो दूँ;कविता वाचक्नवी;’बिटियाएँ’;पृ.१३०)

वास्तव में,हमारे परंपराग्रस्त समाज में बेटी की डोली भी अर्थी की तरह ही उठती है और उसकी तैयारी बेटी के जन्म से होने लगती है. विवाह के साथ जैसे बोझ उतर जाता है. बेटी को बोझ मानने की मानसिकता के कारण ही उनकी हत्या भ्रूण दशा में करने का दुष्कर्म आरंभ हुआ होगा.

इसी प्रकार जया महता ने कन्या भ्रूण से कहलवाया है कि -"रोक सके तो रोक बिस्तर पर पड़े हुए की कराह /पोंछ सके तो पोंछों मृत शिशु की माँ के आँसू /*** उसने कहा, /रोक सके तो रोको /शिशुओं को क़त्ल करते अश्वत्थामाओं को /शिष्य का अँगूठा माँगते द्रोणाचार्यों को /अणुश्स्त्र बनाती उँगलियों को /*** नहीं कर सकते न कुछ /तो भला मुझे किस लिए रोकते हो इस तरह! /मैं तो हूँ माँ के पेट में पलती कन्या /मैंने तो अभी तक दुनिया देखी भी नहीं..."(जया मेहता;समकालीन भारताय साहित्य;मार्च-अप्रैल २००९,पृ.५१)

माँ-बाप के लिए लड़की का ब्याह चिंताजनक विषय है. कविता वाचक्नवी ने उम्रदराज लड़कियों की बेबसी को अपनी कविता ’लड़की’ में उकेरा है -"अक्सर बुदबुदाती /एक उमरदराज लड़की /*** ज्योतिषियों के तंत्र सारे /रटे गए मंत्र सारे /नवग्रह दशाएँ /भाग्य विधाता कंकर-शंकर /साथ नहीं देते अक्सर /उन सारी लड़कियों का /छ्ली जाती हैं जो वक्त से /छले जाती हैं आप ही को जो /और बेतहाशा भाग्ती हैं /दर्द से बेहाल होकर /किसी दुलार भरे क्षण की याद में /मिटाए जाती हैं /अस्तित्व का कण-कण /बूँद-बूँद बन, /प्यास की भरपाई में."(मैं चल तो दूँ ; कविता वाचक्नवी;’लड़की’;पृ.१४)

भूमंड़लीकरण के साथ ’उपभोक्तावादी संस्कृति’ व ’बाज़ार संस्कृति’ का विकास हुआ. इसने आज स्त्री की छवि को बदल दिया है. महिला साहित्यकार प्रभा खेतान का मानना है कि ’भूमंड़लीकरण के हाशिए पर स्त्री मनुष्य नहीं मात्र एक देह,एक उत्पाद तथा एक ब्रांड बन गई है. टी.वी.चैनलों और किसी फैशन मैगज़ीन की कवर पेज अथवा पेज थ्री की चमक-दमक सनसनी बनती जा रही है."(अमित कुमार सिंह;भूमंड़लीकरण और भारत:परिदृश्य और विकलप;पृ.१८२)

बाज़ार स्त्री की सुनहरी छवि का अपने लाभ के लिए भरपूर इस्तेमाल करता है. बदलते जीवन मूल्यों के साथ प्रेम का स्वरूप भी बदला है. प्रेम में बिखराव और छिछलापन आ गया है. समाज में वेश्यावृत्ती दिन-ब-दिन बढ़ रही है. कई बेबस और अभावग्रस्त स्त्रियों को मजबूरी से इस व्यवसाय की ओर मुड़ना पड़ रहा था. देह व्यापार,लड़कियों की ट्रेफिकिंग या यौन दास्ता आम बात हो रही है. पुरुष कैसे कभी-कभार इन स्त्रियों के रूप में बाज़ार की चाट का स्वाद लेना चाहता है, मानिक बच्छावत की कविता ’पेशेवालियाँ’ इस नग्न सत्य को उजागर करती है - "जैसे मछुआ बाज़ार की फल-मंड़ी से /कोई लबालब भरकर /फल बेचने के लिए ले जाता है टोकरियाँ /ठीक वैसे ही इन /स्त्री शरीरों को भरकर /रोज़ /चितरंजन एवन्यू से /बहुत सारी टैक्सियाँ निकलती हैं /अपने दलालों के साथ."(मानिक बच्छावत;’पेशेवालियाँ’;नया ज्ञानोदय;मई २००९;पृ.७५)

कोई भी स्त्री जन्मतः वेश्या पैदा नहीं होती बल्कि परिस्थितियों के कारण उसे इस व्य्वसाय को अपनाना पड़ता है. उदभ्रांत की कविता ’तवायफ़’ इसी सत्य को उजागर करती है -"क्या एक तवायफ़ /जिस्म का सौदा करते समय /करती है आत्मा की भी? /क्या एक तवायफ़ जानती है /कि वह पैदा नहीं हुई /उसे बनाया गया समाज के /उच्च पदासीन /पर्दानशीन /सभ्य कहे जाते /धर्म के ठेकेदारों द्वारा ही?" (उदभ्रांत ; ’तवायफ़’ प्रगतिशील वसुधा-६९;पृ.४५)

परंपरागत रूढ़ियों और अंधविश्वासों के विरुद्ध विजय हासिल करना ही आज की स्त्री का स्वप्न है. वेश्या भी एक स्त्री है. वह भी अपने अधूरे सपनों को पूर करन चाहती है- "आनंदी /सबको आनंद देती है /अपना धर्म निभाती है /हँसती-गाती है /ग्राहकों का मन बहलाती है /जब अकेली होती है तो रोने लग जाती है /अधूरे सपनों में /खो जाती है."(मानिक बच्छावत;’आनंदी’;नया ज्ञानोदय;मई २००९;पृ.७५)

आज स्त्री जागरूक हो गई है. अपने अस्तित्व एवं अस्मिता की लड़ाई लड़ रही है. पुरुषपक्षीय परंपराओं को तोड़ना सीख गई है. अशोक लव कहते हैं- "लड़कियाँ छूना चाहती हैं आसमान /परंतु उनके पंखों पर बाँध दिए गए हैं /परंपराओं के पत्थर /ताकि वे उड़ान न भर सकें /और कहीं छून न लें आसमान /*** लड़कियाँ अपने रक्त से लिख रही हैं /नए गीत /वे पसीने की स्याही में डुबोकर देहें /रच रहीं हैं नए ग्रंथ /उन्होंने सीख लिया है /पुरुषपक्षीय परंपराओं को चिथड़े-चिथड़े करना /उन्होंने कर लिया है निश्चय /बदलने का अर्थों को, /इन तमाम ग्रंथों में रचित /लड़कियों विरोधी गीतों का /जिन्हें रचा था पुरुषों ने /अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए."(अशोक लव;’लड़कियाँ छूना चाहती हैं’;साहित्य सुमन,जुलाई-सितंबर,२००८;पृ.६०)

पुरुषों के हाथों कठपुतली बनकर स्त्री खूब नाच चुकी है. पुरुष द्वारा खींची गई लक्ष्मण रेखा को लांघकर स्त्री अपना एक सपनों का संसार रचना चाहती है. लेकिन उसे हर कदम पर धोखा ही मिलता है. ऋषभदेव शर्मा की कविता ’इतिहास हंता मैं’ इसकी साक्षी है- "मैं घर से निकल आई थी /तुम्हें पाने को! /मैंने धरम की दीवार गिराई थी, /तुम्हें पाने को, /अपने पिता से आँख मिलाई थी /भाई से ज़बान लड़ाई थी- /तुम्हें पाने को! /माँ अपनी कोख नाखूनों से नोचती रह गई, /पिता ने जीते जी मेरा श्राद्ध कर दिया; /मैंने मुडकर नहीं देखा /मैं अपना इतिहास जलाकर आई थी- /तुम्हें पाने को! /तुमने मुझे नया नाम दिया /मैंने स्वीकार किया, /तुमने मुझे नया मज़हब दिया- /मैंने अंगीकार किया. /वैसे ये शब्द उतने ही निर्थक थे /जितने मेरा जला हुआ अतीत /***और सो गई थी /थककर चकनाचूर /आँख खुली तो तुम्हारी दाढ़ी उग आई थी, /तुम हिजाब कहकर /मेरे ऊपर कफ़न डाल रहे थे. /***मैं देख्ती रह गई; /तुमने मुझे जिंदा कब्र में गाड़ दिया! /एक बार फिर /सब कुछ जलाना होगा- /मुझे /खुद को पाने को!!"

ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में भी स्त्री को पग-पग पर अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है. घर की दहलीज पार करके जहाँ स्त्री समाज में पुरुषों से कदम मिलाकर आगे चल रही है वहीं उसे जिल्ल्त भी उठानी पड़ रही है. ऋषभदेव शर्मा ने अपनी कविता ’प्रशस्तियाँ’ के माध्यम से इस बात को स्पष्ट किया है- "मैंने जब भी कुछ पाया /मर खप कर पाया /खट खट कर पाया /अग्नि की धार पर गुज़र कर पाया /पाने की खुशी /लेकिन कभी नहीं पाई /***शिक्षा हो या व्यवसाय /प्रसिद्धि हो य पुरस्कार /हर बार उन्होंने यही कहा- /चर्म-मुद्रा चल गई! /[चर्म-चर्वणा से परे वे कभी गए ही नहीं!]
पर सोमवार, ७ सितम्बर २००९
ब्लॉग - 'सागरिका' से साभार


Saturday 7 November 2009

तुम हो बस तुम /अशोक लव

तुम हो
हाँ
तुम हो ,
इन
हवाओं में
जिसके
स्पर्श कराते हैं
तुम्हारे
अस्तित्व की अनुभूति
तुम हो
हाँ
तुम हो ,
झरनों के प्रवाहों में
जिनका
कल-कल संगीत
हृदय को स्वयं में डुबो लेता है।
तुम हो
हाँ तुम हो ,
आकाश छूने को लालायित
समुद्र
की लहरों में
मेरे
स्वप्नों की भांति।
तुम
हो
हाँ
तुम हो ,
नन्हें
शिशुओं की मुस्कानों में
जो
भर देती है हृदय में- ममत्व।
तुम
हो
हाँ
तुम हो ,
वहाँ
-वहाँ
जहाँ
-जहाँ तक जाती है दृष्टि
तुम
हो
हाँ
तुम हो ,
वहाँ
-वहाँ
जहाँ
-जहाँ तक नहीं जा पाता
मन,
दृष्टि
तुम
हो ,
बस
तुम्हीं हो
और
तुम ही हो
यहाँ
-वहाँ
वहाँ
-यहाँ
'''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
०७
नवम्बर २००९

Tuesday 3 November 2009

अशोक लव की लघुकथाएँ / कमल चोपड़ा

लघुकथा को साहित्यकार बनने की लघु–विधि माननेवालों की कोई कमी नहीं है, लेकिन अनेक ऐसी प्रतिभाएँ हैं, जो निरंतर नए दृष्टिकोण, विषयों, विचारों के साथ नए शिल्प–प्रयोग लेकर आ रही हैं और विधा को समृद्ध और फलीभूत करने के लिए कृतसंकल्प हैं। अनुभूति की सूक्ष्मता, तीक्ष्णता और गहनता लघुकथा के लिए आवश्यक है, लेकिन लेखकीय दृष्टि के अभाव में इन सूक्ष्म और गहन गुणों की अभिव्यक्ति करते समय रचना के सतही, अस्पष्ट और अपूर्ण रह जाने का खतरा शायद दूसरी विधाओं से लघुकथा में सर्वाधिक है।
लघुकथा का जोर क्योंकि सूक्ष्मता, गूढ़ता, अर्थगर्भिता, तीक्ष्णता और गहनता पर अधिक होता है, इसलिए एक सार्थक लघुकथा के लिए रचनाकार को अतिरिक्त परिश्रम और सृजनात्मक कौशल का परिचय देना पड़ता है।
लघुकथा में जीवन के तीव्र द्वंद्व–दंश, गहन–गंभीर अर्थ, तीक्ष्ण–सूक्ष्म अंश, युगसत्यों एवं तीव्र–तीक्ष्ण प्रश्नों को रेखांकित किया जाना चाहिए, जो कि पाठक को अपने द्वंद्व,अपनी समस्या या अपने प्रश्न प्रतीत हों। गंभीर विचार और सूक्ष्म सत्यों वाली अपनी दृष्टि में संश्लिष्ट लघुकथा ही रचनाकार का प्रतिनिधित्व करती हुई लघुकथा–साहित्य को समृद्ध कर सकती है। अपनी सृजनात्मकता में उत्कृष्ट एवं जीवन के गहन–गंभीर सत्यों से युक्त लघुकथा पाठक को अधिक सजग, सचेत और सतर्क करती है।
अपने परिवेश में रचनाकार जटिल समस्या को उठाता है और उसकी समग्र जटिलता, दुरूहता और भयावहता को मानवीय संवेदना से जोड़कर मानवीय आवेग उत्पन्न करता है। रचनाओं के माध्यम से प्रकट होनेवाला संसार से जोड़कर मानवीय आवेग दृष्टि जागरूकता, प्रतिभा, रचनाधार्मिता या सृजनात्मक क्षमता का परिचायक होता है, वहाँ युगसत्य और युगबोध की सही अभिव्यक्ति भी होता है।
रचनाकार अपनी अनुभूति की प्रकृति और दृष्टि के बूते पर संसार का निर्माण करता है। समसामयिक जीवन की विषमताओं, विडंबनाओं, विकृतियों और विशेषताओं पर तीखा प्रहार लघुकथा की विशेषता है।समकालीन लघुकथा के परिदृश्य के देश और समाज में व्याप्त लूट–खसोट, सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार, शोषण, अमानवीयता, असमानता,, उत्पीड़न,दमन, निर्धनता, भूख आदि अमानवीय स्थितियों को देखकर किसी भी संवेदनशील रचनाकार का इसे लेकर चिंतित, क्षुब्ध और व्यग्र होकर सामाजिक मुक्ति में अपनी समझ और सोच का प्रयोग करना स्वाभाविक है।
अशोक लव की लघुकथाएँ उनकी इस सामाजिक चिंता का परिणाम हैं।
अशोक लव की लघुकथाओं में समाज में कथ्यगत प्रभाव, व्यंजना के माध्यम से अनेक स्तरों पर प्रकट हुआ है। सीधी–सी लगनेवाली बात, गहरे अर्थ रखती हैं। ऐसे कई सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और नैतिक प्रश्न, जो संसार–भर के साहित्य में बार–बार आते रहे हैं, अशोक लव की लघुकथाओं में भी उसी भयावहता से प्रस्तुत हुए हैं, शायद इसलिए कि ये प्रश्न आज भी अनुत्तरित है।।
अशोक लव की लघुकथाओं के मूल में आर्थिक अभाव और अर्थतंत्र की विषमताओं के कारण मानवीय मूल्यों, रिश्तों और संवेदनाओं के ह्रास की चिंता है। कुछ लघुकथाओं में मानवीय स्थितियों की जटिलता का सूक्ष्म चित्रण भी हुआ है।
‘चमेली की चाय’ में राजनीतिक छल–छद्म और पाखंड द्वारा मानवीय संवेदनाओं के ठगे जाने को उकेरा गया है। क्षेत्रीय आयुक्त के शब्दों में ‘भोर के चार बजे हम रामदीन के घर लौटे। चमेली ने फिर चाय बनाई। अब उसमें पहले जैसी कड़वाहट न थी।’
‘मृत्यु की आहट’ मानवीय संवेदनाओं की मृत्यु की आहट का अहसास कराती है। बेटे का माँ को मृत्यु के मुँह में छोड़ जाना उसकी संवेदनाशून्यता का परिचायक है। उसका संबंध की लाभ–हानि को तौलते हुए मानवीय मूल्यों को नकार देना भयावह है। बेटे का लौटना और माँ का कोठरी की ओर बढ़ना मानवीय संवेदनाओं को झकझोरता है, झिंझोड़ता है।
‘पार्टी’ में आर्थिक अभावों के चलते आदमी के इतना अंतर्मुखी, सहनशील, संतुष्ट एवं व्यावहारिक हो जाने का चित्रण बखूबी हुआ है। संपन्न वर्ग द्वारा किए गए अपमान के लिए उसके पास अपने ही तर्क हैं। ‘अरे! बुरा कैसा मानना। दीदी का मुझ पर कितना स्नेह है। तभी तो कह रही थी....।’’
‘मांजी’ में संबंधों को इस्तेमाल करने पर उतरी अमानवीयता का चित्रण हैं।
‘ अविश्वास’ में पति–पत्नी के बीच तैरते अविश्वास का सहज चित्रण है।
‘बलिदान’ और ‘लुटेरे’ लघुकथाओं में अपनों द्वारा अपनों के शोषण एवं लूट का भयावह चित्रण है।
‘अपना घर’ में पुत्र एवं उसके परिवार के होने के बावजूद पिता का आश्रम में रहना उसी पारिवारिक टूटन का ही एक और चित्र है।
‘दरार’ और ऐसी कई लघुकथाओं में मानवीय संबंधों और मूल्यों के टूटते चले जाने की स्थितियाँ बार–बार आई हैं। अशोक लव की ज्यादातर
लघुकथाओं में मध्यवर्गीय परिवारों की टूटती–बनती दुनिया की यथार्थ तस्वीर हैं। लघुकथाओं में विविधता है।राजनीतिक छल–छद्म और पाखंड को लेखक ने ‘प्रतिशोघ’ और ‘एक ही थैली के चट्टे–बट्टे’ लघुकथाओं में तल्खी के साथ बेपर्द किया है।
अर्थतंत्र में फँसे आदमी के छोटे होते जाने की प्रक्रिया के पीछे आर्थिक अपराधी किसी तरह सक्रिय हैं, यह ‘नयी दुकान’ जैसी कुछ लघुकथाओं में रेखांकित हुआ है।
भ्रष्टाचार के विभिन्न रूपों का ‘एक हरिश्चन्द्र और’, ‘कफनचोर’, ‘नए रास्ते’, ‘साक्षात्कार’ जैसी कुछ लघुकथाओं में यथार्थ अंकन हुआ है। रचनाओं के माध्यम से मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिए लेखक ने कुछ ऐसे पात्रों को गढ़ा है, जो मानवीयता के लिए संघर्षशील हैं, जैसे ‘डरपोक’ का कपिल, ‘एक हरिश्चंद्र और’ का हरिचन्द्र साहनी, ‘सलाम दिल्ली’ का अशरफ आदि। ऐसे पात्रों की उपस्थिति आश्वस्त करती है, लेकिन प्रश्न उठता है कि समाज में ऐसे संघर्षशील पात्रों की कमी क्यों है?
अशोक लव की सहज भाषा अपने परिवेश को यथार्थ रूप में प्रकट करने में सक्षम है। उन्होंने परिवेश का चित्रण करने के लिए जिस तरह की भाषा चाहिए, वह उनके पास है: ‘अवसरवादी व्यवस्था में उसके क्रांतिकारी विचार मंदिर की घंटियाँ बजाने लगे थे।’(घंटियाँ) ‘दो कदम की घर की दूरी गणेशी के लिए कोस–भर की हो चुकी थी।’ (हिसाब–किताब) ‘फेफड़ों में सोई बलगम जग गई थी।’ (अपना घर) कई जग सीमित प्रभाव, अस्पष्ट दृष्टि और सतही कथ्य तथा सीमित उद्देश्य भी इन रचनाओं की सीमा बना है। रचनाकार एक विसंगत स्थिति को लेकर उसकी विसंगति में ही खो गया है और अपने उद्देश्य की सिद्धि को उसने बीच में ही छोड़ दिया है।
कहीं–कहीं जिंदगी से बाहर की असामान्य–सी स्थितियाँ भी इन रचनाओं के मूल में आई हैं।‘अविश्वास’, ‘ठहाके’, ‘नानी का घर’, ‘कृष्ण की वापसी’, ‘रामौतार की गाय’ आदि ऐसी ही लघुकथाएँ हैं। जहाँ कुछ लघुकथाएँ शिल्प और कथ्य की दृष्टि से परिपक्व और सुगठित हैं, वहीं कुछ वैचारिक स्तर पर अस्पष्ट रह गई हैं। इस संग्रह 'सलाम दिल्ली' की लघुकथाओं में चौंकनेवाली स्थितियों के स्थान पर तमाम क्षरण के बीच पीडि़त, शोषित और अशांत व्यक्ति का नैतिक बल, विवेक और संघर्ष–चेतना अभी बाकी है। यह अशोक लव की परदु:ख–कातरता और जीवन के प्रति आस्था तथा उसे अभिव्यक्त करने की क्षमता का भी परिचायक है। अशोक लव से ‘मृत्यु की आहट’, ‘चमेली की चाय’ जैसी कुछ और लघुकथाओं की आशा रखना स्वाभाविक है। जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टि, अतिरिक्त् कुशलता, सृजनात्मक धैर्य, सजगता, मौलिक विचार, नवीन दृष्टिकोण किसी भी रचना की उत्कृष्टता के लिए आवश्यक हैं। संख्या में बहुत कम उन लघुकथाओं को ढूँढ पाना न केवल जोखिम का काम है, अपितु, धैर्य, तटस्थता, परिश्रम और संतुलन की परीक्षा भी है। अशोक लव के पास जीवन के सूक्ष्म,गहन और गूढ़ सत्यों को अभिव्यक्त करने की क्षमता है।

*लघुकथा.कॉम ( अक्टूबर २००९ अंक ) से
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