Friday 6 April 2012

‘ हिन्दी के प्रतिनिधि साहित्यकारों से साक्षात्कार ‘ का लोकार्पण


डॉ शंकर दयाल शर्मा ने  मेरी पुस्तक हिन्दी के प्रतिनिधि साहित्यकारों से साक्षात्कार का लोकार्पण ९ फरवरी १९९० को किया था.यह कार्यक्रम उपराष्ट्रपति-निवास में डॉ विजयेंद्र स्नातक के सानिद्ध्य में और दैनिक हिंदुस्तान के संपादक श्री विनोद कुमार मिश्र की अध्यक्षता में हुआ था. डॉ नारायण दत्त पालीवाल, डॉ रणवीर रांग्रा , डॉ गंगा प्रसाद विमल,रायजादा बी डी बाली प्रमुख वक्ता थे. डॉ उपेन्द्र रैणा ने लोकार्पण-समारोह का  कुशल संचालन किया था. इस पुस्तक में डॉ रामेश्वर शुक्ल अंचल, श्री मन्मथनाथ गुप्त, डॉ प्रभाकर माचवे , श्री केदारनाथ अग्रवाल ,पद्मश्री यशपाल जैन, पद्मश्री आचार्य क्षेमचन्द्र सुमन, पद्मश्री चिरंजीत से किए मेरे साक्षात्कार थे. यह सभी साक्षात्कार दैनिक हिंदुस्तान में यादों के झरोखे से स्तंभ में प्रकाशित हुए थे. जिन साहित्यकारों से साक्षत्कार किए थे इस समारोह में उनमें से श्री मन्मथनाथ गुप्त, श्री यशपाल जैन, आचार्य क्षेमचन्द्र सुमन, श्री चिरंजीत उपस्थित थे. मेरे अन्य अनेक साहित्यकार-मित्र भी उपस्थित हुए थे. इनमें सर्वश्री अशोक वर्मा,असीम शुक्ल, धंनजय सिंह, आरिफ जमाल, सुरेश यादव,नरेन्द्र लाहड़, श्रवण राही, भारतेंदु मिश्र, डॉ जगदीश चंद्रिकेश ,सुरेश गौतम,श्री महेंद्र शर्मा, श्री सत्यप्रकाश भारद्वाज,श्री वीरेंद्र जरयाल, श्री राजगोपाल सिंह प्रमुख थे. शिक्षाविदों में श्री एम एल बब्बर और एयर कमाडोर बी के निगम उपस्थित हुए. समरो के लिए एक घंटे का समय मिला था. जब डॉ शंकर दयाल शर्मा जी साहित्य पर बोलने लगे तो पचास मिनट तो उन्होंने ही ले लिए. समारोह लगभग दो घंटे तक चला. जीवन के कुछ क्षण अविस्मरणीय हो जाते हैं ये भी ऐसे ही क्षण थे.

Friday 23 March 2012

एयर फ़ोर्स के शिक्षा निदेशालय द्वारा ' हिन्दी संगोष्ठी ' में भाग लिया / अशोक लव

अशोक लव, भगवती प्रसाद निदारिया और ए विजय कुमार

ए विजय कुमार संबोधित करते हुए

एयर फ़ोर्स ऑडिटोरियम का कांफ्रेंस हाल , प्रवेश
एयर फ़ोर्स के शिक्षा निदेशालय द्वारा ' हिन्दी संगोष्ठी ' का आयोजन एयर फ़ोर्स ऑडिटोरियम , सुब्रोतो पार्क , नई दिल्ली में तेईस को  मार्च किया गया. इसमें प्रोफ़ेसर ए विजय कुमार (पूर्व अध्यक्ष,शब्दावली आयोग,भारत सरकार ) ने ' हिन्दी भाषा में तकनीकी शब्दों का प्रयोग'  विषय पर प्रतिभागियों को संबोधित किया. मेरा विषय था ' हिन्दी का प्रचार-प्रसार और सरलीकरण '. मेरे पश्चात् प्रशांत कुमार शर्मा ने ' यूनिकोड का प्रयोग' विषय पर अपने विचार रखे.
एयर मार्शल एन के वर्मा मुख्य-अतिथि थे. वे दी एयर फ़ोर्स स्कूल के छात्र रह चुके हैं. संगोष्ठी से पूर्व उनके साथ स्कूल के विषय में बातचीत हुई.वे मेरे विद्यार्थी नहीं थे. श्री कैलाश विद्यालंकार ने उन्हें पढ़ाया था. एयर वाईस मार्शल सत्येन्द्र कुमार अपनत्व से मिले. हिन्दी अध्यापकों की चयन-समिति में हम एक साथ थे. ग्रुप कैप्टन राहुल पाठक संगोष्ठी के संयोजक थे. उनके साथ गत सप्ताह से इस विषय में चर्चाएँ होती रही थीं.
बाएं से-एयर वाईस मार्शल सत्येन्द्र कुमार,अशोक लव, एयर मार्शल एन के वर्मा. पीछे - ए विजय कुमार, भगवती प्रसाद निदारिया और प्रशांत के शर्मा .
बहुत दिनों के पश्चात् हिन्दी के विषय में चर्चा करना अच्छा लगा. 

Wednesday 21 March 2012

लघुकथा : मृत्यु की आहट / अशोक लव

मेरे लघुकथा-संग्रह ' सलाम दिल्ली ' की यह बहुचर्चित लघुकथा है. यह अनेक अन्य लघुकथा-संग्रहों में संकलित भी की गई है. पाठ्य-पुस्तकों में भी शामिल है.

ए.बी.सिंह ने एक लाख दोहे लिखकर विश्व साहित्य में नया कीर्तिमान स्थापित किया / अशोक लव

ए.बी.सिंह ने एक लाख दोहे लिखकर विश्व साहित्य में नया कीर्तिमान स्थापित किया. अपने प्रिय मित्र की इस उपलब्धि पर गर्व होना स्वाभाविक है.
अभी-अभी उन्होंने अपना दोहा-संग्रह ' धरती' भेंट किया है. इसमें उनके अपने लिखे 14000 दोहे हैं. ए.बी.सिंह की दोहों की लगभग चालीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं.प्रत्येक पुस्तक में सात सौ से अधिक दोहे हैं. बिहारी ने सात सौ दोहों की सतसई लिखकर हिन्दी साहित्य में अपनी पहचान बने थी. ए.बी.सिंह का  कार्य उनकी साहित्य साधना का प्रमाण है. वे सीनियर इंजीनियर हैं.
हिन्दी साहित्य में इस योगदान के लिए हम उन्हें बधाई देते हैं.

Monday 19 March 2012

निर्लिप्त मन / अशोक लव

निर्लिप्त मन / अशोक लव  
''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
इंद्रधनुषी रंगों की छटाएँ
मरुथली तपन 
कंपकंपाती शीतल हवाएँ
आड़ी-तिरछी रेखाओं-सी 
पगडंडियाँ 
गिरते -उठते उठकर बढ़ते
निरंतर प्रवाहमयी नदी को भीतर जीते 
जीवन को गतिशील रखे 
पथ पर अग्रसर  
निर्लिप्त मन 
कहता निरंतर 
बढ़ चल बढ़ चल !


हैरां न हो / अशोक लव

हैरां न हो ,अपना -अपना नसीब है ,
कोई दिल से दूर ,कोई करीब है l 

Saturday 17 March 2012

कविता और कवि मन / अशोक लव

कविता कवि के मन के भावों की अभिव्यक्ति होती है. कवि अपने परिवेश को जीता है. अन्य व्यक्तियों के जीवन को देखता है. उसे अनेक घटनाएँ प्रभावित करती हैं. अत्यधिक संवेदनशील होने के कारण अपने और अन्य लोगों के अनुभवों और भावों को कविता के रूप में अभिव्यक्त कर देता है. कविता के सृजन की प्रक्रिया सहज नहीं होती. यह कविता भी ऐसे ही क्षणों से निकलकर सर्जित हुई है. तेज़ी से परिवर्तित होते समय के साथ व्यक्ति अकेला होता जा रहा है. अकेलेपन के इन क्षणों को, उपेक्षाओं को शब्दों में समाहित करने का प्रयास किया है.

Tuesday 13 March 2012

Hazrat Khawaja Moinuddin Hasan Chisti (Hazrat Khwaja Gharib Nawaz) Visited Dargah

 हज़रत मोईनुद्दीन हसन चिश्ती , गरीब नवाज़ की दरगाह के दर्शनों का सुअवसर नौ मार्च को मिला. वर्षों की इच्छा पूरी हुई. उनके विषय में यह लेख संकलित किया है. 

 
Agar Gaiti Sarasar Bad Girad,
Chiragh-e-Chishtiyan Hargiz Namirad.
 (If the Entire Universe is Devastated by the Storm, the Lamp of Chishtiyan Shall not Cease to Illuminate)


Hazrat Khawaja Moinuddin Hasan Chisti (R.A.) popularly known as Hazrat Khwaja Gharib Nawaz (R.A.) was born in 1142 A.D. in Sijistan (Iran). His paternal genealogy is related to Hazrat Imam Hussain (A.S.) and that of his maternal to Hazrat Imam Hassan (A.S.) and thus he was a direct descendant of Prophet Hazrat Mohammad (S.A.W.).
Khwaja Moin-uddin Hasan Chisti (R.A) occupies a prominent place among the spiritual Healers of the world. In his temperament as in the circumstance of his life Khwaja Sahib was destined for an extra ordinary career. Into a tottering civilization, fraught with material acquisition, which guaranteed no safety to human life and which conferred no spiritual freedom on human beings he burst forth all the masterful force of his personality, There is a complete blending of greatness and grace, mediation and action precept, practice, indifference of the mystic and idealism of a Saint. He stands for all that is true, Beautiful and Noble..

He is a SYMBOL OF LOVE, HARMONY AND TRUTH.

The sources of this power may be traced to his own exceptional endowments. Throughout his life, he exhibited the noble traits of character so peculiar to the house of Prophet Mohammed (S.A.W) to which he belonged.

His father, Sayyid Ghiyas-u’d-din, a pious man of some means, died when his son was in his teens. He left as legacy an orchard and a grinding mill. Once Moinuddin Hassan was looking after the plants in his garden that a mystic, Shaikh Ibrahim Qanduzi, happened to pass by. Shaikh Mu’in-u’d-din entertained him in his garden. Hagiologists trace the germination of mystic attitude in him to the blessings of this Saint. In fact, the most powerful factor in giving a mystic touch to his personality at this early stage was the condition of Sijistan which had suffered terribly at the hands of the Qara Khita and the Ghuzz Turks.
 It drove the Khwaja’s mind inwards and he realized the futility of hankering after worldly glory or looking after worldly goods. He sold all his assets, gave the proceeds in charity and took to itineracy. He visited the eminent scholars of his age. While on his way to Iraq, he passed through Harvan, in the district of Naishapur. Here he met Khwaja ‘Usman Harwani’ and was so deeply impressed by his spiritual eminence that he decided to join the circle of his disciples. For twenty years he accompanied him on his arduous mystic journeys and performed all sorts of personal services to him. Shaikh Mu’in’d-din once told his disciples. “I did not give myself a moment’s rest from the service of my Peer-o-Murshid, and carried about his night clothes during his journeys and stoppages”.

Khwaja Gharib Nawaz Haj and Prophet’s command

 As the great Khwaja become accomplished and perfect in every respect, the divine tutor (Hazrat Khwaja Usman Harwani (R.A.)) honored him with his robe and took him to Haj. Both then proceeded to Makkah and performed the Haj, and then went to Madina and stayed there for sometime, to get the blessings of Prophet Hazrat Mohammad (S.A.W.)

One night in a trance he was ordered by the Holy Prophet Hazrat Mohammad (S.A.W.)

“O Moinuddin! You are a prop of our faith. Proceed to India and show the path of truth to the people there. That is why he is known as Ataye Rasul/Naib-e-Rasul.” (Lieutenant of Prophet Mohammad (S.A.W.))

Later he undertook independent journeys and came into contact with eminent Saints and scholars like Shaikh Najm-u’d-din Kubra, Shaikh Najib-u’d-din ‘Abdul Qahir Suhrawardi, Shaikh Abu Sa’id Tabrizi, Shaikh Mahmud Ispahani, Shaikh Nasir-u’d-din Astarabadi and Shaikh ‘Abdul Wahid – all of whom were destined to exercise great influence on contemporary religious life and thought. He visited nearly all the great centers of learning in those days – Samarqand, Bukhara, Baghdad, Naishapur, Tabriz, Aush, Ispahan, Sabzawar, Mihna, Khirqan, Astarabd, Balkh and Ghaznin and aquainted himself with almost every important trend in Muslim religious life in the middle ages. His moral and spiritual qualities attracted many people to his fold and he appointed his Khalifas in Sabzwar and Balkh.
 Shaikh Auhad-u’d-din Kirmani, Shaikh Shihab-u’d-din Suhrawardi and many other eminent mystics benefited by his company. Having thus roamed all over the Muslim lands which had not yet recovered from the terrible shocks of Qara Khitai and Ghuzz invasions and were to be ravaged very soon by the Mongols, he turned towards India. After a brief stay at Lahore, where he meditated at the Shrine of one of the prominent Sufi, Shaikh Ali Hajweri, he proceeded to Ajmer. Khwaja Gharib Nawaz composed a couplet paying a glowing tribute to Shaikh Hajweri :

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 (Ganj Bakhsh-e-Har Do Alam Mazhar-e-Noor-e-Khuda, Na Qisan Ra Peer-e-Kamil, Kamilan Ra Peshwa)

He is a wealth bestowing Saint in this world and hereafter and an embodiment of divine light.

A complete spiritual guide for the imperfect disciples and a leader of the perfect Saints.
He adopted the Indian tradition and culture, seeing the inclination of Indians towards Music and singing he introduced Qawwali (Sama) to convey his message.

Huzoor Gharib Nawaz (R.A.) breathed his last; after achieving the command given to him by the Holy Prophet (S.A.W.). His noble soul left the corporeal body on the 6th of Rajab 633 A.H./ 16th March 1236 at the age of 97. He was buried in the same prayer room (Hujra)which was the center of his divine activities, throughout his stay at Ajmer. Today his Shrine is popularly known as “Dargah Sharif of Huzoor Gharib Nawaz (R.A.)”. People of all walks of life and faith from all over the world, irrespective of their caste, creed and beliefs visit this great Shrine to offer flowers, Chaddar and Itar of their esteem and devotion. The rich and the poor stand side by side to pay their homage and respect to the divine soul and to acquire the peace of mind & soul to get the blessings of Huzoor Gharib Nawaz (R.A.)

Ajmer was not merely the seat of Chauhan power ; it was a religious center also where thousands of pilgrims assembled from far and near Shaikh Mu’in-u’d-din’s determination to work out the principles of Islamic mysticism at a place of such political and religious significance shows great self-confidence.

Gharib Nawaz was the exponent of the true spirit of Islam. Like orthodox and static theologians he did not engage himself in vain metaphysics but rigorously strove to save human sympathy from running into narrow grooves and struck at the very root of parochialism, casteism and religious exclusiveness which are being propagated by some vested interests. According to Gharib Nawaz the religion is not merely based on rituals and ecclesiastical formalities but “service of humanity” is its sole raison d’etre . Describing the qualities which endear a man to God, Gharib Nawaz referred to the following attributes : AWWAL SAKHAWATE CHUN SAKHAWATE DARIYA, DOM SHAFQAT-E-CHUN SHAFQAT-E-AFTAB, SIWAM TAWAZO-E-CHUN TAWAZO-E-ZAMEEN. (First, river like generosity; second, sun-like affection, and third earth like hospitality.) When once asked about the highest devotion of God, Gharib Nawaz remarked that it was nothing but

“Dar mandgaan ra fariyad raseedan wa haajat-e-baichaargaan ra rawa kardan wa gursingaan ra sair gardaneedan”

i.e. to redress the misery of those in distress, to fulfil the needs of the helpless and to feed the hungry.


Gharib Nawaz loved humanity in general and the Indians in particular. Indeed he had a mission to bring a social and spiritual revolution.

He ruled over the hearts. The concepts of national integration, composite culture (Ganga-Jamni Tehzeeb) originated from his life style and teachings and thereafter were spread by his representative disciples.

Perhaps in no other country were the effects of this social and cultural revolution so marked and so far reaching as in India. Sufism (Islamic mysticism) reached India when it had entered the last and the most important phase of its history the organisation of Sufistic structure of Islam having various denominations, especially Naqshbandia, Qadriya, Suharwardia and Chishtiya. Among these denominations the Chishtiya order has been supremely successful on all levels of pluralistic society of India based on cultural, religious, and social differences.

Thursday 1 March 2012

अंधा बहरा शहर / अशोक लव








शहर में शोर है
शहर में हंगामा है
शहर में भीड़ है
शहर में जुलूस निकलते हैं
जिंदाबाद ! जिंदाबाद !
मुर्दाबाद-मुर्दाबाद  के नारे
गूँजते हैं शहर की हवा में .

बड़ी चहल-पहल रहती है शहर में
पर हत्यारे हैं कि इन सबके बीच से
 चाकू घुमाते
गोलियां दनदनाते निकाल जाते हैं .
लाश किसकी गिरी है
बलात्कार किसका हुआ है
शहर की भीड़ को इसका पता नहीं चलता
वह लाशों को कुचल कर आगे बढ़ जाती है
वह बलात्कार की त्रासदी भोगती नग्न देहों को
कुचलती
आगे बढ़ जाती है .

लोग सब कुछ देखते हैं
पर ऑंखें बंद कर लेते हैं
लोग सब कुछ सुनते हैं
पर कान बंद कर लेते हैं
शहर के न हाथ रहे हैं न पाँव
हत्यारों-बलात्कारियों को न रोक पाता है
न पकड़ पाता है शहर .

बहुत तेज़ भाग रहा है शहर
मर चुकी संवेदनाओं के साथ जी रहा है शहर .


Wednesday 8 February 2012

चिरैया / अशोक लव

चिरैया 
'''''''''''''''''अशोक लव 
नन्हीं चिरैया 
चोंच में तिनका दबाए
डोलती है इधर से उधर
उधर से इधर 
वृक्ष की फुनगियों पर .

एक ही दिन में नहीं सीख लिया था 
चिरैया ने गाना-झूमना 
उसने सीखा था पहले 
उड़ना 
अपने
पंखों से उड़ना .

वह नहीं चढ़ी फुनगियों पर
सीढ़ियों के सहारे 
इसीलिए मस्त गाती है
मस्त झूलती है 
मस्त झूमती है. 
'''''''''''''''''''''''''''''''''''
@अशोक लव ,पुस्तक-अनुभूतियों  की आहटें



Monday 6 February 2012

बाज़ और अधिकार / अशोक लव

बाज़ों के पंजों में 
चिड़ियों का माँस देख 
नहीं छोड़ देती चिड़िया 
खुले आकाश की सीमाएँ नापना . 
उड़ती है चिड़िया 
गुँजा देती है
चहचहाटों से आकाश का कोना-कोना 
बाज़ चाहे जिस ग़लतफ़हमी में रहें 
चिड़िया नहीं छोड़ती 
आकाश पर अपना अधिकार !
''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
* अशोक लव -पुस्तक अनुभूतियों की आहटें 

Monday 30 January 2012

यूँ निकला सूरज / अशोक लव

रात की काली चादर उतारकर 
भागती भोर 
सूरज से जा टकराई 
बिखर गए सूरज के हाथों से -
रंग.
 छितरा गए आकाश पर 
पर्वतों पर, झरनों पर 
नदी की लहरों पर 
धरती के वस्त्रों पर 
रंग ही रंग.
छू न सका सूरज भोर को 
डांट न सका सूरज भोर को 
और 
निकल आया आकाश पर. 

Tuesday 24 January 2012

धुंधलका / अशोक लव

मित्र !
धुंध जब इतनी घिर जाए
की शीशे के पार कुछ न दिखाई  न दे 
तब-
हथेलियों से शीशे को पोंछ लेना 
फिर शीशे के पार देखना 
सब कुछ साफ़-साफ़ दिखने लगेगा 
मैं तो वहीं खड़ा था
जहाँ अब दिखाई देने लगा हूँ 
सिर्फ धुंध ने तुम्हें 
बहका रखा था. 
------------------
@पुस्तक- 'लड़कियां छूना चाहती हैं आसमान'



Friday 20 January 2012

मेंढक और लोग / अशोक लव

पानी जब खूब बरसता है 
मेंढक खूब टर्राते  हैं 
उछल-उछल जाते हैं 
धन के खूब आ जाने पर 
कुछ लोग मेंढक बन जाते हैं.
............................................
@ अशोक लव 20 जनवरी 2012 मेंढक और लोग

Tuesday 10 January 2012

कविता -अहंकारी की आत्म-प्रवंचना / अशोक लव

मैं ही मैं हूँ
बस मैं ही मैं हूँ
यहाँ भी और वहाँ भी
इधर भी और उधर भी
ऊपर भी और नीचे भी
यह भी है मेरा
और वह भी है मेरा
जिधर देखता हूँ
स्वयं को देखता हूँ
जो कुछ सोचता हूँ
स्वयं को सोचता हूँ।
मेरे सिवा और क्या है जहां में ?
यह मकां मेरा वह दुकां मेरी
यह पत्नी मेरी
वह बच्चे मेरे
यह नौकर मेरे
वह चाकर मेरे
और क्या है जहां में
सिवा मेरे
यहाँ भी मैं हूँ
और वहाँ भी मैं हूँ
मैं ही हूँ बस
मैं ही मैं हूँ।

Sunday 1 January 2012

नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ / अशोक लव

नव वर्ष 
सब ओर हो 
हर्ष ही हर्ष 
शुभ हो 
ओर हो मंगलमय 
नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ !
--अशोक लव

Thursday 22 December 2011

नमन

20 दिसंबर 2009 -20 दिसंबर-2011 नमन : दूसरी पुण्य-तिथि

Saturday 26 November 2011

बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।--रहीम के दोहे

लघुकथा संग्रह -सं -अशोक लव
छिमा बड़न को चाहिये, छोटन को उतपात।
कह रहीम हरि का घट्यौ, जो भृगु मारी लात॥

तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥

दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे होय॥

खैर, खून, खाँसी, खुसी, बैर, प्रीति, मदपान।
रहिमन दाबे न दबै, जानत सकल जहान॥

जो रहीम ओछो बढ़ै, तौ अति ही इतराय।
प्यादे सों फरजी भयो, टेढ़ो टेढ़ो जाय॥

बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।
रहिमन बिगरे दूध को, मथे न माखन होय॥

आब गई आदर गया, नैनन गया सनेहि।
ये तीनों तब ही गये, जबहि कहा कछु देहि


खीरा सिर ते काटिये, मलिए नोन लगाय।
रहिमन करुये मुखन को, चहियत यही सजाय॥

चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनको कछु नहि चाहिये, वे साहन के साह॥

जे गरीब पर हित करैं, हे रहीम बड़ लोग।
कहा सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग॥

जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय।
बारे उजियारो लगे, बढ़े अँधेरो होय॥

रहिमन देख बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तलवारि॥

बड़े काम ओछो करै, तो न बड़ाई होय।
ज्यों रहीम हनुमंत को, गिरिधर कहे न कोय॥

माली आवत देख के, कलियन करे पुकारि।
फूले फूले चुनि लिये, कालि हमारी बारि॥

एकहि साधै सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूलहि सींचबो, फूलहि फलहि अघाय॥

रहिमन वे नर मर गये, जे कछु माँगन जाहि।
उनते पहिले वे मुये, जिन मुख निकसत नाहि॥

रहिमन विपदा ही भली, जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय॥

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥

रहिमन निज मन की व्यथा, मन में राखो गोय।
सुनि इठलैहैं लोग सब, बाटि न लैहै कोय॥

रहिमन चुप हो बैठिये, देखि दिनन के फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर॥

बानी ऐसी बोलिये, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय॥

मन मोती अरु दूध रस, इनकी सहज सुभाय।
फट जाये तो ना मिले, कोटिन करो उपाय॥

दोनों रहिमन एक से, जब लौं बोलत नाहिं।
जान परत हैं काक पिक, ऋतु वसंत कै माहि॥

रहिमह ओछे नरन सो, बैर भली ना प्रीत।
काटे चाटे स्वान के, दोउ भाँति विपरीत॥

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय॥

रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे, मोती, मानुष, चून॥

वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग।
बाँटनवारे को लगै, ज्यौं मेंहदी को रंग॥

Friday 18 November 2011

अशोक वर्मा की ग़ज़ल

प्रिय मित्र श्री अशोक वर्मा की यह ग़ज़ल बेहद पसंद है.

छूते नहीं हैं पाँव से अब तो ज़मीन लोग
रहते हवाओं में सदा सारे हसीन लोग.

झाँका किया खिड़की से वो मासूम-सा बच्चा
निकले सुबह तो शाम को लौटे ज़हीन लोग.

अपना नगर है चल ज़रा तू देखभाल कर
दे जाएँ ना धोखा  कहीं बेहतरीन लोग.

जब से लगा है आईना इस शहर के करीब
बगलें  लगे हैं झाँकने कुछ नामचीन लोग.

फुर्सत नहीं अपनों से जो कर पाएँ दिल की बात
यूं बन के सारे रह गए हैं जैसे मशीन लोग.
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 -पुस्तक- ग़ज़ल बोलती है से साभार

Friday 4 November 2011

8th Pratibhashalee Mohyal Vidyarthee Samman-2011



"8th Pratibhashalee Mohyal Vidyarthee Samaan " function was held at GMS Hq ,New Delhi on 9th October 2011. Dr Bhai Mahaveer ( Ex Governor MP ) was the Chief Guest. President GMS Rzd BD Bali gave away prizes and honored the students of Secondary and Sr Secondary classes for their excellent results. Dr Ashok Lav (Secy GMS ) is the convener of this award. He conducted the programme.--Pulkit Vaid

हिन्दी के लिए संघर्षरत रहे श्री राजकरण सिंह को विनम्र श्रद्धांजलि / अशोक लव

हिन्दी भाषा के लिए दीर्घकालीन संघर्षरत रहे जुझारू श्री राजकरण सिंह के निधन के समाचार ने स्तब्ध कर दिया. अनेक साहित्यिक आयोजनों में उनसे भेंट होती रही थी. वे अपनी तरह के  विशिष्ट  व्यक्ति थे. वर्षों तक हिन्दी भाषा के लिए ऐसा संघर्ष करने वाले बहुत कम लोग हुए हैं. हम हमेशा उनके प्रशंसक रहे हैं. राजकरण एक लहर थे जिसने पूरे देश को हिन्दी के लिए आंदोलित कर दिया था. उनके निधन पर हार्दिक सम्वेदनाएँ !!---अशोक लव 
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हिंदी आंदोलन के प्रमुख स्तम्भ " राजकरण सिंह जी " की असामयिक मृत्यु पर आयोजित शोक सभा |
समय : 4 नवम्बर 3 बजे शाम को
स्थान : भारत नीति प्रतिष्ठान
डी - 51 , हौज खास , नई दिल्ली

... भारतीय भाषा आंदोलन के पुरोधा राजकरणसिंह को आज 30 अक्टूबर 2011की सुबह को हृदयगति रूकने से अपने गांव बिष्णुपुरा बाराबंकी जनपद में निधन हो गया।
57 वर्षीय राजकरण सिंह, भारतीय भाषाओं को संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं में अग्रेजी अनिवार्यता के बंधन से मुक्त करने के लिए देश की राजधानी दिल्ली में अपने साथी पुष्पेन्द्रसिंह चैहान के साथ ‘अखिल भाारतीय भाषा संरक्षण संगठन’ के बेनरतले संघ लोक सेवा आयोग ‘यूपीएससी’ के समक्ष 16 ंसाल लम्बे अपने विश्व ंविख्यात निरंतर धरना प्रदर्शन ंकरके पूरे देश कंे ंप्रबुद्व जनमानस को लोहिया के आंदोलन के बाद उद्देलित करने वालों में प्रमुख रहे।
ंइसी ंमुद्दे पर 29 दिन लम्बी आमरण अनशन की गूंज संसद से लेकर भारतीय भाषा समर्थकों को झकझोर कर रख दिया था। उनके इसी आंदोलन की विराटता का पता इसी बात से साफ झलकता है कि देश के पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, पूर्व उपप्रधानमंत्री देवीलाल, चतुरानन्दमिश्र, मुलायमसिंह यादव, शरद यादवं, रामविलास पासवान, सोमपाल शास्त्री, सहित चार दर्जन से अधिक सांसदों ने कई समय यहां के आंदोलन में ंसडक में भाग लिया था।
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माॅ भारती के चरणों में ताउम्र समर्पित रहे भाषा आंदोलन के पुरोधा राजकरण सिंह
‘राजकरण जी का निधन हो गया’ - मुझे सहसा विश्वास ही नहीं हुआ। विश्वास होता भी कैसे ं29 अक्टूबर की सांय 4 व 5 बजे की बीच मेरी राजकरण सिंह से दूरभाष पर बात हुई । वे दीपावली के त्यौहार अपने परिजनों से मिलने अपने गांव, विष्णुपुरा-बाराबंकी उंत्तर प्रदेश गये थे। 29 अक्टूबर को सायं 4 व 5ंबजे के बीच उनसे दूरभाष पर बात हुई वे उस समय ...पूरे स्वस्थ व किसी काम से लखनऊं जाने की बात कह रहे थे,,--संसद में भारतीय भाषाओं के लिए नारा लगाने के 21 अप्रेल 1989 के बाद में भारतीय भाषा आंदोलन से जुडा। वहां मेरी भैंट राजकरण सिंह,ं पुष्पेन्द्र चैहान सहित अन्य साथियों के साथ हुई । उसी आंदोलन के ंदंौरान मैं उत्तराखण्ड र ाज्य गठन आंदोलन के लिए अपने आप को समर्पित करने का मन बना कर प्यारा उत्तराखण्ड समाचार पत्र का 1993 से प्रकाशन किया। राजकरण सिंह ंकें साथ मेरे दोे दशक के करीब का साथ रहा। ंभाषा आंदोलन के दौरान उनके तैवर, संगठन प्रबंधन क्षमता, वैचारिक ंप्रबुद्वता व ंसंहृदय को देख कर मैने उनको अपने बडे भाई व साथी के रूप में तब से आज तक पाया। यादें ंरह रह कर मुझे उद्देल्लित कर रही है। चाहे भाषा आंदोलन में जब वे जेल से न्यायालय लाये गये तो न्यायाधीश के सम्मुख्ंा उनकी सिंह गर्जना, उप प्रधानमंत्री देवीलाल से जब हम दोनों उनके ंरंाष्ट्रपति भवन परिसर में मिले आवास में मिलने की घटना हो, ज्ञानी जैलसिंह, अटल बिहारी वाजपेयी आदि के संग धरने पर मुद्दंे पर समर्पण आदि सैकडों यादों का सहभागी रहा मैं आज जान कर भी ंयह मानने के लिए तैयार नही हूॅ कि राजकरण सिंह जी यहां नहीं रहे।--जब मैं व राजकरण सिंह ंबाबा रामदेव के आन्दोलन में जाते या अण्णा हजारे सहित देश के आंदोलन में जाते तो वे कहते मेरा मन करता कि एक बार फिर 29 दिन वाली ऐतिहासिक भूखहड़ताल करूं। वरिष्ठ पत्रकार बनारसीसिंह व भाई महेश जी के साथ मिल कर बातें करते करते चाय पीते पीते अनैक ज्वलन्त विषयों पर चर्चा करनंा हम दोनों की दिनचर्या का एक अंग बन गया था। आये दिन हम ंएक दूसरे से मिलते रहते, अगर कारणवश मिले नहीं तो दूरभाष पर अवश्य बात होती। वे अपने अनुभवों को याद करते हुए ंकहते रहते अब तक छोटे लक्ष्य व सोच वाले लोगों ंका साथ इंसान को किसी भी हालत में नहीं करना चाहिए।वे अवसरवादी इन्सानों को पहचानने के बाद उनसे ंदूर ही रहते। वे भाषा आंदोलन के साथियों के तो बडे भाई व संरक्ष्ंाक के रूप में थे पर अपने सभी परिचितों के साथ वे परिवार के एक जिम्मेदार सदस्य के रूप में ंसदा खडे रहते। चाहे विजय गुप्त जी के साथ हो या मेरे। हर ंकाम को वे बहुत ही ंईमानदारी व जिम्मेदारी से निभाते। ंवे सदा अहं को छोड़ कर निष्छल सेवा भाव से हर काम को मजिल तक अंजाम दे कर पूरा करने में विश्वास रखते। उनका व मेरा एक मित्र व एक भाई की तरह अनन्य साथ कई वर्षो से निरंतर बना हुआ था। आज हर जगह हर मोड़ व हर अवसर पर मुझे लगता है कि राजकरण जी अभी आते तभी आते... .। -बार बार आंखों में उमडते आंसुओं कोे मानो वो ही धीरज देते हुए से प्रतीत होते कि इसी का नाम जीवन है। यह सोच कर की हर जीवन की यात्रा का यही मुकाम है,। उनकी यादे ही मेरे शेष जीवन पथ की धरोहर है। मै उनकी पावन स्मृति को शतः शतः नमन् करता हॅू। www.rawatdevsingh.blogspot.com
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Sunday 30 October 2011

यह देह ही अपनी नहीं ....अशोक लव

यह  देह ही अपनी नहीं ....अशोक लव 

असफलताएँ सफलताओं की ओर ले जाने वाली सीढियां हैं / --अशोक लव

असफलताएँ सफलताओं की ओर ले जाने वाली सीढियां हैं--अशोक लव

Saturday 22 October 2011

Mohyal Students Honored / Ashok Lav

8th Pratibhaashaalee Mohyal 
Vidyarthee Samman-2011 
was organised and held on 
9th October 2011 
at Mohyal Foundation,
New Delhi.
71 students were honored.

Thursday 20 October 2011

कविता -'गर्म मोम '/ अशोक लव

ठंडी जमी मोम 
सब सह जाती है 
छोटी-सी 
पतली-सी 
सुई 
उतर जाती है 
आर-पार .  
 तपती है जब मोम 
आग बन जाती है 
चिपककर झुलसा देती है. 
समय के अनुसार 
जीवन को मोम बनना पड़ता है.
@अशोक लव





Monday 17 October 2011

ਮੋਹਯਾਲ ਆਸ਼੍ਰਮ ਵ੍ਰਿੰਦਾਵਨ ਅਤੇ ਗੋਵਰਧਨ ਲਈ ਆਰਥਿਕ ਯੋਗਦਾਨ ਦੀ ਅਪੀਲ /ਅਸ਼ੋਕ ਲਵ

ਸਾਰੇ ਮੋਹ੍ਯਾਲਾਂ ਨੂੰ ਅਨੁਰੋਧ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਕੀ ਜਨਰਲ ਮੋਹਯਾਲ ਸਭਾ ਵੱਲੋਂ ਦੋ ਨਵੇਂ ਬਣ ਰਹੇ ਆਸ਼ਰਮਾਂ ---ਮੋਹਯਾਲ ਆਸ਼੍ਰਮ ਵ੍ਰਿੰਦਾਵਨ ਅਤੇ ਮੋਹਯਾਲ ਆਸ਼੍ਰਮ ਗੋਵਰਧਨ ਲਈ ਆਰਥਿਕ ਯੋਗਦਾਨ ਕਰਕੇ ਪੁੰਨ ਦੇ ਭਾਗੀਦਾਰ ਬਣੋ . 
ਸਹਯੋਗ ਰਾਸ਼ੀ ਏਸ ਪਤੇ ਤੇ ਭੇਜਣ ਦਾ ਕਸ਼ਟ ਕਰੋ. ਚੇਕ 'ਜਨਰਲ ਮੋਹਯਾਲ ਸਭਾ ' ਦੇ ਨਾਂ ਤੇ ਭੇਜੋ --
Ashok Lav , Secretary-General Mohyal Sabha ,A-9,Qutab Institutional Area, Jeet Singh Marg,New Delhi-110067
Phone-011-26560456

समय के अनुसार परिवर्तन

भवत्यधर्मो धर्मो हि धर्माधर्मावुभावपि ।
कारणाद्देशकालस्य देशकाल: तादृश: ॥

-- देशकाल का ऐसा प्रभाव होता है कि एक ही काम एक समय में धर्म हो सकता है और वही समय बदलने पर अधर्म भी बन सकता है.-महाभारत (शांतिपर्व-- 79/31 )

Friday 16 September 2011