Friday 9 November 2012

अशोक लव की लघुकथा ' सामने वाला कमरा '

शैवाल कक्षा में खिड़की के पास बैठता था.मैं निराला की कविता पढ़ा रहा था.वह बहुत देर से खिड़की से बाहर देखे जा  रहा था. विद्यार्थियों का ध्यान इधर-उधर हो तो मुझसे पढ़ाया नहीं जाता.उसकी ओर तीन-चार बार देख चुका था.उसे तो मानो किसी की चिंता ही नहीं थी.वह कक्षा में हमेशा प्रथम आता था.पर इस प्रकार की अनुशासंहीनता तो असहनीय थी.
उसके पास जाकर खड़ा हो गया. उसे कुछ पता न चला.
' कहाँ खोए हुए हो ?'-उसे कंधे से पकड़कर झकझोरते हुए कहा.
'सर ,वह .....' -वह घबरा गया. फिर एकदम खड़ा हो गया.
पूरी कक्षा हँस पडी.
' बैठ जाओ ,कविता पढ़ा रहा हूँ. ध्यान नहीं दोगे तो समझ नहीं पाओगे .' -उसे बिठाते हुए कहा.
वह रो पड़ा.
घंटी बज गई. पीरियड समाप्त हुआ. स्टाफ़-रुम जाकर भी उसका चेहरा आँखों के सामने आता रहा.एक विद्यार्थी को उसे बुलाने भेजा.
' बैठो शैवाल !' वह आया तो उसे साथ वाली कुर्सी पर बैठने के लिए कहा.वह झिझकते हुए बैठ गया.
' तुम कक्षा में रो क्यों पड़े थे ? मैंने तो कुछ भी नहीं कहा था ?'
' सर,आज माता जी की मृत्यु हुए पूरे दो वर्ष हो गए हैं. साथ वाले अस्पताल में उनकी मृत्यु हुई थी. मैं अस्पताल के  उसी कमरे की ओर देख रहा था.'
मैं अवाक् उसका मुख देखता रह गया. यदि कक्षा में उसे सज़ा दे देता  तो?

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