Tuesday, 14 October 2014
Saturday, 11 October 2014
Wednesday, 1 October 2014
'बोलता आईना' :संवेदनशील लघुकथाकार की श्रेष्ठ लघुकथाएँ / अशोक लव
बहुमुखी प्रतिभासंपन्न साहित्यकार रघुविन्द्र यादव हिंदी साहित्य में
गद्य और पद्य में सक्रिय लेखनरत हैं। कविता के क्षेत्र में वे दोहाकार के
रूप में विशेष रूप से चर्चित हैं। छंदबद्ध कविताओं में परंपरागत छंदों के
श्रेष्ठ कवि हैं। संपादक हैं। उनकी अनेक रचनाओं को पढ़ा है। वे सामाजिक
सरोकार के कवि हैं।
उनकी चिंतन—प्रक्रिया का प्रभाव उनकी लघुकथाओं पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। लघुकथा लेखन के लिए अतिरिक्त प्रतिभा का होना आवश्यक होता है, ठीक उसी प्रकार जैसे दोहा लिखना। कम से कम शब्दों में अपना जीवन—दर्शन, अपनी सोच, परिवेश से संबद्धता, समाज के प्रति दृष्टिकोण आदि को साहित्य की किसी विधा में अभिव्यक्त करना सरल नहीं होता। लघुकथा विधा की विशेषता यही है कि इसमें कथा और व्यंग्य को समाहित करके अपने अभीष्ट को अभिव्यक्त किया जाता है। लघुकथा व्यापकता को संक्षिप्तता में क्षमतापूर्वक अभिव्यक्ति की विधा है। लघुकथाकार सदा सतर्क रहने वाला, समाज का सूक्ष्मता से विवेचना करने वाला और इन सबका मंथन करके एक विशिष्ट विधा में, जिसे लघुकथा कहते हैं, सृजनकर्ता होता है। जिस प्रकार दोहाकार चार चरणों और दो पंक्तियों में नीति, दर्शन, अध्यात्म, सामाजिक विसंगतियों आदि की अभिव्यक्ति करता है, उसी प्रकार लघुकथाकार भी कम से कम शब्दों में इन सबकी अभिव्यक्ति करता है।
रघुविन्द्र यादव लघुकथाकार भी हैं और दोहाकार भी हैं। मैंने उनके दोहे न पढ़े होते तो उनकी लघुकथाओं की विवेचना भिन्न रूप से करता। उनकी पैनी दृष्टि को मैंने उनके दोहों में देखा है। जीवन में घटित होने वाली घटनाओं के वे सूक्ष्म पर्यवेक्षक हैं। इस कारण से उनकी लघुकथाओं में शिक्षा, पारिवारिक—सामाजिक संबंध, राजनीति, प्रशासन, चिंतन, मूल्यों का अवमूल्यन आदि का यथार्थ चित्रण हुआ है।
रघुविन्द्र यादव ज़मीन से जुड़े साहित्यकार हैं। उनकी सभी लघुकथाए इसकी प्रमाण हैं। इन लघुकथाओं को पढ़ते समय लेखक के अनेक रूप सामने आते हैं। इनमेें उनका जीवन—दर्शन अभिव्यक्त हुआ है, इसलिए वे दार्शनिक के रूप में सामने आते हैं। 'अपनी—अपनी सोच’ में रोटी और तवे में संवाद हो अथवा 'असली दोषी’ में गेहू—चक्की संवाद हो या 'बलिदान’ में कुल्हड़ का पक्ष हो इनमें इन पात्रों के माध्यम से लेखक के जीवन—दर्शन की ही झलक मिलती है।
लेखक का दूसरा रूप उभरता है एक शिक्षाविद् के रूप में। रघुविन्द्र यादव ने शिक्षा संबंधी अनेक लघुकथाएँ लिखी हैं। इनमें शिक्षकों, शिक्षा—संस्थाओं,विद्यार्थियों, शिक्षा अधिकारियों, शिक्षा—सबंधी पुरस्कारों आदि का चित्रण हुआ है। सरकारी पुरस्कारों को किस प्रकार दिया जाता है या किस प्रकार प्राप्त किया जाता है, इसका पता सबको है। अधिकांश पुरस्कार सिफ़ारिश पर अयोग्य पात्रों को दिए जाते हैं। शिक्षा जगत में भी
ऐसा ही होता है। योग्य शिक्षक पुरस्कृत नहीं होते, अयोग्य विभिन्न तिकड़मों द्वारा पुरस्कार प्राप्त कर लेते हैं। 'शिक्षक—पुरस्कार’ में लेखक ने इसका प्रभावशाली ढंग से चित्रण किया है। चिराग शर्मा जोड़—तोड़ करके इस पुरस्कार को प्राप्त करता है। ऐसे असंख्य पुरस्कृत शिक्षक सर्वत्र मिल जाते हैं। संवादात्मक श्ौली में लेखक ने इसे सशक्त रूप से अभिव्यक्ति प्रदान की है।
ऐसा नहीं है कि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत व्यक्ति सरकारी पुरस्कार प्राप्त करने के लिए प्रयासरत रहते हैं। 'पुरस्कार’ लघुकथा के माध्यम से लेखक ने इसके दूसरे पक्ष को भी सामने रखा है। 'डॉ.साहब’ लेखक हैं। उसे वर्षों से लेखनरत रहने पर भी कोई सरकारी पुरस्कार या सम्मान नहीं मिला। उसे इन पुरस्कारों की चिंता नहीं है। अपने मित्र को उत्तर देते हुए डॉ.साहब का कथन है—"सुमन जी, आप जैसे विद्वानों का प्यार ही हमारे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है। हम पुरस्कारों और सम्मानों के लिए लिखते ही नहीं। ...जहाँ तक पुरस्कार लाने की बात है, बहन बेचकर बहू कोई भी ला सकता है।’’
पुरस्कार रघुविन्द्र यादव की छोटी—सी लघुकथा है। लेखक ने इसमें समाज के विभिन्न क्षे़त्रों में निःस्वार्थ भाव से कार्यरत व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व 'डॉ.साहब’ के रूप में किया है। साहित्य ही नहीं समाज के विभिन्न क्षेत्रों में ऐसे हज़ारों व्यक्ति मिल जाएँगे जो अपनी साधना में तन्मय हैं।
रघुविन्द्र यादव का एक और रूप है, वह है सामाजिक सरोकारों के लघुकथाकार का रूप। लेखक का यह रूप अत्यंत प्रभावशाली है। घर—परिवार से लेकर राजनीति तक लेखक ने सब पर खूब लिखा है।
मूल्यों के अवमूल्यन पर लेखक ने अनेक लघुकथाएँ लिखी हैं। 'रावण दहन’ में इसे प्रत्यक्ष रूप से अनुभव किया जा सकता है। एक समय था जब सामाजिक उत्सवों और समारोहों में समाज के प्रतिष्ठित और चरित्रवान व्यक्तियों को मुख्य या विशिष्ट—अतिथि बनाया जाता था। इससे समारोहों की गरिमा तो बढ़ती ही थी समाज को संदेश भी मिलता था। आज स्थिति भिन्न हो चुकी है। भ्रष्ट धनी व्यक्ति, बाहुबली, अपराधी, चरित्रहीन व्यक्तियों को आयोजक स्वार्थवश उत्सवों—समारोहों में मुख्य—अतिथि के रूप में आमंत्रित करते हैं। मिठन लाल ऐसा ही पात्र है जो सेक्स—कांड में लिप्त था और सीडी के उजागर होने के कारण कुचर्चित था। रामलीला का प्रधान—आयोजक उसे मुख्य—अतिथि बनाने के लिए तर्क देता है—"मित्रो, व्यवहारिक बनें, केवल आदर्शवाद से काम नहीं चलता। हमें रामलीला करने और रावण—दहन के लिए धन चाहिए। वह चाहे राम का अवतार दे या रावण का। क्या फ़र्क पड़ता है?’’
प्रधान आयोजक का कथन आज के समाज के पतन को रेखांकित करता है। राम की लीला का प्रदर्शन समाज में राम के आदर्शों को स्थापित करने की भावना से किया जाता है। आयोजकों की भावना धनार्जन तक सीमित रह गई है। लेखक ने प्रधान—आयोजक पात्र द्वारा इस प्रकार की मानसिकता वालों पर तीखा प्रहार किया है।
'साजिश’ और स्थानांतरण उद्योग’ के माध्यम से लेखक ने राजनेताओं पर व्यंग्य किया है। राजनेता ऐसा विषय है जिस पर हज़ारों लघुकथाएँ लिखी गई हैैं और लिखी जाएँगी। राजनेता सदाबहार पात्र हैं। इन पर फ़िल्में बनी हैं, कहानियाँ और उपन्यास भी लिखे गए हैं। वस्तुतः यह छल—कपट, झूठ—प्रपंच आदि समस्त बुराइयों और अवगुणों से परिपूर्ण पात्र हैं। राजनेताओं की यह स्थिति उनके दुराचरण और भ्रष्टता के कारण हुई है। रघुविन्द्र यादव ने भी इन पर तीखा व्यंग्य किया है।
रघुविन्द्र यादव ने इन लघुकथाओं में नारी के विभिन्न रूपों का चित्रण किया है। 'फिर सड़क पर’ के माध्यम से लेखक ने उन महिलाओं पर व्यंग्य किया है जो स्वार्थ पूर्ति हेतु सब कुछ करने को तैयार हो जाती हैं। सफलता प्राप्ति के समक्ष चरित्र उनके लिए महत्त्वहीन होता है। 'रमा’ ऐसी ही महिला है। वह पति को छोड़कर विज्ञापन—कंपनी में काम दिलाने वाले 'सागर’ से विवाह कर लेती है। सफलता की पहली सीढ़ी पर चढ़ने के लिए वह उस व्यक्ति को छोड़ देती है, जिसके साथ उसने अग्नि के समक्ष सात फेरे लिए थे। सफलता की अगली सीढ़ी पर चढ़ते ही वह 'सागर’ को त्यागकर नई कंपनी के मालिक मोहित के साथ रहने लगती है। सफलता की तीसरी सीढ़ी चढ़ने पर वह 'मोहित’ को त्यागकर नए बॉस 'विजय’ के साथ रहने के लिए जाती है। इस प्रकार की महिलाओं की मानसिकता को लेखक ने 'रमा’ द्वारा इस प्रकार उजागर किया है—'मैं यहाँ से जा रही हूँ अपने नए बॉस विजय के साथ। अगर गरीबी में ही रहना होता तो अपने पति के साथ ही न रह लेती।’’
भरतीय संस्कृति में महिलाओं की विशिष्ट सम्मानजनक स्थिति रही है। आज समाज 'लिव—इन’ की स्थिति तक पहुँच गया है। इस लघुकथा के माध्यम से लेखक ने तेज़ी से परिवर्तित हो रही सामाजिक स्थितियों और कुछ महिलाओं की सोच का सशक्त चित्रण किया है।
'उत्तरदायित्व’ लघुकथा में अलग—अलग मानसिकता की महिलाओं का चित्रण हुआ है। यह पारिवारिक संदर्भ में आदर्शोन्मुखी लघुकथा है। एक ताला खराब हो जाता है। एक बहू उसके स्थान पर नया ताला खरीदना चाहती है। दूसरी उसे फेंक देना चाहती है। सबसे छोटी बहू खराब ताले को केरोसिन तेल से साफ़ करके ठीक कर देती है। ससुर घर की चाबी छोटी बहू को सौंपकर कहता है—"बेटी बुज़ुर्ग भी घर के ताले होते हैं। मुझे यकीन हो गया, इन तालों की सेवा—संंभाल तुम्हीं कर सकती हो।’’
लेखक ने रमा और छोटी बहू पात्रों के माध्यम से दो महिलाओं का चित्रण किया है। एक सुख—सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए पति पर पति बदल लेती है और दूसरी पारिवारिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने वाली है। मरते मानव मूल्यों के मध्य भी छोटी बहू जैसी महिलाएँ हैं जो पतनोन्मुख समाज में आशा की उजली किरणें हैंै।
'झूठ’ और पितृभक्त’ लघुकथाओं में लेखक ने दोहरे चरित्र वालों पर व्यंग्य किया है। 'प्रार्थना’ लघुकथा में पुष्पा के माध्यम से लेखक ने उन बहुओं पर कटाक्ष किया है जो सास की मृत्यु की प्रार्थना करने के लिए मंदिर जाती हैं। इसी प्रकार की अनेक लघुकथाओं मेें आए दिन घटने वाली घटनाओं का चित्रण किया है।
'मृत्यु भोज’ द्वारा लेखक ने उन पुत्रों पर व्यंग्य किया है जो जीवित माता—पिता की देखभाल नहीं करते। उनकी मृत्यु पर गाँव भर को भोज पर आमंत्रित करके अपनी प्रतिष्ठा बनाना चाहते हैं। श्याम सिंह के पिता का निधन हो जाता है। वह गाँव को भोज देना चाहता है। इसके लिए पंचायत बुलाई जाती है। इस पर पंचों में बहस होती है। एक पंच 'नंदू’ कहता है—"मेरा विचार है कि हम श्याम सिंह जैसे लोगों का सामाजिक बहिष्कार करें, जो माँ—बाप की जीते जी तो सेवा नहीं करते, मरने पर गाँव को भोज देने और धमार्थ कार्य करने का ढोंग करते हैं।’’
हमारे चारों ओर, विशेषतया नगरों—महानगरों में, ऐसी अनेक घटनाएँ घट रही हैं जिनमें पुत्र वृद्ध माता—पिता को घर से निकाल देते हैं। वे सड़कों पर रहने को विवश हो जाते हैं। न्यायालयों मेेंं जाकर पुत्रों पर मुकद्दमा करके अपना अधिकार पाते हैं। वृद्ध माता—पिता के प्रति उपेक्षा और उन्हें भूखे मारना, ऐसा वर्षों से होता आया है। प्रेमचंद ने जुम्मन शेख द्वारा खालाज़ान की संपत्ति हड़प लेने और खाना न देने का उल्लेख 'पंच परमेश्वर’ में किया गया है। 'बूढ़ी काकी’ में भी भतीजे द्वारा वृद्धा काकी को दाने—दाने के लिए तरसाने की व्यथा है। लेखक रघुविन्द्र यादव ने इस लघुकथा द्वारा एक ओर श्याम सिंह जैसे पुत्रों का चरित्र उजागर किया है तो दूसरी ओर नंदू के माध्यम से संदेश भी दिया है।
रघुविन्द्र यादव संवेदनशील लघुकथाकार हैं। उनकी यह संवेदनशीलता अनेक लघुकथाओं के माध्यम से अभिव्यक्त हुई है। 'मृत्यु—भोज’ में वे माता—पिता की उपेक्षा करने वालों को उजागर करते हैंं। 'मेरी माँ’ लघुकथा द्वारा उनकी संवेदनशीलता तीसरे पुत्र के माध्यम से प्रकट होती है। इसके साथ—साथ पुत्रों के माता—पिता के प्रति उपेक्षा भाव का भी पता चलता है। माँ की मृत्यु पर तीसरा पुत्र माँ के शव सेे लिपट कर रोता है। दो पुत्र शांत रहते हैं। वास्तव में दोनों पुत्र माँ को गाँव में पंद्रह वर्ष पूर्व ही छोड़कर शहर में बस गए थे। माँ की देखभाल सेवा—सुश्रुषा तीसरे पुत्र ने की थी। उसके लिए माँ का निधन दुखदायी था।
'चोरी’ लघुकथा के माध्यम से लेखक ने स्पष्ट करना चाहा है कि न तो सभी मालिक क्रूर और संवेदनहीन होते हैं और न नौकर—नौकरानियाँ चोर होते हैं। मालिक के यहाँ लाखों की चोरी हो जाने का समाचार जानकर नौकरानी छुटकी घबरा जाती है। वह सोचती है कि उस पर चोरी का आरोप लगाया जा सकता है। वह ज़ल्दी से मालिक के घर पहुँचती है जहाँ पुलिस वाले पूछताछ करते हैं। वे मालिक से नौकरों के विषय में पूछते हैं। मालिक कहते हैं कि उन्हें अपने नौकरों पर शक नहीं है। वे उनका बचाव करते हैं। छुटकी की जान में जान आती है। इस प्रकार की अनेक लघुकथाएँ हैं जिनमें लेखक ने सकारात्मक सोच के पात्रों का सृजन किया है।
रघुविन्द्र यादव ने इन लघुकथाओं के माध्यम से समाज के विभिन्न रूपों को चित्रित किया है। इसके लिए उन्होंने जीवंत और प्रभावशाली पात्रों का सृजन किया है। पात्रों के परिवेश को स्थानीय भाषा के प्रयोग द्वारा सशक्त किया है। इन लघुकथाओं की भाषा आम बोलचाल की भाषा है। यथास्थान मुहावरों और सूक्तियों का भी प्रयोग किया है। कथोपकथन श्ौली लेखक की प्रिय श्ौली है। कुछ लघुकथाएँ बोधकथाओं—सी बन गई हैं। 'शेर और खरगोश’ की प्रचलित कथा को नए रूप में प्रस्तुत किया गया है। ऐसे कई प्रयोग किए गए हैं। इन लघुकथाओं की विशेषता है इनका सीधे, सहजता से पाठकों तक अपना अभीष्ट अभिव्यक्त कर देना।
मैं रघुविन्द्र यादव को बधाई देता हूँ। वे निरंतर लेखनरत रहें। लघुकथा विधा को समृद्ध करने के लिए समर्पित रहें। उनकी ये लघुकथाएँ पाठकों को खूब पसंद आएँगी, ऐसा मेरा विश्वास है।
उनकी चिंतन—प्रक्रिया का प्रभाव उनकी लघुकथाओं पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। लघुकथा लेखन के लिए अतिरिक्त प्रतिभा का होना आवश्यक होता है, ठीक उसी प्रकार जैसे दोहा लिखना। कम से कम शब्दों में अपना जीवन—दर्शन, अपनी सोच, परिवेश से संबद्धता, समाज के प्रति दृष्टिकोण आदि को साहित्य की किसी विधा में अभिव्यक्त करना सरल नहीं होता। लघुकथा विधा की विशेषता यही है कि इसमें कथा और व्यंग्य को समाहित करके अपने अभीष्ट को अभिव्यक्त किया जाता है। लघुकथा व्यापकता को संक्षिप्तता में क्षमतापूर्वक अभिव्यक्ति की विधा है। लघुकथाकार सदा सतर्क रहने वाला, समाज का सूक्ष्मता से विवेचना करने वाला और इन सबका मंथन करके एक विशिष्ट विधा में, जिसे लघुकथा कहते हैं, सृजनकर्ता होता है। जिस प्रकार दोहाकार चार चरणों और दो पंक्तियों में नीति, दर्शन, अध्यात्म, सामाजिक विसंगतियों आदि की अभिव्यक्ति करता है, उसी प्रकार लघुकथाकार भी कम से कम शब्दों में इन सबकी अभिव्यक्ति करता है।
रघुविन्द्र यादव लघुकथाकार भी हैं और दोहाकार भी हैं। मैंने उनके दोहे न पढ़े होते तो उनकी लघुकथाओं की विवेचना भिन्न रूप से करता। उनकी पैनी दृष्टि को मैंने उनके दोहों में देखा है। जीवन में घटित होने वाली घटनाओं के वे सूक्ष्म पर्यवेक्षक हैं। इस कारण से उनकी लघुकथाओं में शिक्षा, पारिवारिक—सामाजिक संबंध, राजनीति, प्रशासन, चिंतन, मूल्यों का अवमूल्यन आदि का यथार्थ चित्रण हुआ है।
रघुविन्द्र यादव ज़मीन से जुड़े साहित्यकार हैं। उनकी सभी लघुकथाए इसकी प्रमाण हैं। इन लघुकथाओं को पढ़ते समय लेखक के अनेक रूप सामने आते हैं। इनमेें उनका जीवन—दर्शन अभिव्यक्त हुआ है, इसलिए वे दार्शनिक के रूप में सामने आते हैं। 'अपनी—अपनी सोच’ में रोटी और तवे में संवाद हो अथवा 'असली दोषी’ में गेहू—चक्की संवाद हो या 'बलिदान’ में कुल्हड़ का पक्ष हो इनमें इन पात्रों के माध्यम से लेखक के जीवन—दर्शन की ही झलक मिलती है।
लेखक का दूसरा रूप उभरता है एक शिक्षाविद् के रूप में। रघुविन्द्र यादव ने शिक्षा संबंधी अनेक लघुकथाएँ लिखी हैं। इनमें शिक्षकों, शिक्षा—संस्थाओं,विद्यार्थियों, शिक्षा अधिकारियों, शिक्षा—सबंधी पुरस्कारों आदि का चित्रण हुआ है। सरकारी पुरस्कारों को किस प्रकार दिया जाता है या किस प्रकार प्राप्त किया जाता है, इसका पता सबको है। अधिकांश पुरस्कार सिफ़ारिश पर अयोग्य पात्रों को दिए जाते हैं। शिक्षा जगत में भी
ऐसा ही होता है। योग्य शिक्षक पुरस्कृत नहीं होते, अयोग्य विभिन्न तिकड़मों द्वारा पुरस्कार प्राप्त कर लेते हैं। 'शिक्षक—पुरस्कार’ में लेखक ने इसका प्रभावशाली ढंग से चित्रण किया है। चिराग शर्मा जोड़—तोड़ करके इस पुरस्कार को प्राप्त करता है। ऐसे असंख्य पुरस्कृत शिक्षक सर्वत्र मिल जाते हैं। संवादात्मक श्ौली में लेखक ने इसे सशक्त रूप से अभिव्यक्ति प्रदान की है।
ऐसा नहीं है कि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत व्यक्ति सरकारी पुरस्कार प्राप्त करने के लिए प्रयासरत रहते हैं। 'पुरस्कार’ लघुकथा के माध्यम से लेखक ने इसके दूसरे पक्ष को भी सामने रखा है। 'डॉ.साहब’ लेखक हैं। उसे वर्षों से लेखनरत रहने पर भी कोई सरकारी पुरस्कार या सम्मान नहीं मिला। उसे इन पुरस्कारों की चिंता नहीं है। अपने मित्र को उत्तर देते हुए डॉ.साहब का कथन है—"सुमन जी, आप जैसे विद्वानों का प्यार ही हमारे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है। हम पुरस्कारों और सम्मानों के लिए लिखते ही नहीं। ...जहाँ तक पुरस्कार लाने की बात है, बहन बेचकर बहू कोई भी ला सकता है।’’
पुरस्कार रघुविन्द्र यादव की छोटी—सी लघुकथा है। लेखक ने इसमें समाज के विभिन्न क्षे़त्रों में निःस्वार्थ भाव से कार्यरत व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व 'डॉ.साहब’ के रूप में किया है। साहित्य ही नहीं समाज के विभिन्न क्षेत्रों में ऐसे हज़ारों व्यक्ति मिल जाएँगे जो अपनी साधना में तन्मय हैं।
रघुविन्द्र यादव का एक और रूप है, वह है सामाजिक सरोकारों के लघुकथाकार का रूप। लेखक का यह रूप अत्यंत प्रभावशाली है। घर—परिवार से लेकर राजनीति तक लेखक ने सब पर खूब लिखा है।
मूल्यों के अवमूल्यन पर लेखक ने अनेक लघुकथाएँ लिखी हैं। 'रावण दहन’ में इसे प्रत्यक्ष रूप से अनुभव किया जा सकता है। एक समय था जब सामाजिक उत्सवों और समारोहों में समाज के प्रतिष्ठित और चरित्रवान व्यक्तियों को मुख्य या विशिष्ट—अतिथि बनाया जाता था। इससे समारोहों की गरिमा तो बढ़ती ही थी समाज को संदेश भी मिलता था। आज स्थिति भिन्न हो चुकी है। भ्रष्ट धनी व्यक्ति, बाहुबली, अपराधी, चरित्रहीन व्यक्तियों को आयोजक स्वार्थवश उत्सवों—समारोहों में मुख्य—अतिथि के रूप में आमंत्रित करते हैं। मिठन लाल ऐसा ही पात्र है जो सेक्स—कांड में लिप्त था और सीडी के उजागर होने के कारण कुचर्चित था। रामलीला का प्रधान—आयोजक उसे मुख्य—अतिथि बनाने के लिए तर्क देता है—"मित्रो, व्यवहारिक बनें, केवल आदर्शवाद से काम नहीं चलता। हमें रामलीला करने और रावण—दहन के लिए धन चाहिए। वह चाहे राम का अवतार दे या रावण का। क्या फ़र्क पड़ता है?’’
प्रधान आयोजक का कथन आज के समाज के पतन को रेखांकित करता है। राम की लीला का प्रदर्शन समाज में राम के आदर्शों को स्थापित करने की भावना से किया जाता है। आयोजकों की भावना धनार्जन तक सीमित रह गई है। लेखक ने प्रधान—आयोजक पात्र द्वारा इस प्रकार की मानसिकता वालों पर तीखा प्रहार किया है।
'साजिश’ और स्थानांतरण उद्योग’ के माध्यम से लेखक ने राजनेताओं पर व्यंग्य किया है। राजनेता ऐसा विषय है जिस पर हज़ारों लघुकथाएँ लिखी गई हैैं और लिखी जाएँगी। राजनेता सदाबहार पात्र हैं। इन पर फ़िल्में बनी हैं, कहानियाँ और उपन्यास भी लिखे गए हैं। वस्तुतः यह छल—कपट, झूठ—प्रपंच आदि समस्त बुराइयों और अवगुणों से परिपूर्ण पात्र हैं। राजनेताओं की यह स्थिति उनके दुराचरण और भ्रष्टता के कारण हुई है। रघुविन्द्र यादव ने भी इन पर तीखा व्यंग्य किया है।
रघुविन्द्र यादव ने इन लघुकथाओं में नारी के विभिन्न रूपों का चित्रण किया है। 'फिर सड़क पर’ के माध्यम से लेखक ने उन महिलाओं पर व्यंग्य किया है जो स्वार्थ पूर्ति हेतु सब कुछ करने को तैयार हो जाती हैं। सफलता प्राप्ति के समक्ष चरित्र उनके लिए महत्त्वहीन होता है। 'रमा’ ऐसी ही महिला है। वह पति को छोड़कर विज्ञापन—कंपनी में काम दिलाने वाले 'सागर’ से विवाह कर लेती है। सफलता की पहली सीढ़ी पर चढ़ने के लिए वह उस व्यक्ति को छोड़ देती है, जिसके साथ उसने अग्नि के समक्ष सात फेरे लिए थे। सफलता की अगली सीढ़ी पर चढ़ते ही वह 'सागर’ को त्यागकर नई कंपनी के मालिक मोहित के साथ रहने लगती है। सफलता की तीसरी सीढ़ी चढ़ने पर वह 'मोहित’ को त्यागकर नए बॉस 'विजय’ के साथ रहने के लिए जाती है। इस प्रकार की महिलाओं की मानसिकता को लेखक ने 'रमा’ द्वारा इस प्रकार उजागर किया है—'मैं यहाँ से जा रही हूँ अपने नए बॉस विजय के साथ। अगर गरीबी में ही रहना होता तो अपने पति के साथ ही न रह लेती।’’
भरतीय संस्कृति में महिलाओं की विशिष्ट सम्मानजनक स्थिति रही है। आज समाज 'लिव—इन’ की स्थिति तक पहुँच गया है। इस लघुकथा के माध्यम से लेखक ने तेज़ी से परिवर्तित हो रही सामाजिक स्थितियों और कुछ महिलाओं की सोच का सशक्त चित्रण किया है।
'उत्तरदायित्व’ लघुकथा में अलग—अलग मानसिकता की महिलाओं का चित्रण हुआ है। यह पारिवारिक संदर्भ में आदर्शोन्मुखी लघुकथा है। एक ताला खराब हो जाता है। एक बहू उसके स्थान पर नया ताला खरीदना चाहती है। दूसरी उसे फेंक देना चाहती है। सबसे छोटी बहू खराब ताले को केरोसिन तेल से साफ़ करके ठीक कर देती है। ससुर घर की चाबी छोटी बहू को सौंपकर कहता है—"बेटी बुज़ुर्ग भी घर के ताले होते हैं। मुझे यकीन हो गया, इन तालों की सेवा—संंभाल तुम्हीं कर सकती हो।’’
लेखक ने रमा और छोटी बहू पात्रों के माध्यम से दो महिलाओं का चित्रण किया है। एक सुख—सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए पति पर पति बदल लेती है और दूसरी पारिवारिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने वाली है। मरते मानव मूल्यों के मध्य भी छोटी बहू जैसी महिलाएँ हैं जो पतनोन्मुख समाज में आशा की उजली किरणें हैंै।
'झूठ’ और पितृभक्त’ लघुकथाओं में लेखक ने दोहरे चरित्र वालों पर व्यंग्य किया है। 'प्रार्थना’ लघुकथा में पुष्पा के माध्यम से लेखक ने उन बहुओं पर कटाक्ष किया है जो सास की मृत्यु की प्रार्थना करने के लिए मंदिर जाती हैं। इसी प्रकार की अनेक लघुकथाओं मेें आए दिन घटने वाली घटनाओं का चित्रण किया है।
'मृत्यु भोज’ द्वारा लेखक ने उन पुत्रों पर व्यंग्य किया है जो जीवित माता—पिता की देखभाल नहीं करते। उनकी मृत्यु पर गाँव भर को भोज पर आमंत्रित करके अपनी प्रतिष्ठा बनाना चाहते हैं। श्याम सिंह के पिता का निधन हो जाता है। वह गाँव को भोज देना चाहता है। इसके लिए पंचायत बुलाई जाती है। इस पर पंचों में बहस होती है। एक पंच 'नंदू’ कहता है—"मेरा विचार है कि हम श्याम सिंह जैसे लोगों का सामाजिक बहिष्कार करें, जो माँ—बाप की जीते जी तो सेवा नहीं करते, मरने पर गाँव को भोज देने और धमार्थ कार्य करने का ढोंग करते हैं।’’
हमारे चारों ओर, विशेषतया नगरों—महानगरों में, ऐसी अनेक घटनाएँ घट रही हैं जिनमें पुत्र वृद्ध माता—पिता को घर से निकाल देते हैं। वे सड़कों पर रहने को विवश हो जाते हैं। न्यायालयों मेेंं जाकर पुत्रों पर मुकद्दमा करके अपना अधिकार पाते हैं। वृद्ध माता—पिता के प्रति उपेक्षा और उन्हें भूखे मारना, ऐसा वर्षों से होता आया है। प्रेमचंद ने जुम्मन शेख द्वारा खालाज़ान की संपत्ति हड़प लेने और खाना न देने का उल्लेख 'पंच परमेश्वर’ में किया गया है। 'बूढ़ी काकी’ में भी भतीजे द्वारा वृद्धा काकी को दाने—दाने के लिए तरसाने की व्यथा है। लेखक रघुविन्द्र यादव ने इस लघुकथा द्वारा एक ओर श्याम सिंह जैसे पुत्रों का चरित्र उजागर किया है तो दूसरी ओर नंदू के माध्यम से संदेश भी दिया है।
रघुविन्द्र यादव संवेदनशील लघुकथाकार हैं। उनकी यह संवेदनशीलता अनेक लघुकथाओं के माध्यम से अभिव्यक्त हुई है। 'मृत्यु—भोज’ में वे माता—पिता की उपेक्षा करने वालों को उजागर करते हैंं। 'मेरी माँ’ लघुकथा द्वारा उनकी संवेदनशीलता तीसरे पुत्र के माध्यम से प्रकट होती है। इसके साथ—साथ पुत्रों के माता—पिता के प्रति उपेक्षा भाव का भी पता चलता है। माँ की मृत्यु पर तीसरा पुत्र माँ के शव सेे लिपट कर रोता है। दो पुत्र शांत रहते हैं। वास्तव में दोनों पुत्र माँ को गाँव में पंद्रह वर्ष पूर्व ही छोड़कर शहर में बस गए थे। माँ की देखभाल सेवा—सुश्रुषा तीसरे पुत्र ने की थी। उसके लिए माँ का निधन दुखदायी था।
'चोरी’ लघुकथा के माध्यम से लेखक ने स्पष्ट करना चाहा है कि न तो सभी मालिक क्रूर और संवेदनहीन होते हैं और न नौकर—नौकरानियाँ चोर होते हैं। मालिक के यहाँ लाखों की चोरी हो जाने का समाचार जानकर नौकरानी छुटकी घबरा जाती है। वह सोचती है कि उस पर चोरी का आरोप लगाया जा सकता है। वह ज़ल्दी से मालिक के घर पहुँचती है जहाँ पुलिस वाले पूछताछ करते हैं। वे मालिक से नौकरों के विषय में पूछते हैं। मालिक कहते हैं कि उन्हें अपने नौकरों पर शक नहीं है। वे उनका बचाव करते हैं। छुटकी की जान में जान आती है। इस प्रकार की अनेक लघुकथाएँ हैं जिनमें लेखक ने सकारात्मक सोच के पात्रों का सृजन किया है।
रघुविन्द्र यादव ने इन लघुकथाओं के माध्यम से समाज के विभिन्न रूपों को चित्रित किया है। इसके लिए उन्होंने जीवंत और प्रभावशाली पात्रों का सृजन किया है। पात्रों के परिवेश को स्थानीय भाषा के प्रयोग द्वारा सशक्त किया है। इन लघुकथाओं की भाषा आम बोलचाल की भाषा है। यथास्थान मुहावरों और सूक्तियों का भी प्रयोग किया है। कथोपकथन श्ौली लेखक की प्रिय श्ौली है। कुछ लघुकथाएँ बोधकथाओं—सी बन गई हैं। 'शेर और खरगोश’ की प्रचलित कथा को नए रूप में प्रस्तुत किया गया है। ऐसे कई प्रयोग किए गए हैं। इन लघुकथाओं की विशेषता है इनका सीधे, सहजता से पाठकों तक अपना अभीष्ट अभिव्यक्त कर देना।
मैं रघुविन्द्र यादव को बधाई देता हूँ। वे निरंतर लेखनरत रहें। लघुकथा विधा को समृद्ध करने के लिए समर्पित रहें। उनकी ये लघुकथाएँ पाठकों को खूब पसंद आएँगी, ऐसा मेरा विश्वास है।
Saturday, 8 March 2014
रेडियो द्वारका पर कवि-गोष्ठी में 'लड़कियाँ छूना चाहती हैं आसमान ' कविता
इसे इस लिंक पर क्लिक करके सुना जा सकता है.
: http://radiodwarka.com/
माँ की स्मृतियाँ / अशोक लव
व्यक्ति के जीवन में नारी की विभिन्न रूपों में अहम भूमिका होती है. इनमें सर्वाधिक महत्त्व माँ का होता है. आज अंतर्राष्ट्रीय महिला-दिवस के अवसर पर माँ की स्मृतियों में डूबना स्वाभाविक था. सहसा अनेक चित्र सामने उभरते रहे.
जब माँ नहीं रहती तब माँ की अनुपस्थिति का अहसास होता है.
बहन-पुत्री-पत्नी के रूप में जीवन में नारी की उपस्थिति इस यात्रा को सुखद बनाती है.
जब माँ नहीं रहती तब माँ की अनुपस्थिति का अहसास होता है.
बहन-पुत्री-पत्नी के रूप में जीवन में नारी की उपस्थिति इस यात्रा को सुखद बनाती है.
Saturday, 22 February 2014
Saturday, 8 February 2014
Saturday, 1 February 2014
गणतंत्र-दिवस की पूर्व संध्या पर कवि-सम्मलेन
दिल्ली अपार्टमेंट ,सेक्टर-बाईस,द्वारका,नई दिल्ली में गणतंत्र-दिवस की पूर्व संध्या पर पच्चीस जनवरी को कवि-सम्मलेन का आयोजन किया गया.इसकी अध्यक्षता वरिष्ठ कवि डॉ अशोक लव ने की ओर संचालन प्रेम बिहारी मिश्र ने किया. पूरी रिपोर्ट रेडियो द्वारका पर --इस लिंक को पर जाकर सुनें.
http://radiodwarka.com/ page-3/kavi-samelan-organized- by-sukh-dukh-ke-s/1945
http://radiodwarka.com/
Sunday, 12 January 2014
Sunday, 15 December 2013
धन्यवाद /अशोक लव
शब्दों से क्या उनका धन्यवाद दिया जा सकता है ?
पर भीगा मन कहता है सर्वप्रथम उन्हें धन्यवाद दूँ.
जीवन-यात्रा के मध्य इसे बहुतों ने सजाया- संवारा.
जीवन-यात्रा के मध्य इसे बहुतों ने सजाया- संवारा.
उन सबका धन्यवाद.
जो अपने नहीं थे उन्होंने भी अपनत्व से जीवन के बहुत दिनों को सुखमय बनाया. कुछ वर्षों से साथ हैं, कुछ ,कुछ पल साथ रहे. कुछ अधिक समय साथ रहे और अब न जाने कहाँ कैसी स्थिति में हैं. उन सबका धन्यवाद !
कुछ स्वार्थवश संग रहे और स्वार्थ पूरे कर चले गए.
जो अपने नहीं थे उन्होंने भी अपनत्व से जीवन के बहुत दिनों को सुखमय बनाया. कुछ वर्षों से साथ हैं, कुछ ,कुछ पल साथ रहे. कुछ अधिक समय साथ रहे और अब न जाने कहाँ कैसी स्थिति में हैं. उन सबका धन्यवाद !
कुछ स्वार्थवश संग रहे और स्वार्थ पूरे कर चले गए.
उनका भी धन्यवाद.
उनसे भी बहुत कुछ सीखने को मिला.
कुछ अपनों का मुखौटा ओढ़कर संग रहे और छल करके चले गए.
उनका भी धन्यवाद.
कुछ अब भी मुखौटा ओढ़े संग हैं .
कुछ अपनों का मुखौटा ओढ़कर संग रहे और छल करके चले गए.
उनका भी धन्यवाद.
कुछ अब भी मुखौटा ओढ़े संग हैं .
उनका भी धन्यवाद !
Friday, 13 December 2013
Thursday, 12 December 2013
National Law University:Poetry Workshop and Drama Fest / Jagran 2nd Dec
MOMENTS WITH POETRY DRAMA
Delhi,Dwarka Edition
Date of Publishing: 02 Dec 2013
Date of Publishing: 02 Dec 2013
It was a great literary and theatrical evening at National Law University, where plays and poetry together were staged by the students and the poets of the community. Classical plays like Antigone, a tragedy written by Sophocles in Ancient Greece, Merchant of Venice a of William Shakespeare, The benefit of the doubt , published in 1913 by Jack London etc were depicted by the students. According to Dr Prashananshu, the themes of plays revolved around the questions of justice, society and law. “The actors did not stick to the script religiously, and their ingenuity and innovation at times brought about unexpected and mostly delightful new interpretations of the original work. The unusual theme of the drama event was ‘Law and Literature’. It was a step to combine law, theatre and students at stage together,” said Prashananshu.
Also on the occasion poets like Dr Chandramani Brahamdutt, Sushma Bhandari, Vinita Malik, Virendra Kumar Mansotra, Vijay Saluja, Dr P Prasannaraj, MK Sinha, Shobhna Mittal etc. made their presentations. Dr Ashok Lav chaired the event, and Prem Bihari Mishra managed the stage. The theme of event was Law and Poetry.
The registrar of the University, Professor Srikrishna Deva Rao inaugurated the event with words of appreciation, and encouragement.
Friday, 29 November 2013
Poet Ashok Lav recites his two poems On Radio Dwarka
रेडियो द्वारका से कवि अशोक लव की दो कविताएँ--'कोई नहीं है' और 'बादल' 29 नवंबर 2013 को प्रसारित हुईं. नीचे दिए लिंक पर जाकर इन्हें सुना जा सकता है.
Saturday, 9 November 2013
अशोक लव रेडियो द्वारका पर बाल-गीत पढ़ते हुए
Sunday, 3 November 2013
Friday, 1 November 2013
Lishkara Shining: The Mighty Mohyal Documentary-2013
Lishkara Shining: The Mighty Mohyal Documentary-2013: The Mighty Mohyal Fest-2013 was organised by Mohyal Sabha Dehradun on 20th October at Amrik Hall,Race Course,Dehradun.
Wednesday, 30 October 2013
रेडियो द्वारका पर अशोक लव की कविताएँ
इस लिंक पर क्लिक करके कविताएँ सुनें . इन कविताओं की रिकार्डिंग छब्बीस अक्टूबर को की गई थी.
http://radiodwarka.com/ entertainment/daro-mat- roshani-kavita-suraj-hai-poe/ 1559
http://radiodwarka.com/
Sunday, 27 October 2013
Friday, 25 October 2013
Thursday, 10 October 2013
Friday, 4 October 2013
Saturday, 28 September 2013
साहित्यकार अशोक लव से प्रकाश भागवत का साक्षात्कार
' रेडियो द्वारका ' की ओर से श्री अनुराग सिंह ने मेरा साक्षात्कार करने का निर्णय लिया . उनके पत्रकार श्री प्रशांत भागवत ओर अभिनव मेरे निवास पर सितंबर को साक्षात्कार लेने आए थे. इस लिंक पर जाकर साक्षात्कार को सुना जा सकता है. अचानक बिना किसी तैयारी के यह साक्षात्कार हुआ है.
http://radiodwarka.com/chat- show/dr-ashok-lav-renowned- writer-and-poet-/1428
http://radiodwarka.com/chat-
Thursday, 26 September 2013
Sukh-Dukh Ke Saathee : Kavi Sammelan and Annual Day
![]() |
| Dr Ashok Lav (centre) presided Kavi-Sammellan |
‘Sukh Dukh Ke Sathee’Sanstha, an association of senior citizens dedicated for social cause, celebrated its Annual Day with full gusto in Community Hall of Chitrakoot Apartments in Sector-22, Dwarka (Delhi). On this occasion, President of the Sanstha, Vijay Shanker Singh elucidated aims and objectives of the Sansthaand impressed upon need of the time to live in harmony with mutual co-operation.General Secretary of the Sanstha Shri Shashi Kant Kapoor gave account of the activities of social welfare carried out by the Sansthaduring past one year and the Vice President Capt S.S. Mann elaborated the future plans. Chief Guest of the function Shri Jagmohan Mishra, Member Telecom Board and Ex-officio Secretary of the Government of India expressed immense pleasure on performance of the Sanstsha.Col P.C. Chaudhary, Jt. Secretary delivered vote of thanks.Convener of the programme D.C. Mathur conveyed special thanks for the help rendered by State Bank of India, Sector-23, Dwarka, for organizing this programme.
‘Kavi Sammelan’ was also organised by the Sanstha on this occasion, with the help of ‘Society for Creatives’. The secretary of Hindi Academy Delhi, Dr.Hari Suman Bisht, who himself is a renowned poet and writer, was the chief guest in this poetic meet where as Mr. Rajesh Gehlot, Chairman Standing Committee SDMC, participated as a guest of honour. Dr. Ashok Lav, a well-known writer, who has written more than a 100 books in Hindi, read poems from his books, and summed up the meet with his comments on the poets, in his presidential address. Dr Shabana Nazir and Ashok Verma famous for their ghazals as well as Satya Dev Haryanvi, the famous humorous poet, recited various creations in their characteristic styles and earned appreciation of the audience.Dr Kirti Kale conducted the programme and recited poems with her melodious voice,
The highlight of the event was the release of a poetry book , ज़िंदगी मेरी नज़र में and a video Punjabee album याद तेरी आई of
Virendra Kumar Mansotra by the Chief Guest. Prem Bihari Mishra’s
rendition of his meaning-laden poems in a musical way provoked prolonged
applause. Around a dozen poets attended the meet and presented their
works: amongst them were Dr.Prasannanshu of the National Law University,
Suresh Yadav, Anil Upadhyay, Anurag Ranjan Singh, Col Prem Chand
Choudaryand Kulvinder Singh Kang. The TV Channel ‘DD India’ of
Doordarshan will telecast copious glimpses of this poetry meet on 4th
October 2013 at 11.00 a.m., 18.30 p.m. and 02.00 am (next day) in the
programme ‘Yours Truly’.
The enthusiastic reception meted out by the residents of Dwarka was
heartening: the poetry meet extended late into the night, well into the
vicinity of midnight, but the audience of more than 200 who attended the
function constantly applauded and listened with rapt attention till the
very end.
It only shows the receptiveness of the literature-loving public of Dwarka: let us hope that this initiative continues, and Dwarka, known for many good things becomes centre of literature and culture, too. Shri Rajesh Gehlot and Secretary of Hindi Academy, Dr.Bisht , both on their part pledged support for the continuance of such literary events.Poetry-loving Dwarkites certainly look forward to many more similar cultural opportunities.[ DWARKA PARICHAY --25th September 2013 ]
It only shows the receptiveness of the literature-loving public of Dwarka: let us hope that this initiative continues, and Dwarka, known for many good things becomes centre of literature and culture, too. Shri Rajesh Gehlot and Secretary of Hindi Academy, Dr.Bisht , both on their part pledged support for the continuance of such literary events.Poetry-loving Dwarkites certainly look forward to many more similar cultural opportunities.[ DWARKA PARICHAY --25th September 2013 ]
Monday, 26 August 2013
Comment in Dwarka Parichay / Ashok Lav
Sunday, August 25, 2013
Great Compliments from Great Scholar
श्री एस.एस.डोगरा वरिष्ठ पत्रकार हैं. ' द्वारका परिचय ' के संपादक हैं. अत्यंत सक्रिय हैं. साहित्य से गहन लगाव है. उनसे कुछ माह पूर्व साहित्यिक आयोजनों में भेंट हुई थी. द्वारका ( नई दिल्ली ) की कोई भी गतिविधि ऐसी नहीं है जिन्हें वे अपने समाचार-पत्र में और ब्लॉग में कवर नहीं करते. यह उनका समर्पित व्यावसायिक पक्ष है.
उनका दूसरा पक्ष है, जिसने बेहद प्रभावित किया वह है उनका विनम्र स्वभाव और संस्कारवान होना. बड़ों को सम्मान देना , साहित्यकारों के प्रति आदर भाव , मानवीय मूल्यों के प्रति सजगता और अपनत्व-- इन सबका परिचय उनसे हुई मुलाकातों में मिल चुका था. परसों शाम अचानक फोन आया कि अभी-अभी मिलने आना चाहते हैं. ...और लगभग आधे घंटे के पश्चात वे आए. उनके साथ श्री संजय मिश्र आए थे. वे भागलपुर के रहने वाले थे. उनके साथ भागलपुर की चर्चाएँ हुईं. वहाँ के अपने विद्यार्थी जीवन के विषय में उन्हें बताया. श्री एस.एस.डोगरा कर्मठ पत्रकार और समाज-सेवी हैं. उन्हें अपनी पुस्तकें भेंट कीं. उसी समय का यह फोटोग्राफ !
- डॉ अशोक लव
Saturday, 24 August 2013
Ashok Lav – A Multifaceted Literary Personality / *Dr Makhan Lal Das
![]() |
| Dr Makhan Lal Das |
| Dr Ashok Lav |
I met him through face book, a simple, honest looking man
from Delhi. My fondness towards poetry
drew me closer to the poet in him. His poems are born out of subtle human
emotions and feelings, often touching a raw nerve here and there. It touched me too. I started translating his poems to Assamese
and the bond grew stronger. Finally I came face to face with him on a bright
sunny morning at the Metro Station in Dwarka. There he was, waiting to receive
me, my respected friend, Ashok Lav.
Ashok Lav is a multifaceted personality. He is a well-known academician, poet, writer,
critique, journalist and social worker.
He started his academic pursuits in the fields of science but his love
towards literature finally took him to the arts stream. He was born in a Mohyal Brahmin family . He
spent his childhood at Kaithal (Haryana) and also studied at Bhagalpur and
Monghyr (Bihar).He obtained his
graduation and B. Ed. degrees from Delhi
University and post graduate degree from
Himachal Pradesh University. He was conferred with Ph.D. and D. Lit. degrees
for his outstanding contribution in the fields of Hindi literature .
After completing his Masters in Hindi, he joined teaching
profession and continued to do so with full devotion and dedication for nearly
thirty years. Teaching was his profession but writing remained his
passion. He has tried his hands in
almost all areas of Hindi Literature and has been successful in creating a
niche for himself wherever he did. His first writing, a children one-act play
was published in ‘Navrashtra’, a Hindi daily, published from Patna and his
second in ‘Dainik Veer Arjun’, a daily published from Delhi. It was in the year
1964 when he was in the school. He has been writing since then and the flow of
writings has never stopped. His published works have already touched the
century mark which includes both educational and literary creations. As a
successful academician he has written a large number of text-books for students
of all standards. He has worked on
almost all modes of prose and has done exceedingly well in that. His Short stories, Laghukatha, novel, short stories, interviews,
reviews, essays and articles, drama etc. have been of the highest quality and
are very well received in the Hindi literary circles. In fact he played a
historical role in establishing Laghukatha
as a distinct form of writing. He has initiated discussions on various forums
like radio, television, literary circles etc on different aspects of Laghukatha. Ashok Lav is considered as a senior and leading
exponent of Hindi Laghukatha and ‘Salaam Dilli’, a collection of his Laghukatha is considered to be a historic
document on this.
Ashok Lav has seriously worked on the much neglected area of
interviews too. ‘Hindi Ke Pratinidhi Sahityokaron Se Sakshatkaar’ is his
greatest gift to Hindi literature in this line. While ceremonially releasing
the book, Vice-President of India Dr. Shankar Dayal Sharma called it a unique
creation in this much neglected area of literature. These interviews were
serially published in ‘Dainik Hindustan’, a Hindi daily of repute. His novel
‘Shikharon Se Age’ has been a subject of research. This novel depicts the
modern Indian society vividly covering almost all the aspects. Four students have received M. Phil. degrees
for their research works based on this novel.
Some other well acclaimed works of Ashok Lav included Pattharon Se
Bandhe Pankh ( Collection of short stories), Anubhooatiyon Ki Aahten (
Collection of Poems), Tutate Chakrvyuh (
ed-collection of Poems), Band Darwazon Par Dastaken (ed- collection of Lakhukatha), Chanakya Neeti (edited), Prem
Chand Ki Lokpriya Kahaniyan, Prem Chand Ki Sarvottam
Kahaniyan, Yug Pravartak Mahapurush, Yug Nayak Mahapurush,
Madhu Parag , Phulwaree and Mahak , Kholo Apne Baste Jee and Jhumen-Nachen-Gayen(Children
rhyms) etc..
Ladkiyan Chhoona Chahtee Hain Aasman, ceremonially released by Mrs. Shila
Dixit, Chief Minister of Delhi, is his latest collection of poems. Four
students had done M.Phil on this book.
Ashok Lav has been a successful journalist too. He has
edited many journals and magazines till date.
His has been associated with Samkaleen Chouthi Duniya (Literary editor),
Rashtriya Nilayam (Advisor-editor),
Komal Vichar (editor), Mansi (Advisor-editor), Laghu Katha-Sahitya
(chief editor) , New Observer Post, Qutub Mail (Advisor-editor), Yuva Batan (Advisor-editor) and many other magazines and periodicals. He
has been serving as the editor of the Hindi Edition of Mohyal Mitra , a
mouthpiece of the General Mohyal Sabha, for last twenty seven years. This is one of the longest continuously
published magazines of Indiaestablished in 1891. He was awarded with the ‘ Acharya Vijyendra
Snatak Smriti Samman’ and ‘ Yagnavalkya Patrakarita Puraskaar’ recently for his outstanding contribution
towards Hindi journalism. For his
exploits in the field of Hindi Literature, Ashok Lav has received
awards/citations/honors from more than sixty institutions/organizations so far.
Among them are Surya Kant Tripathi Nirala Samman, Creative Foundation Awarad, Mohyal Gaurav
Samman, Kabir Samman, Premchand Smriti Samman, Avantika Sahitya Samman,
Rashtriya Hindi Sevi Samman etc. to name a few. He has been ordained with
titles like Sahitya Shree, Patrakaar Ratna, Sahityalankar , Mohyal Shri etc. Some notable
institutions/organizations who have honored him are Kendriya Sachivalaya
Hindi Parishad, Dilli Sahitya Samaj,
Supathaga, Mitra Sangam, Yuva Chetna Mandal, Sahitya Kala Bharti, Mitra Sansar,
Raslok, Samay Sahitya Sammelan, Agaman Manch, Akhil Bhartiya Sahityakar
Parishad, Shabd Setu, Amar Sahitya Sansthan etc. The accolades he received were
not confined to literature only. His distinguished services as a teacher was
well recognized and he received the prestigious Dr Radhakrishnan Smriti
Rashtriya Sikshak Puraskar. After retirement from active service as a teacher
Ashok Lav has settled down in the Surya Apartments, Dwarka, New Delhi but has
never really retired. He has been actively involved in social activities in
addition to his literary works .He is one of the guiding lights of
organizations like General Mohyal Sabha etc. This simple, adorable writer and
poet has touched and inspired many a lives and I am fortunate enough to be one
of them.
-Dr Makhan
Lal Das
Director (Academics),
Chartered Institute of technology, Abu Road( Rajasthan), E-mail--dasmakhanlal@gmail.com
Contact : Ashok Lav ,FLAT-363,SURYA APTT,
PLOT-14,SECTOR-6,DWARKA,NEW DELHI-110075 (M) 9971010063, E-mail: kumar1641@gmail.com
Wednesday, 21 August 2013
लहरों के कामना-दीप / अशोक लव
Welcome To Mohyal-E Online: A poem by Dr. Ashok Lav : लहरों के कामना दीप
० अशोक लव
लहरों को सौंप दिया है कामना-दीप
जहाँ चाहे ले जाएँ
उन्ही पर आश्रित हैं अब तो
कामना दीप का अस्तित्व.
हथेलियों में रख कर सौंपा था
लहरों को कामना दीप
बहाकर ले जाने के लिए अपने संग
मंद मंद हिचकोले खाता
बढ़ता जाता है लहरों के संग.
कामना- दीप का भविष्य होता है
लहरों के हाथ
ज़रा सा प्रवाह तेज़ होते ही
डोलने लगता है
और अंततः समां जाता है लहरों में.
कामना-दीप सा समा जाना चाहता हूँ
सदा सदा के लिए
तुम्हारे ह्रदय की स्नेहिल लहरों में.
लहरों के कामना दीप
लहरों के कामना दीप ० अशोक लव
लहरों को सौंप दिया है कामना-दीप
जहाँ चाहे ले जाएँ
उन्ही पर आश्रित हैं अब तो
कामना दीप का अस्तित्व.
हथेलियों में रख कर सौंपा था
लहरों को कामना दीप
बहाकर ले जाने के लिए अपने संग
मंद मंद हिचकोले खाता
बढ़ता जाता है लहरों के संग.
कामना- दीप का भविष्य होता है
लहरों के हाथ
ज़रा सा प्रवाह तेज़ होते ही
डोलने लगता है
और अंततः समां जाता है लहरों में.
कामना-दीप सा समा जाना चाहता हूँ
सदा सदा के लिए
तुम्हारे ह्रदय की स्नेहिल लहरों में.
लहरों के कामना दीप
Wednesday, 7 August 2013
कविता / लड़कियाँ होती हैं लड़कियाँ
पींगों पर झूलती
झुलाती लड़कियाँ
पांवों में घुँघरू बजाती
छनछनाती लड़कियाँ
गीतों को स्वर देती
गुनगुनाती लड़कियाँ
घर-आँगन बुहारती
संवारती लड़कियाँ .
मर्यादाओं की परिभाषा
होती हैं लड़कियाँ
संस्कारों को जीती
जगाती हैं लड़कियाँ
पैरों में आसमान
झुकाती हैं लड़कियाँ.
झुलाती लड़कियाँ
पांवों में घुँघरू बजाती
छनछनाती लड़कियाँ
गीतों को स्वर देती
गुनगुनाती लड़कियाँ
घर-आँगन बुहारती
संवारती लड़कियाँ .
मर्यादाओं की परिभाषा
होती हैं लड़कियाँ
संस्कारों को जीती
जगाती हैं लड़कियाँ
पैरों में आसमान
झुकाती हैं लड़कियाँ.
*' द्वारका परिचय' में पाँच अगस्त और ' प्रवासी दुनिया' में छः अगस्त 2013 को प्रकाशित
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