Friday 29 January 2010

कोई नहीं है आसपास / अशोक लव

कोई नहीं है आसपास
फिर भी हवाओं में है
किसी की सुगंध
महका रही है भीतर तक
कर रही है उल्लसित।

वृक्षों के पत्तों में प्रकम्पित
चूड़ियों की खनखनाहट
आकाश में टंगा सूर्य
माथे की बिंदी - सा
मक रहा है।

जनवरी की कोसी-कोसी धूप
किसी की निकटता -सी
लग रही है सुखद ।

दूरियों की दीवार के पार
है कोई
और यहाँ हैं -
नदी से नहाकर निकली
हवाओं का गीलापन लिए
निकटता के क्षणों के अहसास।

किसी के संग न होने पर भी
आ रही है
हवा के प्रत्येक झोंके के साथ
सुपरिचित महक ।
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* पुस्तक _ लड़कियां छूना चाहती है आसमान ( प्रेम खंड )
प्रतिक्रियाएँ
Vikram DuttVikram Dutt bahut khub sir ji.....

Jenny Shabnam
Jenny Shabnam
ashok ji,
dubara padhi, utni hin achchhi lagi, bahut bahut badhai aur shubhkamnayen.



Neeraj Sharmaa
Neeraj Sharmaa
Sundar..................♥



Shreesh Chandra
Shreesh Chandra
बेहतरीन लाजवाब


Vijay Datta Raheja
Vijay Datta Raheja
I loved it such beautiful words................loved it !!



Sarojini Sahoo
Abha KhetarpalAbha Khetarpal
बेहद खूबसूरत

Sudhir Mehta
Wah Ashok ji ...

Kshama Bali
Kshama Bali beautiful...........enjoyed

Vinay Mehta
Vinay Mehta
bahut khoob, Sir!!

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