Monday 19 March 2012

निर्लिप्त मन / अशोक लव

निर्लिप्त मन / अशोक लव  
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इंद्रधनुषी रंगों की छटाएँ
मरुथली तपन 
कंपकंपाती शीतल हवाएँ
आड़ी-तिरछी रेखाओं-सी 
पगडंडियाँ 
गिरते -उठते उठकर बढ़ते
निरंतर प्रवाहमयी नदी को भीतर जीते 
जीवन को गतिशील रखे 
पथ पर अग्रसर  
निर्लिप्त मन 
कहता निरंतर 
बढ़ चल बढ़ चल !


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