Friday, 16 September 2011

किसी क़ी मौत का यह अफसाना देखिए,
जो जनाज़े में गए पोस्टर छपवा दिए!

Tuesday, 13 September 2011

Videos - Navy Veterans

Videos - Navy Veterans

क्षमा -दिवस पर क्षमा -याचना !

क्षमा -वाणी-दिवस के अवसर पर उन सबसे क्षमा -याचना जिन्हें किसी भी रूप में ठेस  पहुँचाई हो . हमारे आचरण या व्यवहार से जिन्हें कष्ट पहुँचा हो उनसे भी क्षमा प्रार्थना !

Monday, 12 September 2011

Pratibhashalee Mohyal Vidyarthee Samman on 9th October 2011

Dear Brother/ Sister
It is my pleasure to inform you that your son / daughter will be honored with Pratibhashalee Mohyal Vidyarthee Samman on Sunday,9th October 2011 at Mohyal Foundation , A-9,Qutab Institutional Area, Jeet Singh Marg, New Delhi-110067 at 10:30 am.
Please confirm by phone / E-mail /post your participation.
With regards

Ashok Lav
Convenor
Pratibhashalee Mohyal Vidyarthee Samman

General Mohyal Sabha
Phone:011-265604565
Telefax:26561504,32585750
E-mail:gmsoffice2003@gmail.com,gmsoffice2003@yahoo.co.in
Website:www.mohyal.com
www.mohyalonline.com




Friday, 9 September 2011

Wednesday, 7 September 2011

Monday, 5 September 2011

 शिक्षक - दिवस  पर अपने समस्त विद्यार्थियों को आशीर्वाद. आप सब जहाँ हैं सदा प्रसन्न रहें.अपने कार्यों
  से अपना ,परिवार का और देश का नाम रोशन करें. Thanks dear students,always miss you !












महान शिक्षकों को नमन / अशोक लव

शिक्षक और गुरु में बहुत अंतर है. शिक्षण को व्यवसाय के रूप में अपनाने वाले शिक्षक हो सकते हैं, गुरु नहीं. गुरु अपने लिए नहीं अपने शिष्यों के लिए जीते हैं . अपने अर्जित समस्त ज्ञान को शिष्यों को अर्पित कर देते हैं.
गुरु कुम्हार शिष्य कुभ्भ है गढ़ि गढ़ि काढ़े खोट । अन्तर  हाथ  सहाय  दे बाहर  बाहै  चोट ॥
शिक्षक अपने  भीतर के प्रकाश से शिष्यों के अंधकारमय जीवन को प्रकाशमय  कर देते हैं.  उन्हें ज्ञानवान बनाते हैं. इसलिए गुरुजन  के लिए कहा गया है--  गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।गुरुः साक्षात्‌ परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥
ब्रह्मा,विष्णु और महेश बनना असंभव है. यह गुरु को सम्मान देने का भाव है. वर्तमान में श्रेष्ठ शिक्षक होना ही बहुत बड़ी बात है.
ऐसे महान शिक्षकों को नमन जिन्होंने शिक्षक के पद को गुरु के रूप में बदल दिया. अपना समस्त जीवन विद्यार्थियों को समर्पित कर दिया.

Thursday, 1 September 2011

Tuesday, 30 August 2011

Tuesday, 23 August 2011

नया सूर्योदय : अन्ना हजारे / -अशोक लव

अन्ना हजारे ने आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी व्यवस्था  को हिला कर रख दिया है. भ्रष्ट राजनेता तिलमिला रहे हैं. संसद में पहुँच जाने के पश्चात् वे शासक के रूप में व्यवहार करने लगते हैं. सत्तारूढ़ दल के विषय में तो कहना ही क्या है ! मंत्री बन जाने के बाद तो अधिकांश रावण के समान अहंकार में चूर हो जाते हैं. गत कुछ महीनों के घटनाक्रम को देखें तो इन सब के चेहरे आम आदमी के सामने बेनकाब हो गए हैं. सत्तारूढ़ दल के प्रवक्ताओं और मंत्रियों को खिसियाते, बौखलाते , झुंझलाते, धमकाते और रावण बनते सबने देखा है.
सबसे नीचे के स्तर से लेकर उच्चतम स्तर तक हुए घोटाले जग ज़ाहिर हो चुके हैं. प्रधान मंत्री समस्त मंत्रियों के कार्य कलापों का उत्तरदायी होता है. मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल ने जो लूट-खसोट मचाई है उसकी बखिया नियंत्रक-महालेखापरीक्षक ने उधेड़ कर रख दी हैं. दिल्ली क़ी मुख्य - मंत्री के बारे में जेल में बंद कांग्रेसी सांसद सुरेश कलमाडी ने पहले ही कहा था कि वह भी लूट-खसोट में शामिल  है. लोग जानते हैं कि भिन्न - भिन्न रूपों में लूटा धन अंत में कहाँ पहुंचता है. सत्ता के केंद्र में जो व्यक्ति है जब वह और उसका परिवार अरबों रूपये लूट रहा है तो भ्रष्ट व्यक्तियों के विरुद्ध कार्यवाही  कौन करेगा ? दिखाने  के लिए बलि  का बकरा / बकरी बनाकर कुछ लोगों को जेल में भेजकर सत्ताधीश चैन क़ी बांसुरी बजा रहे थे. आलोचना करने वालों को इसके प्रवक्ता पागल कुत्ते क़ी तरह काट खाने के लिए टूट पड़ते थे. चोरी और सीना जोरी क़ी अदभुत मिसाल !
अचानक दृश्य परिवर्तित हुआ. नया सूर्योदय अन्ना हजारे के रूप में उदित हुआ. सत्तारूढ़ दल के नेता अहंकार के मद में चूर थे. इस सूर्य के सामर्थ्य को भांप नहीं पाए. आज सड़कों पर लाखों भारतीय क्यों उमड़ पड़े हैं ? क्या अन्ना के पास कोई जादू क़ी छड़ी है ? अन्ना तो एक बहाना हैं, लोग भ्रष्ट व्यवस्था से त्रस्त हैं . अन्ना के माध्यम से उन्हें अपनी बात कहने का अवसर मिला. अन्ना ने उनकी भावनाओं को अभिव्यक्ति का स्वर दिया.
आज सड़कों पर उतरे लोगों के स्वर को संसद में बैठे कुछ लोगों के बहरे कान नहीं सुन पाए तो उन्हें पछताना पड़ेगा.
यह सिद्ध हो चुका है कि प्रधानमंत्री तक घोटालों में लिप्त है. लोकपाल क़ी आवश्कता क्यों है ? इसलिए कि उसे व्यवस्था के साथ जुड़े प्रत्येक व्यक्ति के विरुद्ध कार्यवाही करने का अधिकार हो. लोकपाल बिल क़ी आड़ में लचर बिल लाकर सत्तारूढ़  दल के खेल को अन्ना ने बेनकाब कर दिया है. कुछ मंत्रियों ने अन्ना के साथ लोकपाल बिल क़ी बैठकों के बहाने जो धोखेबाजी क़ी थी.  जनता में उनके इस व्यवहार के प्रति भी आक्रोश है.
चोर ऐसा कानून क्यों बनाएगा जिससे उसे जेल जाना पड़े ? सरकारी लोकपाल बिल इसका प्रमाण है.
कुशल राजनेता समय को पहचानते हैं. वे दूरदर्शी होते हैं. वर्तमान  में कुछ त्यागना पड़े तो त्याग देते हैं. सत्तारूढ़ दल में ऐसा  कोई दूरदर्शी नेता है ही नहीं क्योंकि सब के सब कठपुतली हैं. सबका रिमोट एक के ही हाथ में है. संकट क़ी स्थिति  में सब बगले क्यों झाँकने लगते हैं ? किसी में निर्णय लेने क़ी क्षमता ही नहीं है. जब सत्ता एक व्यक्ति के हाथों में सिमट जाती है , वह तानाशाह हो जाता है. शेष सब जी-हजूरिए और दरबारी बनकर रह जाते हैं. यह जी-हजूरिए और दरबारी देश को क्या दिशा  देंगे? अपने भ्रष्ट आचरणों को कानूनी रूप देने के लिए वैसा कानून बनाएँगे.
अन्ना क्या है ? जन-जन क़ी अभिव्यक्ति है.लाठी  और लंगोटी वाला एक गांधी हुआ था. आज अन्ना हमारे सामने हैं ! न कोई स्वार्थ , न धन संग्रह करने क़ी लालसा ! इसलिए जन-जन अन्ना कहला रहे हैं.

Friday, 12 August 2011

काहे न धीर धरे / अशोक लव

और अधिक , और अधिक पाने और संग्रहित करने की इच्छा की पूर्ति हेतु मनुष्य अनवरत भाग रहा है। प्रातः से सायं ही नहीं अपितु देर रात तक कोल्हू के बैल के समान कार्यरत रहने लगा है. उसे न अपनी चिंता है और न अपने घर - परिवार की चिंता है. चिंता है केवल अधिक से अधिक धन अर्जित करने की. प्रातः घर से निकले और लौटेंगे कब ,कोई पता नहीं !व्यापारी अपने व्यवसाय को और अधिक विस्तार देने में शेष सब कुछ भुला देते हैं। नौकरी करने वाले अधिक धन कमाने के लालच में नौकरी के समय के पश्चात् भी कार्य करने चले जाते हैं। भागते लोग, भागती भीड़ ...कहाँ जा रहे हैं , कुछ होश नहीं है। धन और धन , बस और धन --यही जीवन का लक्ष्य रह गया है।सब व्यस्त हैं , अस्त-व्यस्त हैं . यह व्यस्तता क्या है ? किसलिए है? क्यों है ? इसके विषय में सोचने का भी समय नहीं है।धन का महत्त्व है। इसे नकार नहीं सकते। जीवन-स्तर श्रेष्ठ बने, इसके लिए धन चाहिए।हर प्रकार की सुख-सुविधा उपलब्ध हो, हो जाए तो और उपलब्ध हो....इसलिए खूब भागो...जो आगे बढ़ गए है उन्हें पीछे छोड़ो --यह अंधी दौड़ सुख चैन छीन रही है। इस अंधी दौड़ में भागता मनुष्य कब युवावस्था और अधेड़ावस्था को पार कर जाता है, उसे पता ही नहीं चलता। और जब पता चलता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। तब इस अंधी दौड़ से अर्जित धन के भोग के लिए देह कमज़ोर चुकी होती है।कबीर ने बहुत अच्छा लिखा है--मन सागर , मनसा लहरी, बूड़े -बहे अनेक ।कहि कबीर ते बाचिहैं, जाके हृदय बिबेक। ।
मन रूपी सागर में इच्छा रूपी लहरें उठती रहती हैं. एक लहर किनारे तक आती है तो दूसरी उसके पीछे-पीछे आ जाती है. इसी प्रकार एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी सामने आ जाती है. मनुष्य उसे पूरा करने में संलिप्त हो जाता है. एक के पश्चात एक इच्छाएं  जन्म लेती  है और मनुष्य उन्हें पूरा करने में लग जाता है. इन इच्छाओं रूपी लहरों में अधिकतर लोग बह जाते है. अनेक डूब कर मर जाते हैं केवल वही इनमें डूबने से बचते हैं जिनमें ' विवेक' होता है.
वर्तमान समाज में अधिकांशतः लोगों की यही दशा है. वे जो है उसके महत्त्व को नहीं जानते और जो नहीं है उन भौतिक वस्तुओं को पाने और संग्रहित करने केलिए भाग रहे हैं.दिन-रात चिंतामग्न रहते हैं. चिता तनावों की जननी है. तनावग्रस्त होकर मनुष्य भांति-भांति के रोगों से पीड़ित हो जाता है. उसकी ' विवेक' शक्ति नष्ट हो जाती है. वह सम्मानपूर्वक जीने के अर्थ भूल जाता है. नैतिक और अनैतिक में भेद न करके जैसे संभव हो धन के अम्बार लगाने में जुटा रहता है. यही कारण है राजनेतागण , उच्च पदाधिकारी , उद्योगपति और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति घोटाले पर घोटाले करते हैं. समाचार-पत्र, टीवी उनके कारनामों के पृष्ठ पर पृष्ठ प्रकाशित करते हैं / दिखाते हैं. अनेक जेल-यात्रा करते हैं और बाहर आकर निर्लज्ज घूमते हैं.
ये लोग भूल जाते हैं कि समय बहुत तेज़ी  का साथ भागता है. वे धन के अम्बार जुटाते-जुटाते कब संसार से विदा ले लेते है, किसी को पता ही नहीं  चलता. उनकी स्मृति  एक भ्रष्ट व्यक्ति के रूप में सदा-सदा के लिए अंकित रह जाती है.
हम अनेक बार कहते हैं--लाल किला यहाँ,शाहजहाँ कहाँ ?
आज शाहजहाँ को कोई नहीं पहचानता. विश्व के  अनेक राष्ट्रपति मर गए, प्रधानमंत्री मर गए. लोगों को उनके नाम तक स्मरण  नहीं हैं. इन धन अर्जित करने की दौड़ में भागने वालों को उनके परिवार की तीसरी पीढी तक स्मरण नहीं करेगी.
थोड़ी देर के लिए रुकें. अपने विषय में सोचें.अपने उचित-अनुचित कार्यों का विश्लेषण करें. अपने जीवन के उद्देश्यों के विषय चिंतन करें सम्मानपूर्वक जीने के मार्ग निर्धारित करें . ' धैर्य ' को अपनाएँ. मन है तो विचलित भी होगा. उसे समझाएँ-- मन रे काहे न धीर धरे !

-- अशोक लव

Sunday, 7 August 2011

मित्रता -दिवस पर शुभकामनाएँ !

मैत्री - दिवस सबके मन में मैत्री की भावना जागृत करे , ' सर्वे भवन्तु सुखिनः ' की भावना के अनुरूप सबकी मंगल कामना करें. सब मित्रों को हार्दिक शुभकामनाएँ !

The Air Force School ,Subroto Park : Wonderful Stay

Mohyal Gotra Rishi

Farewell: Mrs Naresh Bala

Richa Mehta's visit to Rail Museum

Wednesday, 27 July 2011

विवाह : 25 जून 2011

From left : K Thizangule Ashihe,Ashok Dixit,Piyush Sen,Arpan Asawa, Ashok Lav,Anup S Sharma,Vinay Vishwakarma,Manish Kumar,Vinay Saxena, Kailash Chand and Anupam Rao.
SK Westend,New Delhi

Thursday, 21 July 2011

गुप्तेश्वर मंदिर जेपोर : पारिवारिक और आध्यात्मिक यात्रा / अशोक लव

ओडिशा उड़ीसा का नया नाम है. पारिवारिक समारोह में सम्मिलित होने के लिए छः जुलाई 2011 को वायुयान से रायपुर और आगे की आठ घंटे की लम्बी यात्रा कार द्वारा  पूरी करके शाम लगभग सात बजे जयपोर पहुँचे. इस नगर का नाम राजस्थान के जयपुर के नाम से मिलता है. केवल इंग्लिश में Jaypore लिखते हैं . बोलते सब जयपुर ही हैं.छत्तीसगढ़ का लम्बा रास्ता तय करना पड़ा. धमतरी और जगदलपुर नगर  बीच में आए. 'माकड़ी' शहर के पंजाबी ढाबे पर लंच किया था. 
सात जुलाई को समारोह था. 
आठ जुलाई को प्रातः  जयपोर से गुप्तेश्वर  मंदिर के लिए चले थे. जयपोर शहर कोरापुट जिले में आता है. कोरापुट में ही भगवन शिव का यह प्रसिद्ध ऐतिहासिक मंदिर है. गुफा में स्थित लिंग है. इसके दर्शन करके हुई अनुभूति को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता .
गुफा के अन्दर अँधेरा है. पुजारी ने दीपक जलाकर चट्टानों  पर स्वतः उभरी विभिन्न देवी - देवताओं की आकृतियाँ दिखाईं . गणेश जी , भगवान नरसिंह , माँ दुर्गा आदि की आकृतियाँ देखकर विस्मित होना ही पड़ता है. रोशनी होते ही गुफा में चमगादड़ उड़ने लगते थे. वहां अद्भुत आध्यात्मिक अनुभूति का अनुभव होता है. 
भगवान शिव के दर्शन करके सुखद अनुभव हुआ. दिल्ली में बैठकर ऐसी यात्रा के विषय में सोचा भी नहीं जा सकता. 
घने जंगलों के मध्य  स्थित यह मंदिर  अद्भुत है. दर्शनों के पश्चात् नीचे बहती सबरी नदी के प्रचंड बहाव वाले शीतल जल में पाँव रखते ही सारी थकान मिट जाती है. यह स्थान छत्तीसगढ़ , ओडिशा और आंध्र प्रदेश की सीमाओं को मिलाता है. वर्षा के कारण मटमैला जल अपनी अलग छटा लिए था. ऊपर स्वच्छ धुला नीला आकाश , किनारे पर हरियाली और नदी का चट्टानों से टकराता जल ! प्रकृति का अनुपम दृश्य ! कलाकार ने मानो पेंटिंग बना दी हो. कैमरे में सब दृश्यों को कैद करके संग ले आए. 
प्रातः उठकर श्रीमती सरोज जी ने  पकवान तैयार कर लिए थे. लौटते हुए रास्ते में चादरें बिछाकर पत्नी श्रीमती नरेश बाला और परिवार के अन्य सदस्यों --सुमीत ,पुनीत और मनीष के साथ भोजन का आनंद लिया. श्रीमती सरोज अच्छी मेज़बान हैं. कहने लगीं प्रातः चार बजे उठकर सब तैयारियां कर ली थीं. घने जंगलों में ऐसा स्वादिष्ट भोजन क्या आनंद देता है, इसकी कल्पना खाने वाले ही जानते हैं.
लौटते हुए सीधी चढ़ाई  थी. ड्राईवर नया था. बीच रास्ते कार रुक गई और सुमीत, पुनीत और मनीष पत्थर लगा-लगाकर कार  को ऊपर लाने  में ड्राईवर की सहायता करते रहे. हम अकेले लम्बी चढ़ाई चढ़कर ऊपर तक आए. वर्षों बाद ऐसा अनुभव हुआ. देहरादून से मसूरी की दो बार ट्रैकिंग किये वर्षों गुज़र गए थे.  वे दिन स्मरण हो आए. 
काजू के वृक्षों , खेतों की लम्बी कतारों ,सिर पर लकड़ियाँ उठाये   पैदल चलती  अधेड़ उड़िया महिलाओं  को लांघते हुए हम लौट रहे थे. 
अभी देश के विकास में वर्षों लगेंगे. राजनेताओं को इन क्षेत्रों की ओर झाँकने का अवकाश कहाँ है !
पर्यटन की दृष्टि से इस पूरे क्षेत्र को विकसित किया जा सकता है.




Wednesday, 20 July 2011

Friday, 20 May 2011

ज़िंदगी के सफ़र में.../ आनंद बख़्शी

ज़िंदगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मकाम
वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते

फूल खिलते हैं
लोग मिलते हैं
मगर पतझड़ में जो फूल मुरझा जाते हैं
वो बहारों के आने से खिलते नहीं
कुछ लोग जो सफ़र में बिछड़ जाते हैं
वो हज़ारों के आने से मिलते नहीं
उम्र भर चाहे कोई पुकारा करे उनका नाम
वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते

आँख धोखा है
क्या भरोसा है
सुनो दोस्तों शक़ दोस्ती का दुश्मन है
अपने दिल में इसे घर बनाने न दो
कल तड़पना पड़े याद में जिनकी
रोक लो रूठ कर उनको जाने न दो
बाद में प्यार के चाहे भेजो हज़ारों सलाम
वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते

सुबह आती है
शाम जाती है
यूँही वक़्त चलता ही रहता है रुकता नहीं
एक पल में ये आगे निकल जाता है
आदमी ठीक से देख पाता नहीं
और परदे पे मंज़र बदल जाता है
एक बार चले जाते हैं जो दिन-रात सुबह-ओ-शाम
वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते.
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जन्म: 21 जुलाई 1930
निधन: 30 मार्च 2002

मोसे नैना मिलाइके.....छाप तिलक / आनंद बख़्शी

लता: अपनी छब बनायके
जो मैं पी के पास गयी
आशा: अपनी छब बनायके
जो मैं पी के पास गयी
दोनों: जब छब देखी पीहू की
सो मैं अपनी भूल गयी

ओ, (छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलायके) -२
छाप तिलक

लता: सब छीनी रे मोसे नैना
नैना, मोसे नैना
नैना रे, मोसे नैना मिलायके
नैना मिलायके

दोनों: छाप तिलक सब छीनी रे मोसे

आशा: नैना, (नैना मिलायके) -२

दोनों: छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलायके

लता: ए री सखी
(मैं तोसे कहूँ) -२
हाय तोसे कहूँ
मैं जो गयी थी
(पनिया भरन को) -३
छीन झपट मोरी मटकी पटकी
छीन झपट मोरी झपट मोरी मटकी पटकी
नैना मिलायके

दोनों: छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलायके

आशा: (बल-बल जाऊँ मैं) -२
(तोरे रंग रजेवा) -२
(बल-बल जाऊँ मैं) -२
(तोरे रंग रजेवा) -३
(अपनी-सी) -३
रंग लीनी रे मोसे
नैना मिलायके

दोनों: छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलायके

आशा: ए री सखी
(मैं तोसे कहूँ) -२
हाय तोसे कहूँ

लता: (हरी हरी चूड़ियाँ) -२
(गोरी गोरी बहियाँ) -२
हरी हरी चूड़ियाँ
(गोरी गोरी बहियाँ) -३
(बहियाँ पकड़ हर लीनी) -२
रे मोसे नैना मिलायके

दोनों: छाप तिलक सब छीनी रे मोसे

आशा: नैना
(नैना मिलायके) -३

दोनों: छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलायके

तेरा वक़्त-ए-सफ़र याद आया / ग़ालिब

फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया
दिल जिगर तश्ना-ए-फ़रियाद आया

दम लिया था न क़यामत ने हनोज़
फिर तेरा वक़्त-ए-सफ़र याद आया

सादगी हाये तमन्ना यानी
फिर वो नैइरंग-ए-नज़र याद आया

उज़्र-ए-वामाँदगी अए हस्रत-ए-दिल
नाला करता था जिगर याद आया

ज़िन्दगी यूँ भी गुज़र ही जाती
क्यों तेरा राहगुज़र याद आया

क्या ही रिज़वान से लड़ाई होगी
घर तेरा ख़ुल्‌द में गर याद आया

आह वो जुर्रत-ए-फ़रियाद कहाँ
दिल से तंग आके जिगर याद आया

फिर तेरे कूचे को जाता है ख़्याल
दिल-ए-ग़ुमगश्ता मगर याद् आया

कोई वीरानी-सी-वीराँई है
दश्त को देख के घर याद आया

मैं ने मजनूँ पे लड़कपन में 'असद'
संग उठाया था के सर याद आया

--ग़ालिब