Tuesday 13 January 2009

कवि-सम्मेलन से नहीं साहित्यकार कृतियों से मूल्याँकन होता है
– अशोक लव
[कवि-कथाकार अशोक लव गत चालीस वर्षों से सक्रिय लेखन कर रहे हैं। उनकी आरंभिक शिक्षा हरियाणा के कैंथल नगर मे हुई। वे हिंदू हाई स्कूल के छात्र थे। इसके पश्चात कुछ वर्ष बिहार में रहे। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से बी.ए. और बी.एड. की उपाधियाँ ग्रहण की। उन्होंने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। नेशनल म्यूजि़यम नई दिल्ली से आर्ट एप्रीशीएशन किया। वे विद्यावाचस्पति और विद्यासागर आदि अनेक उपाधियों से अलंकृत हैं- शिखरों से आगे (उपन्यास), सलाम दिल्ली, बंद दरवाजों पर दस्तकें (लघुकथा संग्रह), पत्थरों से बंधे पंख (कहानी संग्रह), अनुभूतियों की आहटें, टूटते चक्रव्यूह (कविता संग्रह), हिंदी के प्रतिनिधि साहित्यकारों के साक्षात्कार, छूना है आसमान (कविता संग्रह, प्रकाशनाधीन), युग नायक महापुरूष, युग प्रवर्तक महापुरूष, प्रेमचंद की लोकप्रिय कहानियाँ, प्रेमचंद की सर्वोत्तम कहानियाँ, चाणक्य नीति, महक, फुलवारी मधु पराग, कदम-कदम आदि। उनकी शैक्षिक पुस्तकें देशभर के विद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल कदम-कदम आदि। उनकी शैक्षिक पुस्तकें देशभर के विद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल हैं। उन्हें हरियाणा प्रादेशिक हिंदी साहित्य सम्मेलन सिरसा द्वारा ‘श्रीमती निर्मला देवी भारद्वाज स्मृति सम्मान’ से सम्मानित किए जाने के अवसर पर लघुकथाकार सत्यप्रकाश भारद्वाज द्वारा उनसे लिया गया साक्षात्कार प्रस्तुत है - संपादक ]
*आपकी पहली रचना कब प्रकाशित हुई ?
सन् 1962-63 में बाल एकांकी के रूप में पटना के महाराष्ट्र मे प्रकाशित हुई थी और दूसरी रचना सन् 1964 मे दिल्ली के समाचार-पत्र ‘वीर अर्जुन’ में प्रकाशित हुई थी। तब से लेखन जारी है।
*आपने प्रायः सभी विद्याओं में लेखन किया है। आपकी विद्या प्रिय कौन-सी है ?
मैंने अधिकांशतः कविताएँ और लघुकथाएँ लिखी हैं। कहानियाँ भी लिखी हैं और उपन्यास तो एक ही लिखा है। साहित्यकार जिस विद्या में लेखन करता है, तन्मय होकर करता है। यह कह पाना कठिन है कि मेरी प्रिय विधा कौन-सी है परन्तु लघुकथा विद्या की स्थापना को लेकर मैंने अनेक गोष्ठियाँ सम्मेलन कराने में सक्रिय योगदान दिया था इसलिए इससे लगाव स्वभाविक है। यही कारण है कि कुछ साहित्यकार मुझे केवल लघुकथाकार के रूप मे जानते हैं। मैं जिन विद्याओं में लिखता हूँ वे मेरी प्रिय विद्याएं हैं।
* आपने कवि सम्मेलनों में भी भाग लिया था। अब क्यों छोड़ दिया ?
कवि सम्मेलनी कवियों की मानसिकता देखकर वितृष्णा हो गई । मंचों पर बड़ी-बड़ी आदर्शों की रचनाएँ पढ़ने वाले कुछ कवि व्यावहारिक जीवन मे निकृष्टतम निकले । कुछ दुकानदारी मानसिकता के निकले। कवि-सम्मेलन जोड़-तोड़ के कवियों के योग्य ही रह गए हैं। बहुत कम कवि ही सम्मानपूर्वक जी रहे हैं। बड़े-बड़े दिग्गजों की मानसिकता देखकर इस ओर से ध्यान हटा ही लिया है। कवि-सम्मेलन वस्तुतः बाज़ारवाद मे बदल गए हैं। अंततः कवि-सम्मेलन से नहीं साहित्यकार कृतियों से मूल्यांकन होता है।
* वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों में साहित्य की क्या स्थिति है ?
एक शब्द में कहूँ तो –‘दयनीय’। बाजारवाद, उपभोक्तावाद, वैश्वीकरण जो-जो नाम ले लें, इन सबके प्रभाव ने आज साहित्य को एक कोने में सरका दिया है। साहित्य आत्मा से जुड़ा हुआ था। आज लोगों के पास आत्मा में झाँकने का समय कहाँ है। हर कोई भाग रहा है। छोटे-छोटे कस्बों-शहरों से लेकर महानगरों तक देश भाग रहा है, नए शिखरों को छूने में लगा है। कोई रूके तो साहित्य पढ़े। जो लिख रहे हैं, वही पढ़ रहे हैं। आम पाठक कहाँ है। लोग टीवी के साथ चिपकना पसंद करते हैं। युवा पीढ़ी की रूचियों की सूची में साहित्य नहीं आता ।
* साहित्य के साथ आपका जुड़ाव कैसा हुआ है ?
जीवन का अधिकांश भाग तो साहित्य को दे दिया है । साहित्य मेरे प्राणों में, मेरी आत्मा में बसा है। मुझे इतना मान-सम्मान साहित्य ने दिलाया है। साहित्य ने मेरे व्यक्तित्व का निर्माण किया है। मेरे जीवन-दर्शन को स्वरूप प्रदान किया है। मुझे मनन-चिंतन का बोध कराया है। कभी-कभी सोचना हूँ यदि साहित्य के साथ जुड़ाव न बना होता तो मैं न जाने कैसा व्यक्ति होता। वस्तुतःमैंने साहित्य से जीवन को सही ढंग से जीना सीखा है।
* आपके साहित्यिक जीवन में अविस्मरणीय क्षण कौन से हैं ?
मेरी पुस्तक ‘हिन्दी के प्रतिनिधि साहित्याकारों से साक्षात्कार’ का लोकार्पण व 9 फरवरी 1990 को उपराष्ट्रपति महोदय ने कार्यक्रम के लिए पचास मिनट का समय दिया था। जब कार्यक्रम चला तो 50 मिनट तक तो डॉ. शंकर दयाल शर्मा जी ही भाषण देते रहे थे। कार्यक्रम लगभग डेढ़-दो घंटे तक चला । उनके पीए उन्हें स्मरण दिलाते थे कि मिलने वाले प्रतीक्षा में हैं। तब उन्होंने कहा था, “आज इतने दिनों के पश्चात ऐसा लग रहा है परिवार में बैठकर बातचीत कर रहा हूँ । वह कार्यक्रम था भी ऐतिहासिक । उसमें डॉ. विजेंद्र स्नातक. श्री मन्मथनाथ गुप्त, पद्मश्री यशपाल जैन, पद्मश्री आचार्य, श्रेयचंद्र सुमन, पद्मश्री चिरंजीत, डॉ.नारायण दत्त पालीवाल डॉ. रणवीर रांग्रा, डॉ.गंगाप्रसाद विमल, श्री विनोद कुमार मिश्र (संपादक-दैनिक हिन्दुस्तान) आदि वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार तो उपस्थित थे ही इनके साथ डॉ. उपेंद्र रैणा, श्रवण राही, अशोक वर्मा, सुरेश गौतम, सुरेश यादव, आरिफ़ जमाल आदि युवा साहित्यकार भी थे। ऐसे क्षण जीवन में बार-बार नहीं आते ।
* युवा साहित्यकारों के लिए आपका क्या संदेश है ?
युवाओं के अनुभवों में अपने समय की गंध होती है। उनमें ताज़गी और उत्साह होता है। उन्हें अपने अनुभवों के आधार पर लिखना चाहिए। वरिष्ठ साहित्यकारों के संपर्क से सीखना चाहिए। श्रेष्ठ साहित्यिक कृतियों या निरंतर अध्ययन करना चाहिए। शनैःशनैः वे श्रेष्ठ लेखन की ओर अग्रसर होते चल जाएंगे। लेखन की श्रेष्ठता निरंतर लेखनरत रहने से आती है। इसे स्मरण रखना चाहिए।

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