Friday 11 September 2009

*लघुकथा " न सबूत न गवाह " / अशोक लव

एक ही बस्ती की पचासों लड़कियों के अपहरण , बलात्कार और उनकी हत्याओं ने समाचार-पत्र रंग दिए। दसियों लड़कियों के शव , वस्त्र और अवशेष मिले तो घर-घर में आंतक गया। क्या छोटे,क्या बड़े ,क्या अमीर.क्या गरीब, सब अपराधियों को बीच चौराहे फाँसी पर चढ़ा की बातें करने लगे। संसद में गरमागरम बहसें छिड़ गईं
पुलिस के उच्चाधिकारी और अपराधी सौदेबाज़ी कर रहे थे
डी सी पी ने कहा , ' सतविंदर , तू चिंता मत कर। त्र तो बाल भी बांका होगा। मैं तुम्हें साफ़ बच्चा ले जाऊँगा। कोर्ट सबूतों के आधार ही तो फ़ैसला करेगा। सबूत होंगे , गवाह। मुकद्दमा चलते-चलते दस साल लग जायेंगे लोगों को याद ही नहीं रहेगा। दस सालों में दुनिया बदल जाएगी हाँ बता, कितने खर्च करेगा ?'
सतविंदर ने चैन की साँस ली। जेल में वह पहली बार मुस्कराया फिर ज़ोर का ठहाका लगाया। खुशी में वह कुर्सी से उछल पड़ा डी सी पी की और हाथ बढ़ाया , ' यार डी सी पी तू अपने मुँह से कह दे। जितने करोड़ कहेगा उतने में सौदा पक्का। '
जेल की चारदीवारी के बाहर मृतक बालिकाओं के माता-पता और परिजनों का रुदन आसमान फाड़े जा रहा था।
चारदीवारी के भीतर सब निर्णय हो गए थे। *
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* पुस्तक - खिड़कियों पर टंगे लोग ( लघुकथा - संग्रह , संपादक- अशोक लव , वर्ष २००९ ) से
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