Thursday, 21 July 2011

गुप्तेश्वर मंदिर जेपोर : पारिवारिक और आध्यात्मिक यात्रा / अशोक लव

ओडिशा उड़ीसा का नया नाम है. पारिवारिक समारोह में सम्मिलित होने के लिए छः जुलाई 2011 को वायुयान से रायपुर और आगे की आठ घंटे की लम्बी यात्रा कार द्वारा  पूरी करके शाम लगभग सात बजे जयपोर पहुँचे. इस नगर का नाम राजस्थान के जयपुर के नाम से मिलता है. केवल इंग्लिश में Jaypore लिखते हैं . बोलते सब जयपुर ही हैं.छत्तीसगढ़ का लम्बा रास्ता तय करना पड़ा. धमतरी और जगदलपुर नगर  बीच में आए. 'माकड़ी' शहर के पंजाबी ढाबे पर लंच किया था. 
सात जुलाई को समारोह था. 
आठ जुलाई को प्रातः  जयपोर से गुप्तेश्वर  मंदिर के लिए चले थे. जयपोर शहर कोरापुट जिले में आता है. कोरापुट में ही भगवन शिव का यह प्रसिद्ध ऐतिहासिक मंदिर है. गुफा में स्थित लिंग है. इसके दर्शन करके हुई अनुभूति को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता .
गुफा के अन्दर अँधेरा है. पुजारी ने दीपक जलाकर चट्टानों  पर स्वतः उभरी विभिन्न देवी - देवताओं की आकृतियाँ दिखाईं . गणेश जी , भगवान नरसिंह , माँ दुर्गा आदि की आकृतियाँ देखकर विस्मित होना ही पड़ता है. रोशनी होते ही गुफा में चमगादड़ उड़ने लगते थे. वहां अद्भुत आध्यात्मिक अनुभूति का अनुभव होता है. 
भगवान शिव के दर्शन करके सुखद अनुभव हुआ. दिल्ली में बैठकर ऐसी यात्रा के विषय में सोचा भी नहीं जा सकता. 
घने जंगलों के मध्य  स्थित यह मंदिर  अद्भुत है. दर्शनों के पश्चात् नीचे बहती सबरी नदी के प्रचंड बहाव वाले शीतल जल में पाँव रखते ही सारी थकान मिट जाती है. यह स्थान छत्तीसगढ़ , ओडिशा और आंध्र प्रदेश की सीमाओं को मिलाता है. वर्षा के कारण मटमैला जल अपनी अलग छटा लिए था. ऊपर स्वच्छ धुला नीला आकाश , किनारे पर हरियाली और नदी का चट्टानों से टकराता जल ! प्रकृति का अनुपम दृश्य ! कलाकार ने मानो पेंटिंग बना दी हो. कैमरे में सब दृश्यों को कैद करके संग ले आए. 
प्रातः उठकर श्रीमती सरोज जी ने  पकवान तैयार कर लिए थे. लौटते हुए रास्ते में चादरें बिछाकर पत्नी श्रीमती नरेश बाला और परिवार के अन्य सदस्यों --सुमीत ,पुनीत और मनीष के साथ भोजन का आनंद लिया. श्रीमती सरोज अच्छी मेज़बान हैं. कहने लगीं प्रातः चार बजे उठकर सब तैयारियां कर ली थीं. घने जंगलों में ऐसा स्वादिष्ट भोजन क्या आनंद देता है, इसकी कल्पना खाने वाले ही जानते हैं.
लौटते हुए सीधी चढ़ाई  थी. ड्राईवर नया था. बीच रास्ते कार रुक गई और सुमीत, पुनीत और मनीष पत्थर लगा-लगाकर कार  को ऊपर लाने  में ड्राईवर की सहायता करते रहे. हम अकेले लम्बी चढ़ाई चढ़कर ऊपर तक आए. वर्षों बाद ऐसा अनुभव हुआ. देहरादून से मसूरी की दो बार ट्रैकिंग किये वर्षों गुज़र गए थे.  वे दिन स्मरण हो आए. 
काजू के वृक्षों , खेतों की लम्बी कतारों ,सिर पर लकड़ियाँ उठाये   पैदल चलती  अधेड़ उड़िया महिलाओं  को लांघते हुए हम लौट रहे थे. 
अभी देश के विकास में वर्षों लगेंगे. राजनेताओं को इन क्षेत्रों की ओर झाँकने का अवकाश कहाँ है !
पर्यटन की दृष्टि से इस पूरे क्षेत्र को विकसित किया जा सकता है.




Wednesday, 20 July 2011

Friday, 20 May 2011

ज़िंदगी के सफ़र में.../ आनंद बख़्शी

ज़िंदगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मकाम
वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते

फूल खिलते हैं
लोग मिलते हैं
मगर पतझड़ में जो फूल मुरझा जाते हैं
वो बहारों के आने से खिलते नहीं
कुछ लोग जो सफ़र में बिछड़ जाते हैं
वो हज़ारों के आने से मिलते नहीं
उम्र भर चाहे कोई पुकारा करे उनका नाम
वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते

आँख धोखा है
क्या भरोसा है
सुनो दोस्तों शक़ दोस्ती का दुश्मन है
अपने दिल में इसे घर बनाने न दो
कल तड़पना पड़े याद में जिनकी
रोक लो रूठ कर उनको जाने न दो
बाद में प्यार के चाहे भेजो हज़ारों सलाम
वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते

सुबह आती है
शाम जाती है
यूँही वक़्त चलता ही रहता है रुकता नहीं
एक पल में ये आगे निकल जाता है
आदमी ठीक से देख पाता नहीं
और परदे पे मंज़र बदल जाता है
एक बार चले जाते हैं जो दिन-रात सुबह-ओ-शाम
वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते.
''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''


जन्म: 21 जुलाई 1930
निधन: 30 मार्च 2002

मोसे नैना मिलाइके.....छाप तिलक / आनंद बख़्शी

लता: अपनी छब बनायके
जो मैं पी के पास गयी
आशा: अपनी छब बनायके
जो मैं पी के पास गयी
दोनों: जब छब देखी पीहू की
सो मैं अपनी भूल गयी

ओ, (छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलायके) -२
छाप तिलक

लता: सब छीनी रे मोसे नैना
नैना, मोसे नैना
नैना रे, मोसे नैना मिलायके
नैना मिलायके

दोनों: छाप तिलक सब छीनी रे मोसे

आशा: नैना, (नैना मिलायके) -२

दोनों: छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलायके

लता: ए री सखी
(मैं तोसे कहूँ) -२
हाय तोसे कहूँ
मैं जो गयी थी
(पनिया भरन को) -३
छीन झपट मोरी मटकी पटकी
छीन झपट मोरी झपट मोरी मटकी पटकी
नैना मिलायके

दोनों: छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलायके

आशा: (बल-बल जाऊँ मैं) -२
(तोरे रंग रजेवा) -२
(बल-बल जाऊँ मैं) -२
(तोरे रंग रजेवा) -३
(अपनी-सी) -३
रंग लीनी रे मोसे
नैना मिलायके

दोनों: छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलायके

आशा: ए री सखी
(मैं तोसे कहूँ) -२
हाय तोसे कहूँ

लता: (हरी हरी चूड़ियाँ) -२
(गोरी गोरी बहियाँ) -२
हरी हरी चूड़ियाँ
(गोरी गोरी बहियाँ) -३
(बहियाँ पकड़ हर लीनी) -२
रे मोसे नैना मिलायके

दोनों: छाप तिलक सब छीनी रे मोसे

आशा: नैना
(नैना मिलायके) -३

दोनों: छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलायके

तेरा वक़्त-ए-सफ़र याद आया / ग़ालिब

फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया
दिल जिगर तश्ना-ए-फ़रियाद आया

दम लिया था न क़यामत ने हनोज़
फिर तेरा वक़्त-ए-सफ़र याद आया

सादगी हाये तमन्ना यानी
फिर वो नैइरंग-ए-नज़र याद आया

उज़्र-ए-वामाँदगी अए हस्रत-ए-दिल
नाला करता था जिगर याद आया

ज़िन्दगी यूँ भी गुज़र ही जाती
क्यों तेरा राहगुज़र याद आया

क्या ही रिज़वान से लड़ाई होगी
घर तेरा ख़ुल्‌द में गर याद आया

आह वो जुर्रत-ए-फ़रियाद कहाँ
दिल से तंग आके जिगर याद आया

फिर तेरे कूचे को जाता है ख़्याल
दिल-ए-ग़ुमगश्ता मगर याद् आया

कोई वीरानी-सी-वीराँई है
दश्त को देख के घर याद आया

मैं ने मजनूँ पे लड़कपन में 'असद'
संग उठाया था के सर याद आया

--ग़ालिब

Wednesday, 27 April 2011

मैं ही हूँ और तुम भी / अशोक लव

स्वप्नों के संसार में तैरते हैं कितने-कितने भाव रंग-बिरंगे. 
इन्हीं में वे सब हैं 
जो बहुत निकट हैं मेरे मन के .

मैं ही हूँ 
सबके साथ किसी न किसी 
रूप में. 

मेरी इन आँखों में झांक कर देखो तो सही 
तुम भी हो इन आँखों में तैरते स्वप्नों में.

और पहचान सको तो पहचान लो 
मैं ही हूँ  यह
सूक्ष्मता से देखो तो सही
 और  तुम  भी  हो . 
--अशोक लव







Photo:Ashok Lav

Wednesday, 23 March 2011

Bhagat Singh's signatures

भगत सिंह के हस्ताक्षर

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा असेम्बली में बम फेंकने के बाद

असेंबली बमकांड मामले की एफ़आईआर
(असेंबली बमकांड मामले की एफ़आईआर का हिंदी अनुवाद)
धमाके के बाद फेंका गया पर्चा

‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी’
सूचना
(आठ अप्रैल, 1929 को असेम्बली में बम फेंकने के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा बाँटे गए अंग्रेज़ी पर्चे का हिन्दी अनुवाद)
“बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊँची आवाज़ की आवश्यकता होती है", प्रसिद्ध फ्रांसीसी अराजकतावादी शहीद वैलियां के यह अमर शब्द हमारे काम के औचित्य के साक्षी हैं.
पिछले दस वर्षों में ब्रिटिश सरकार ने शासन-सुधार के नाम पर इस देश का जो अपमान किया है उसकी कहानी दोहराने की आवश्यकता नहीं है और न ही हिन्दुस्तानी पार्लियामेण्ट पुकारी जाने वाली इस सभा ने भारतीय राष्ट्र के सिर पर पत्थर फेंककर उसका जो अपमान किया है, उसके उदाहरणों को याद दिलाने की आवश्यकता है. यह सब सर्वविदित और स्पष्ट है. आज फिर जब लोग “साइमन कमीशन” से कुछ सुधारों के टुकड़ों की आशा में आँखें फैलाए हैं और कुछ इन टुकड़ों के लोभ में आपस में झगड़ रहे हैं, विदेशी सरकार “सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक” (पब्लिक सेफ़्टी बिल) और “औद्योगिक विवाद विधेयक”(ट्रेड्स डिस्प्यूट्स बिल) के रूप में अपने दमन को और भी कड़ा कर लेने का यत्न कर रही हैं. इसके साथ ही आने वाले अधिवेशन में “अखबारों द्वारा राजद्रोह रोकने का क़ानून” (प्रेस सैडिशन एक्ट) लागू करने की धमकी दी जा रही है। सार्वजनिक काम करने वाले मज़दूर नेताओं की अंधाधुंध गिरफ़्तारियाँ यह स्पष्ट कर देती हैं कि सरकार किस रवैए पर चल रही है.
राष्ट्रीय दमन और अपमान की इस उत्तेजनापूर्ण परिस्थिति में अपने उत्तरदायित्व की गंभीरता को महसूस कर “हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन” ने अपनी सेना को यह कदम उठाने की आज्ञा दी है. इस कार्य का प्रयोजन है कि क़ानून का यह अपमानजनक प्रहसन समाप्त कर दिया जाए. विदेशी शोषक नौकरशाही जो चाहे करें परन्तु उसकी वैधानिकता का नकाब फाड़ देना आवश्यक है.
जनता के प्रतिनिधियों से हमारा आग्रह है कि वे इस पार्लियामेण्ट के पाखंड को छोड़कर अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों को लौट जायें और जनता को विदेशी दमन और शोषण के विरुद्ध क्रांति के लिए तैयार करें. हम विदेशी सरकार को यह बता देना चाहते हैं कि हम “सार्वजनिक सुरक्षा” और “औद्योगिक विवाद” के दमनकारी कानूनों और लाला लाजपतराय की हत्या के विरोध में देश की जनता की ओर से यह कदम उठा रहे हैं.
हम हर मनुष्य के जीवन को पवित्र मानते हैं. हम ऐसे उज्जवल भविष्य में विश्वास रखते हैं जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण शांति और स्वतंत्रता का अवसर मिल सके. हम इन्सान का ख़ून बहाने की अपनी विवशता पर दुखी हैं। परन्तु क्रांति द्वारा सबको समान स्वतंत्रता देने और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त कर देने के लिए क्रांति में कुछ-न-कुछ रक्तपात अनिवार्य है.
इन्क़लाब जिन्दाबाद !
हस्ताक्षर–
बलराज
कमाण्डर-इन-चीफ
.......................................................................................................................
हस्ताक्षर भगत  सिंह 
.......................................................................................................................

Saturday, 12 March 2011

अपने लिए एक कविता /अशोक लव

चलो, एक कविता अपने लिए लिखें.

बहुत दिनों  से  अपने आप से बातचीत नहीं की
अपना हाल-चाल नहीं पूछा 
दूसरों की इच्छाएँ पूरी करते-करते 
अपना ही हाल पूछना याद नहीं रहा. 

लगता है सब ठीक ही है  
क्योंकि कुछ ख़ास नहीं है.
किसी ने हमसे हमारे विषय में नहीं पूछा 
सब व्यस्त हैं अपनी-अपनी दुनिया में मस्त हैं.

हम उनकी दुनिया में घूमते-घूमते 
अपनी ही गलियों के रास्ते भूल गए
चलें, आज अपने मन की गलियों में घूम लें. 
स्वयं से  स्वयं का हाल पूछ ले.
.....................................................
@ अशोक लव









Thursday, 10 March 2011

अंधा बहरा शहर / अशोक लव

शहर में शोर है
शहर में हंगामा है
शहर में भीड़ है
शहर में जुलूस निकलते हैं
जिंदाबाद ! जिंदाबाद ! मुर्दाबाद! मुर्दाबाद ! के नारे
गूँजते हैं शहर की हवा में |
बड़ी चहल-पहल रहती है शहर में
पर हत्यारे हैं कि इन सबके बीच से
चाक़ू घुमाते
गोलियां दनदनाते निकाल जाते हैं |
लाश किसकी गिरी है
बलात्कार किसका हुआ है
शहर की भीड़ को इसका पाता नहीं चलता
वह लाशों को कुचल कर आगे बढ़ जाती है
वह बलात्कार की त्रासदी भोगती नग्न देहों को
कुचलती
आगे बढ़ जाती हैं |
लोग सब कुछ देखते हैं
पर ऑंखें बंद कर लेते हैं
लोग सब कुछ सुनते हैं
पर कान बंद कर लेते हैं
शहर के न हाथ रहे हैं न पाँव
हत्यारों-बलात्कारियों को न रोक पाता है
न पकड़ पाता है शहर |
बहुत तेज़ भाग रहा है शहर
मर चुकी संवेदनाओं के साथ जी रहा है शहर |

गर्म मोम / अशोक लव

ठंडी जमी मोम सब सह जाती है
छोटी सी
पतली-सी सुई
उतर जाती है आर-पार
बिंध जाती है मोम

तपती है जब मोम
आग बन जाती है
चिपककर झुलसा देती है

समयानुसार
जीवन को मोम बनना पड़ता है.

पत्थरों से बंधे पंख /-अशोक लव

पत्थरों से बंधे जब पंख होते हैं 
ज़ख्म हर उड़ान के संग होते हैं.
--अशोक लव


Saturday, 5 March 2011

बदलते आँगन / अशोक लव

आँगन में जनमती हैं
पलती-बढती हैं
खिलखिलाती हैं
घर-द्वार महकाती हैं |

तितलियों-सी उड़ती हैं
प्रकृति की समस्त छटाएँ छितराती हैं
कोयल-सी कुहकती हैं
घर को स्वर्ग बनाती हैं |

माँ के चरण-चिह्नों  पर
पाँव  रखती हैं
आता  गूंथना सीखती हैं
चपातियों को गोल करना सीखती हैं
सब्जियों-मसालों में सम्बंध बनाना सीखती हैं |

पिता की आय का हिसाब रखने लगती हैं
माँ की थकान का हिसाब  रखने लगती हैं
घर के उत्तरदायित्व बांटने लगती हैं |

इतना सब जब सीख जाती हैं
सहसा चिड़िया-सी उड़ जाती हैं
अपना संसार बसाती हैं |
कहाँ जनमती हैं,
कहाँ पलती हैं,
कहाँ घर बसाती हैं!
ऐसी होती हैं बेटियाँ!

अशोक लव - Kavita Kosh

अशोक लव - Kavita Kosh

Friday, 25 February 2011

उन्हें फुर्सत न मिली !

हमने तो बहुत कुछ कहना चाहा 
उन्हें सुनने की फुर्सत न मिली !
--अशोक लव

Monday, 14 February 2011

वही रिश्ते हैं पनपते, जिनमें होता प्यार !

प्रेम-प्यार से चल रहा , है देखो  संसार l
वही  रिश्ते हैं पनपते, जिनमें होता प्यार ll
--अशोक लव
**A VERY HAPPY VALENTINE DAY !

Monday, 7 February 2011

हरियाणा की प्रतिनिधि लघुकथा ० संपादक : डॉ. रूप देवगुण

लघुकथा का विहंगम परिदृश्य 

डॉ.सुभाष रस्तोगी

यशस्वी साहित्यकार डॉ. रूप देवगुण की सद्य: प्रकाशित संपादित कृति हरियाणा की प्रतिनिधि लघुकथा में हरियाणा के 52 लघुकथाकारों की 126 लघु कथाएं संकलित हैं। यह जानकर हैरत होती है कि हरियाणा जैसे छोटे प्रदेश में 56 लघुकथाकार हैं और इस संपादित कृति में कई लघुकथाकार ऐसे भी हैं जिन्होंने समकालीन हिंदी लघुकथा परिदृश्य में बतौर लघुकथाकार और लघुकथा के चिंतक के रूप में अपनी स्वतंत्र पहचान भी स्थापित की है। डा. रूप देवगुण के इस चयन की एक विशेषता यह भी है कि उन्होंने संपादक के सही धर्म का निर्वाह किया है और साहित्यिक बाड़ेबंदी से बचते हुए केवल लघुकथाकारों के रचना कर्म को ही अधिमान दिया है।
यह सच है कि कोई भी कृति चाहे वह संपादित हो या मौलिक, संपादक अथवा रचनाकार के व्यक्तित्व का ही प्राय: प्रतिफलन हुआ करती है। यह काबिलेगौर है कि रूप देवगुण के व्यक्तित्व में जो सहजता और सरलता है, यह कृति अपने संपादकीय कलेवर में उसी सहजता और सरलता के कायांतरण के रूप में सामने आयी है।
रूप देवगुण द्वारा संपादित कृति ‘हरियाणा की प्रतिनिधि लघुकथा’ हरियाणा के लघुकथा लेखन की तो नुमाइंदगी करती ही है, समकालीन हिंदी लघुकथा के राष्ट्रीय परिदृश्य में हरियाणा के लघुकथाकारों के सार्थक हस्तक्षेप को भी रेखांकित करती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि हिंदी लघुकथा का जब भी कोई निरपेक्ष इतिहास लिखा जायेगा तो वह इस चयन में संकलित हरियाणा के लघुकथाकारों यथा विष्णु प्रभाकर, पूरन मुद्गल, सुगनचंद मुक्तेश, सुधा जैन, जितेन्द्र सूद, उर्मि कृष्ण, पृथ्वीराज अरोड़ा, सुखचैन सिंह भंडारी, रामकुमार आत्रेय, अशोक लव, अशोक भाटिया, रूप देवगुण, रामनिवास मानव, मधुकांत, डा. मुक्ता, कमलेश भारतीय, राजकुमार निजात, प्रेमसिंह बरनालवी, मधुदीप, हरनाम  शर्मा, प्रदीप शर्मा स्नेही, सुरेन्द्र ‘गुप्त’, रोहित यादव, सत्यवीर मानव, सुरेंद्र ‘अंशुल’, कमल कपूर, बीजेन्द्र जैमिनी, प्रद्युम्न भल्ला, अरुण कुमार, पवन चौधरी ‘मनमौजी’ तथा अंजु दुआ जैमिनी के अवदान को रेखांकित किये बिना आधा और अधूरा ही रहेगा।
इस कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा डा. रूप देवगुण का एक शोधपरक विवेचनात्मक आलेख ‘हिन्दी लघुकथा को हरियाणा का योगदान’ है जो निश्चय ही समकालीन हिंदी लघुकथा परिदृश्य में हरियाणा के योगदान को रेखांकित करने की दृष्टि से एक संदर्भ कोश की भूमिका निभाता प्रतीत होता है।  सोने पर सुहागा यह होता कि यदि इस लेख का समापन संपादक की कुछ निष्कर्षात्मक टिप्पणियों के साथ हुआ होता। समग्रत: डॉ. रूप देवगुण द्वारा संपादित कृति ‘हरियाणा की प्रतिनिधि लघुकथा’ का एक विहंगम परिदृश्य उपस्थित करती है।
० पुस्तक : हरियाणा की प्रतिनिधि लघुकथा ० संपादक : डॉ. रूप देवगुण ० प्रकाशक : सुकीर्ति प्रकाशन, डीसी निवास के सामने, करनाल रोड, कैथल ० पृष्ठ : 199 ०मूल्य : 250 रुपये
दैनिक ट्रिब्यून : 7.2.2011

Saturday, 29 January 2011

"देनदार कोई और है, भेजत है दिन रैन" ---रहीम

रहीम अकबर के नव रत्नों में से एक थेवे कृष्ण-भक्त थे और दानी थेइस दोहे से उनकी विनम्रता की झलक मिलती हैदान देकर अपने नाम की भूख रखने वालों को यह दोहा हमेशा याद रखना चाहिए । 
 देनदार कोई और है, भेजत है दिन रैन।
लोग भरम हम पर धरै, यातें नीचे नैन॥

 "देने वाला तो भगवान है ,वही दिन-रात भेज रहा है। लोग समझते हैं हम दे रहे हैं। इसलिए हमने लज्जावश अपनी आँखें नीची की हुई हैं।"-रहीम

Tuesday, 25 January 2011

गणतंत्र-दिवस 2011 पर शुभकामनाएँ ....तिरंगे की कहानी !

26 जनवरी भारत का गणतंत्र दिवस है. सन 1950 में इसी दिन देश के संविधान को लागू किया गया था. तब से आज तक इस दिन को देश गणतंत्र दिवस के तौर पर मनाता है.      
211 विद्वानों द्वारा 2 महीने   और 11 दिन में तैयार भारत के सँविधान को लागू किए जाने से पहले भी 26 जनवरी का बहुत महत्व था. 26 जनवरी एक विशेष दिन के रूप में चिह्नित किया गया था.
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1930 के लाहौर अधिवेशन में पहली बार तिरंगे झंडे को फहराया गया था परंतु साथ साथ ही एक और महत्वपूर्ण फैसला इस अधिवेशन के दौरान लिया गया. इस दिन सर्वसम्मति से यह फैसला लिया गया था कि प्रतिवर्ष 26 जनवरी का दिन “पूर्ण स्वराज दिवस” के रूप में मनाया जाएगा. इस दिन सभी स्वतंत्रता सैनानी पूर्ण स्वराज का प्रचार करेंगे. इस तरह 26 जनवरी अघोषित रूप से भारत का स्वतंत्रता दिवस बन गया था. 15 अगस्त 1947 में अंग्रेजों ने भारत की सत्ता की बागडोर जवाहरलाल नेहरू के हाथों में दे दी, लेकिन भारत का ब्रिटेन के साथ नाता या अंग्रेजों का अधिपत्य समाप्त नहीं हुआ. भारत अभी भी एक ब्रिटिश कॉलोनी की तरह था, जहाँ कि मुद्रा पर ज्योर्ज 6 की तस्वीरें थी.
आज़ादी मिलने के बाद तत्कालीन सरकार ने देश के सँविधान को फिर से परिभाषित करने की जरूरत महसूस की और सविँधान सभा का गठन किया जिसकी अध्यक्षता डॉ. भीमराव अम्बेडकर को मिली. 25 नवम्बर 1949 को देश के सँविधान को मंजूरी मिली. 24 जनवरी 1950 को सभी सांसदों और विधायकों ने इस पर हस्ताक्षर किए. और इसके दो दिन बाद यानी 26 जनवरी 1950 को सँविधान लागू कर दिया गया. गणतंत्र-दिवस 2011 पर शुभकामनाएँ !तिरंगे  की  कहानी 

Monday, 24 January 2011

महान संगीत सम्राट पंडित भीमसेन जोशी विनम्र श्रद्धांजलि ! --अशोक लव

महान संगीत सम्राट पंडित भीमसेन जोशी नहीं रहे. हमारी विनम्र श्रद्धांजलि !

Saturday, 22 January 2011

Refugees in the Valley -- 1

संपादकीय
------------
स्वागत -2011
*अशोक लव
ashok lav.jpgसन1891 से आरम्भ हुई जनरल मोहयाल सभा की यात्रा अनेक उपलब्धियों के संग वर्ष 2011 में प्रवेश कर चुकी है. आशामय ,उज्ज्वल और निरंतर गतिशील रहने वाले नए वर्ष के सूर्य का हम स्वागत करते हैं. नया वर्ष अपने संग नए स्वप्न लाता है, नई आशाएँ लाता है. नई उमंगें लाता है. हम गत वर्षों की यात्रा के विभिन्न पक्षों पर चिंतन करते हैं. मंथन करते हैं. इनके आधार पर नए वर्ष के लिए योजनाएँ-परियोजनाएँ  बनाते  हैं .
वर्ष 2011 में मोहयाल आश्रम वृन्दावन बनकर तैयार हो जाएगा. मोहयाल आश्रम हरिद्वार के पश्चात्  मोहयालों के लिए गर्व करने का एक और सुन्दर और एतिहासिक  भवन बन जाएगा. रायजादा बी डी बाली के कुशल और दूरदर्शी नेतृत्व में गत वर्षों में जो उपलब्धियाँ हुई हैं वे अद्वितीय हैं. सन 1978 में उन्होंने जनरल मोहयाल सभा के प्रेजिडेंट का पदभार संभाला था. तब से आज तक वे निरंतर किसी न किसी परियोजना को कार्यान्वित करते रहे हैं. अतीत पर दृष्टि डालें तो जी एम एस की आज तक की  तमाम उपलब्धियों का श्रेय उन्हीं को जाता है. इसी का परिणाम है कि वर्ष 2010 में हुए चुनावों में मोहयाल समाज ने उन्हें और उनकी टीम को अभूतपूर्व समर्थन देकर पुनः निर्वाचित किया है. मोहयाल सजग और सतर्क हैं. रायजादा बी डी बाली द्वारा किए कार्य सबके सामने हैं. मोहयाल किसी के बहकावे में नहीं आए और उन्होंने  रायजादा बी डी बाली को उत्तरदायित्व सौंप दिया.
देश के विभिन्न अंचलों में कार्य कर रही ' लोकल मोहयाल सभाएँ ' जी एम एस के साथ कदम-से कदम मिलकर चल रही हैं. जी  एम एस उनकी प्रत्येक परियोजनाओं में आर्थिक और अन्य सहयोग देकर उन्हें पूर्ण समर्थन दे रही है. विभिन्न सभाओं के बने भवन इसके प्रतीक हैं. नवीनतम उदाहरण  मोहयाल सभा होश्यारपुर का है. इस सभा का भवन निर्माणाधीन है. इसके पूर्ण होने में आर्थिक समस्या आ गई. उनके पदाधिकारियों ने जी एम एस से अनुरोध किया. रायजादा बी डी बाली ने तत्काल आर्थिक सहयोग की सहमति दे दी.
वास्तव में ये सारे भवन मोहयालों के लिए ही हैं. मोहयाल सभा यमुना नगर ने भी वर्तमान भवन के साथ के प्लाट को लेने का निर्णय लिया तो जी एम एस की ओर से स्वीकृति  दे दी गई.
मोहयाल भवन  (इन्द्रपुरी  ,नई दिल्ली ) पुनः सुव्यवस्थित ढंग से संचालित हो रहा है. इसे नया रूप देने के कार्य हो रहे हैं . मोहयाल आश्रम और मोहयाल सेवा सदन हरिद्वार मोहयालों के आकर्षण के केंद्र बने हुए हैं और सुचारू ढंग से संचालित हो रहे हैं. यहाँ जो मोहयाल एक बार ठहरता है इसी का हो जाता है. विश्व भर में इसकी प्रशंसा हो रही है. मोहयाल फ़ौंडेशन स्थित ' एम ई आर आई टी ' के माध्यम से आई टी क्षेत्र में शिक्षा प्रदान करने के कार्य चल रहे हैं.
मोहयालों में जी एम एस के प्रति जो विश्वास बना है उसके पीछे जी एम एस के पदाधिकारियों और मैनेजिंग  कमेटी के सदस्यों का निःस्वार्थ सेवा- भाव है. रायजादा बी डी बाली की समर्पण भाव से कार्य करने की शैली है. यही कारण है कि देहरादून और मेरठ में मोहयालों ने अपनी सम्पति जी एम एस को भेंट कर दी.
वर्ष 2010 में अनेक मोहयाल सभाओं ने ' मोहयाल -मिलन ' आयोजित किए. इनके माध्यम से स्थानीय मोहयाल आपस में मिले. अपनत्व की भावना पनपी. विचार-विमर्श हुए. नए कार्य करने की प्रेरणा मिली. दिसंबर में फरीदाबाद, देहरादून और करनाल में सफल आयोजन हुए. यह मिलन मोहयाल-संस्कृति को संरक्षित और गतिशील रखते हैं. फेसबुक और ऑरकुट आदि सोशल-साईट के माध्यमों से मोहयाल आपस में संवाद करते है. ये  माध्यम हमरी संस्कृति को जीवंत रख रहे हैं.
जी एम एस द्वारा 14 नवम्बर को ' प्रतिभाशाली मोहयाल विद्यार्थी सम्मान समारोह ' आयोजित किया गया. युवा और किशोर पीढ़ी में मोहयाली भावना जागृत करने में यह समारोह अहम भूमिका निभा रहा है.
वर्ष 2011 में जी एम एस मोहयालों में रिश्ते- नाते कराने के लिए ' मैट्रिमोनियल -मेला ' आयोजित  करने जा रहा है. वार्षिक महाधिवेशन और कांफ्रेंस के  साथ यूथ कैम्प का आयोजन भी 2011 में किया जाएगा.
' जी एम एस ' संस्था आप सबके सहयोग से इन सब कार्यों को संचालित कर रही है. ये कार्य प्रत्येक मोहयाल को गौरवान्वित कर रहे हैं. वर्ष - 2011 में भी आप सबका सहयोग
जी एम एस को  मिलता रहेगा और रायजादा बी डी बाली की टीम आप सबके लिए इसी प्रकार सेवा-भाव से कार्यरत रहेगी.
आइए इस नए वर्ष में हम सब मोहयाल ध्वज को और बुलंदियों पर फहराने का संकल्प लें . आप सब सपरिवार सानंद रहें . यह वर्ष आप सबके लिए सुख-समृद्धि  भरा हो.
जय मोहयाल !
.............................
मोहयाल मित्र ,जनवरी 2011


Tuesday, 21 December 2010

Tuesday, 14 December 2010

कोई नहीं है आसपास / अशोक लव

कोई नहीं है आसपास
फिर भी हवाओं में है
किसी की सुगंध
महका रही है भीतर तक
कर रही है उल्लसित।
वृक्षों के पत्तों में प्रकम्पित
चूड़ियों की खनखनाहट ,
आकाश में टंगा सूर्य-
माथे की बिंदी - सा
मक रहा है।
जनवरी की कोसी-कोसी धूप
किसी की निकटता -सी
लग रही है सुखद । 
दूरियों की दीवार के पार
है कोई
और यहाँ हैं -
नदी से नहाकर निकली
हवाओं का गीलापन लिए
निकटता के क्षणों के अहसास।
किसी के संग न होने पर भी
आ रही है
हवा के प्रत्येक झोंके के साथ
सुपरिचित महक ।@अशोक लव 

Thursday, 25 November 2010

सबका धन्यवाद (Thanksgiving Day :25th November )

 इस देह को जन्म देने वाले अब मेरे संग नहीं हैं सर्वप्रथम उनका धन्यवाद !शब्दों से क्या उनका धन्यवाद दिया जा सकता है ? पर भीगा मन कहता है सर्वप्रथम उन्हें धन्यवाद दूँ.
जीवन-यात्रा के मध्य इसे बहुतों  ने सजाया- संवारा. उन सबका धन्यवाद.
जो अपने नहीं थे उन्होंने भी अपनत्व से जीवन के बहुत दिनों को सुखमय बनाया. कुछ वर्षों से साथ हैं, कुछ ,कुछ पल साथ रहे. कुछ अधिक समय साथ रहे और अब न जाने कहाँ कैसी स्थिति में हैं. उन सबका धन्यवाद !
कुछ  स्वार्थवश संग रहे और स्वार्थ पूरे कर चले गए. उनका भी धन्यवाद. उनसे भी बहुत कुछ सीखने को मिला. 
कुछ अपनों का मुखौटा ओढ़कर संग रहे और छल करके चले गए. उनका भी धन्यवाद. 
कुछ अब भी मुखौटा ओढ़े संग  हैं . उनका भी धन्यवाद !

Saturday, 13 November 2010

13 नवम्बर

कटते-कटते कट गए  देखो कितने साल ,
2010  तक भी वही है देखो  अपना हाल!
--अशोक लव 

Sunday, 7 November 2010

यादों का सिलसिला

वक्त अपनों को बहाकर कहाँ-कहाँ ले गया l
हाथों में सिर्फ यादों का सिलसिला  दे गया ll
*अशोक  लव 

Wednesday, 3 November 2010

' वुमेन ऑन टॉप ' पत्रिका के नवम्बर अंक में कविता 'आओ आगे बढें '

' वुमेन ऑन टॉप ' पत्रिका के नवम्बर अंक में कविता 'आओ आगे बढें '

Tuesday, 2 November 2010

9 फरवरी 1990 उपराष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा द्वारा ' हिन्दी के प्रतिनिधि साहित्यकारों से साक्षात्कार ' का लोकार्पण

9 फरवरी 1990 उपराष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा द्वारा अशोक  लव की पुस्तक  ' हिन्दी के प्रतिनिधि साहित्यकारों से साक्षात्कार ' का लोकार्पण हुआ