Saturday 7 November 2009

तुम हो बस तुम /अशोक लव

तुम हो
हाँ
तुम हो ,
इन
हवाओं में
जिसके
स्पर्श कराते हैं
तुम्हारे
अस्तित्व की अनुभूति
तुम हो
हाँ
तुम हो ,
झरनों के प्रवाहों में
जिनका
कल-कल संगीत
हृदय को स्वयं में डुबो लेता है।
तुम हो
हाँ तुम हो ,
आकाश छूने को लालायित
समुद्र
की लहरों में
मेरे
स्वप्नों की भांति।
तुम
हो
हाँ
तुम हो ,
नन्हें
शिशुओं की मुस्कानों में
जो
भर देती है हृदय में- ममत्व।
तुम
हो
हाँ
तुम हो ,
वहाँ
-वहाँ
जहाँ
-जहाँ तक जाती है दृष्टि
तुम
हो
हाँ
तुम हो ,
वहाँ
-वहाँ
जहाँ
-जहाँ तक नहीं जा पाता
मन,
दृष्टि
तुम
हो ,
बस
तुम्हीं हो
और
तुम ही हो
यहाँ
-वहाँ
वहाँ
-यहाँ
'''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
०७
नवम्बर २००९

No comments: