Wednesday, 23 March 2011
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा असेम्बली में बम फेंकने के बाद
(असेंबली बमकांड मामले की एफ़आईआर का हिंदी अनुवाद)
धमाके के बाद फेंका गया पर्चा
‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी’
सूचना
(आठ अप्रैल, 1929 को असेम्बली में बम फेंकने के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा बाँटे गए अंग्रेज़ी पर्चे का हिन्दी अनुवाद)
“बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊँची आवाज़ की आवश्यकता होती है", प्रसिद्ध फ्रांसीसी अराजकतावादी शहीद वैलियां के यह अमर शब्द हमारे काम के औचित्य के साक्षी हैं.
पिछले दस वर्षों में ब्रिटिश सरकार ने शासन-सुधार के नाम पर इस देश का जो अपमान किया है उसकी कहानी दोहराने की आवश्यकता नहीं है और न ही हिन्दुस्तानी पार्लियामेण्ट पुकारी जाने वाली इस सभा ने भारतीय राष्ट्र के सिर पर पत्थर फेंककर उसका जो अपमान किया है, उसके उदाहरणों को याद दिलाने की आवश्यकता है. यह सब सर्वविदित और स्पष्ट है. आज फिर जब लोग “साइमन कमीशन” से कुछ सुधारों के टुकड़ों की आशा में आँखें फैलाए हैं और कुछ इन टुकड़ों के लोभ में आपस में झगड़ रहे हैं, विदेशी सरकार “सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक” (पब्लिक सेफ़्टी बिल) और “औद्योगिक विवाद विधेयक”(ट्रेड्स डिस्प्यूट्स बिल) के रूप में अपने दमन को और भी कड़ा कर लेने का यत्न कर रही हैं. इसके साथ ही आने वाले अधिवेशन में “अखबारों द्वारा राजद्रोह रोकने का क़ानून” (प्रेस सैडिशन एक्ट) लागू करने की धमकी दी जा रही है। सार्वजनिक काम करने वाले मज़दूर नेताओं की अंधाधुंध गिरफ़्तारियाँ यह स्पष्ट कर देती हैं कि सरकार किस रवैए पर चल रही है.
राष्ट्रीय दमन और अपमान की इस उत्तेजनापूर्ण परिस्थिति में अपने उत्तरदायित्व की गंभीरता को महसूस कर “हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन” ने अपनी सेना को यह कदम उठाने की आज्ञा दी है. इस कार्य का प्रयोजन है कि क़ानून का यह अपमानजनक प्रहसन समाप्त कर दिया जाए. विदेशी शोषक नौकरशाही जो चाहे करें परन्तु उसकी वैधानिकता का नकाब फाड़ देना आवश्यक है.
जनता के प्रतिनिधियों से हमारा आग्रह है कि वे इस पार्लियामेण्ट के पाखंड को छोड़कर अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों को लौट जायें और जनता को विदेशी दमन और शोषण के विरुद्ध क्रांति के लिए तैयार करें. हम विदेशी सरकार को यह बता देना चाहते हैं कि हम “सार्वजनिक सुरक्षा” और “औद्योगिक विवाद” के दमनकारी कानूनों और लाला लाजपतराय की हत्या के विरोध में देश की जनता की ओर से यह कदम उठा रहे हैं.
हम हर मनुष्य के जीवन को पवित्र मानते हैं. हम ऐसे उज्जवल भविष्य में विश्वास रखते हैं जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण शांति और स्वतंत्रता का अवसर मिल सके. हम इन्सान का ख़ून बहाने की अपनी विवशता पर दुखी हैं। परन्तु क्रांति द्वारा सबको समान स्वतंत्रता देने और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त कर देने के लिए क्रांति में कुछ-न-कुछ रक्तपात अनिवार्य है.
इन्क़लाब जिन्दाबाद !
हस्ताक्षर–
बलराज
कमाण्डर-इन-चीफ
‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी’
सूचना
(आठ अप्रैल, 1929 को असेम्बली में बम फेंकने के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा बाँटे गए अंग्रेज़ी पर्चे का हिन्दी अनुवाद)
“बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊँची आवाज़ की आवश्यकता होती है", प्रसिद्ध फ्रांसीसी अराजकतावादी शहीद वैलियां के यह अमर शब्द हमारे काम के औचित्य के साक्षी हैं.
पिछले दस वर्षों में ब्रिटिश सरकार ने शासन-सुधार के नाम पर इस देश का जो अपमान किया है उसकी कहानी दोहराने की आवश्यकता नहीं है और न ही हिन्दुस्तानी पार्लियामेण्ट पुकारी जाने वाली इस सभा ने भारतीय राष्ट्र के सिर पर पत्थर फेंककर उसका जो अपमान किया है, उसके उदाहरणों को याद दिलाने की आवश्यकता है. यह सब सर्वविदित और स्पष्ट है. आज फिर जब लोग “साइमन कमीशन” से कुछ सुधारों के टुकड़ों की आशा में आँखें फैलाए हैं और कुछ इन टुकड़ों के लोभ में आपस में झगड़ रहे हैं, विदेशी सरकार “सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक” (पब्लिक सेफ़्टी बिल) और “औद्योगिक विवाद विधेयक”(ट्रेड्स डिस्प्यूट्स बिल) के रूप में अपने दमन को और भी कड़ा कर लेने का यत्न कर रही हैं. इसके साथ ही आने वाले अधिवेशन में “अखबारों द्वारा राजद्रोह रोकने का क़ानून” (प्रेस सैडिशन एक्ट) लागू करने की धमकी दी जा रही है। सार्वजनिक काम करने वाले मज़दूर नेताओं की अंधाधुंध गिरफ़्तारियाँ यह स्पष्ट कर देती हैं कि सरकार किस रवैए पर चल रही है.
राष्ट्रीय दमन और अपमान की इस उत्तेजनापूर्ण परिस्थिति में अपने उत्तरदायित्व की गंभीरता को महसूस कर “हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन” ने अपनी सेना को यह कदम उठाने की आज्ञा दी है. इस कार्य का प्रयोजन है कि क़ानून का यह अपमानजनक प्रहसन समाप्त कर दिया जाए. विदेशी शोषक नौकरशाही जो चाहे करें परन्तु उसकी वैधानिकता का नकाब फाड़ देना आवश्यक है.
जनता के प्रतिनिधियों से हमारा आग्रह है कि वे इस पार्लियामेण्ट के पाखंड को छोड़कर अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों को लौट जायें और जनता को विदेशी दमन और शोषण के विरुद्ध क्रांति के लिए तैयार करें. हम विदेशी सरकार को यह बता देना चाहते हैं कि हम “सार्वजनिक सुरक्षा” और “औद्योगिक विवाद” के दमनकारी कानूनों और लाला लाजपतराय की हत्या के विरोध में देश की जनता की ओर से यह कदम उठा रहे हैं.
हम हर मनुष्य के जीवन को पवित्र मानते हैं. हम ऐसे उज्जवल भविष्य में विश्वास रखते हैं जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण शांति और स्वतंत्रता का अवसर मिल सके. हम इन्सान का ख़ून बहाने की अपनी विवशता पर दुखी हैं। परन्तु क्रांति द्वारा सबको समान स्वतंत्रता देने और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त कर देने के लिए क्रांति में कुछ-न-कुछ रक्तपात अनिवार्य है.
इन्क़लाब जिन्दाबाद !
हस्ताक्षर–
बलराज
कमाण्डर-इन-चीफ
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हस्ताक्षर भगत सिंह
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Saturday, 12 March 2011
अपने लिए एक कविता /अशोक लव
चलो, एक कविता अपने लिए लिखें.
बहुत दिनों से अपने आप से बातचीत नहीं की
अपना हाल-चाल नहीं पूछा
दूसरों की इच्छाएँ पूरी करते-करते
अपना ही हाल पूछना याद नहीं रहा.
लगता है सब ठीक ही है
क्योंकि कुछ ख़ास नहीं है.
किसी ने हमसे हमारे विषय में नहीं पूछा
सब व्यस्त हैं अपनी-अपनी दुनिया में मस्त हैं.
हम उनकी दुनिया में घूमते-घूमते
अपनी ही गलियों के रास्ते भूल गए
चलें, आज अपने मन की गलियों में घूम लें.
स्वयं से स्वयं का हाल पूछ ले.
.....................................................
@ अशोक लव
Thursday, 10 March 2011
अंधा बहरा शहर / अशोक लव
शहर में शोर है
शहर में हंगामा है
शहर में भीड़ है
शहर में जुलूस निकलते हैं
जिंदाबाद ! जिंदाबाद ! मुर्दाबाद! मुर्दाबाद ! के नारे
गूँजते हैं शहर की हवा में |
बड़ी चहल-पहल रहती है शहर में
पर हत्यारे हैं कि इन सबके बीच से
चाक़ू घुमाते
गोलियां दनदनाते निकाल जाते हैं |
लाश किसकी गिरी है
बलात्कार किसका हुआ है
शहर की भीड़ को इसका पाता नहीं चलता
वह लाशों को कुचल कर आगे बढ़ जाती है
वह बलात्कार की त्रासदी भोगती नग्न देहों को
कुचलती
आगे बढ़ जाती हैं |
लोग सब कुछ देखते हैं
पर ऑंखें बंद कर लेते हैं
लोग सब कुछ सुनते हैं
पर कान बंद कर लेते हैं
शहर के न हाथ रहे हैं न पाँव
हत्यारों-बलात्कारियों को न रोक पाता है
न पकड़ पाता है शहर |
बहुत तेज़ भाग रहा है शहर
मर चुकी संवेदनाओं के साथ जी रहा है शहर |
शहर में हंगामा है
शहर में भीड़ है
शहर में जुलूस निकलते हैं
जिंदाबाद ! जिंदाबाद ! मुर्दाबाद! मुर्दाबाद ! के नारे
गूँजते हैं शहर की हवा में |
बड़ी चहल-पहल रहती है शहर में
पर हत्यारे हैं कि इन सबके बीच से
चाक़ू घुमाते
गोलियां दनदनाते निकाल जाते हैं |
लाश किसकी गिरी है
बलात्कार किसका हुआ है
शहर की भीड़ को इसका पाता नहीं चलता
वह लाशों को कुचल कर आगे बढ़ जाती है
वह बलात्कार की त्रासदी भोगती नग्न देहों को
कुचलती
आगे बढ़ जाती हैं |
लोग सब कुछ देखते हैं
पर ऑंखें बंद कर लेते हैं
लोग सब कुछ सुनते हैं
पर कान बंद कर लेते हैं
शहर के न हाथ रहे हैं न पाँव
हत्यारों-बलात्कारियों को न रोक पाता है
न पकड़ पाता है शहर |
बहुत तेज़ भाग रहा है शहर
मर चुकी संवेदनाओं के साथ जी रहा है शहर |
गर्म मोम / अशोक लव
ठंडी जमी मोम सब सह जाती है
छोटी सी
पतली-सी सुई
उतर जाती है आर-पार
बिंध जाती है मोम
तपती है जब मोम
आग बन जाती है
चिपककर झुलसा देती है
समयानुसार
जीवन को मोम बनना पड़ता है.
छोटी सी
पतली-सी सुई
उतर जाती है आर-पार
बिंध जाती है मोम
तपती है जब मोम
आग बन जाती है
चिपककर झुलसा देती है
समयानुसार
जीवन को मोम बनना पड़ता है.
पत्थरों से बंधे पंख /-अशोक लव
पत्थरों से बंधे जब पंख होते हैं
ज़ख्म हर उड़ान के संग होते हैं.
--अशोक लव
Saturday, 5 March 2011
बदलते आँगन / अशोक लव
आँगन में जनमती हैं
पलती-बढती हैं
खिलखिलाती हैं
घर-द्वार महकाती हैं |
तितलियों-सी उड़ती हैं
प्रकृति की समस्त छटाएँ छितराती हैं
कोयल-सी कुहकती हैं
घर को स्वर्ग बनाती हैं |
आता गूंथना सीखती हैं
चपातियों को गोल करना सीखती हैं
सब्जियों-मसालों में सम्बंध बनाना सीखती हैं |
पिता की आय का हिसाब रखने लगती हैं
माँ की थकान का हिसाब रखने लगती हैं
घर के उत्तरदायित्व बांटने लगती हैं |
इतना सब जब सीख जाती हैं
सहसा चिड़िया-सी उड़ जाती हैं
अपना संसार बसाती हैं |
कहाँ जनमती हैं,
कहाँ पलती हैं,
कहाँ घर बसाती हैं!
ऐसी होती हैं बेटियाँ!
पलती-बढती हैं
खिलखिलाती हैं
घर-द्वार महकाती हैं |
तितलियों-सी उड़ती हैं
प्रकृति की समस्त छटाएँ छितराती हैं
कोयल-सी कुहकती हैं
घर को स्वर्ग बनाती हैं |
माँ के चरण-चिह्नों पर
पाँव रखती हैं आता गूंथना सीखती हैं
चपातियों को गोल करना सीखती हैं
सब्जियों-मसालों में सम्बंध बनाना सीखती हैं |
पिता की आय का हिसाब रखने लगती हैं
माँ की थकान का हिसाब रखने लगती हैं
घर के उत्तरदायित्व बांटने लगती हैं |
इतना सब जब सीख जाती हैं
सहसा चिड़िया-सी उड़ जाती हैं
अपना संसार बसाती हैं |
कहाँ जनमती हैं,
कहाँ पलती हैं,
कहाँ घर बसाती हैं!
ऐसी होती हैं बेटियाँ!
Friday, 25 February 2011
Monday, 14 February 2011
वही रिश्ते हैं पनपते, जिनमें होता प्यार !
प्रेम-प्यार से चल रहा , है देखो संसार l
वही रिश्ते हैं पनपते, जिनमें होता प्यार ll
--अशोक लव
**A VERY HAPPY VALENTINE DAY !
वही रिश्ते हैं पनपते, जिनमें होता प्यार ll
--अशोक लव
**A VERY HAPPY VALENTINE DAY !
Monday, 7 February 2011
हरियाणा की प्रतिनिधि लघुकथा ० संपादक : डॉ. रूप देवगुण
लघुकथा का विहंगम परिदृश्य
डॉ.सुभाष रस्तोगी
यशस्वी साहित्यकार डॉ. रूप देवगुण की सद्य: प्रकाशित संपादित कृति हरियाणा की प्रतिनिधि लघुकथा में हरियाणा के 52 लघुकथाकारों की 126 लघु कथाएं संकलित हैं। यह जानकर हैरत होती है कि हरियाणा जैसे छोटे प्रदेश में 56 लघुकथाकार हैं और इस संपादित कृति में कई लघुकथाकार ऐसे भी हैं जिन्होंने समकालीन हिंदी लघुकथा परिदृश्य में बतौर लघुकथाकार और लघुकथा के चिंतक के रूप में अपनी स्वतंत्र पहचान भी स्थापित की है। डा. रूप देवगुण के इस चयन की एक विशेषता यह भी है कि उन्होंने संपादक के सही धर्म का निर्वाह किया है और साहित्यिक बाड़ेबंदी से बचते हुए केवल लघुकथाकारों के रचना कर्म को ही अधिमान दिया है।
यह सच है कि कोई भी कृति चाहे वह संपादित हो या मौलिक, संपादक अथवा रचनाकार के व्यक्तित्व का ही प्राय: प्रतिफलन हुआ करती है। यह काबिलेगौर है कि रूप देवगुण के व्यक्तित्व में जो सहजता और सरलता है, यह कृति अपने संपादकीय कलेवर में उसी सहजता और सरलता के कायांतरण के रूप में सामने आयी है।
रूप देवगुण द्वारा संपादित कृति ‘हरियाणा की प्रतिनिधि लघुकथा’ हरियाणा के लघुकथा लेखन की तो नुमाइंदगी करती ही है, समकालीन हिंदी लघुकथा के राष्ट्रीय परिदृश्य में हरियाणा के लघुकथाकारों के सार्थक हस्तक्षेप को भी रेखांकित करती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि हिंदी लघुकथा का जब भी कोई निरपेक्ष इतिहास लिखा जायेगा तो वह इस चयन में संकलित हरियाणा के लघुकथाकारों यथा विष्णु प्रभाकर, पूरन मुद्गल, सुगनचंद मुक्तेश, सुधा जैन, जितेन्द्र सूद, उर्मि कृष्ण, पृथ्वीराज अरोड़ा, सुखचैन सिंह भंडारी, रामकुमार आत्रेय, अशोक लव, अशोक भाटिया, रूप देवगुण, रामनिवास मानव, मधुकांत, डा. मुक्ता, कमलेश भारतीय, राजकुमार निजात, प्रेमसिंह बरनालवी, मधुदीप, हरनाम शर्मा, प्रदीप शर्मा स्नेही, सुरेन्द्र ‘गुप्त’, रोहित यादव, सत्यवीर मानव, सुरेंद्र ‘अंशुल’, कमल कपूर, बीजेन्द्र जैमिनी, प्रद्युम्न भल्ला, अरुण कुमार, पवन चौधरी ‘मनमौजी’ तथा अंजु दुआ जैमिनी के अवदान को रेखांकित किये बिना आधा और अधूरा ही रहेगा।
इस कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा डा. रूप देवगुण का एक शोधपरक विवेचनात्मक आलेख ‘हिन्दी लघुकथा को हरियाणा का योगदान’ है जो निश्चय ही समकालीन हिंदी लघुकथा परिदृश्य में हरियाणा के योगदान को रेखांकित करने की दृष्टि से एक संदर्भ कोश की भूमिका निभाता प्रतीत होता है। सोने पर सुहागा यह होता कि यदि इस लेख का समापन संपादक की कुछ निष्कर्षात्मक टिप्पणियों के साथ हुआ होता। समग्रत: डॉ. रूप देवगुण द्वारा संपादित कृति ‘हरियाणा की प्रतिनिधि लघुकथा’ का एक विहंगम परिदृश्य उपस्थित करती है।
० पुस्तक : हरियाणा की प्रतिनिधि लघुकथा ० संपादक : डॉ. रूप देवगुण ० प्रकाशक : सुकीर्ति प्रकाशन, डीसी निवास के सामने, करनाल रोड, कैथल ० पृष्ठ : 199 ०मूल्य : 250 रुपये
यह सच है कि कोई भी कृति चाहे वह संपादित हो या मौलिक, संपादक अथवा रचनाकार के व्यक्तित्व का ही प्राय: प्रतिफलन हुआ करती है। यह काबिलेगौर है कि रूप देवगुण के व्यक्तित्व में जो सहजता और सरलता है, यह कृति अपने संपादकीय कलेवर में उसी सहजता और सरलता के कायांतरण के रूप में सामने आयी है।
रूप देवगुण द्वारा संपादित कृति ‘हरियाणा की प्रतिनिधि लघुकथा’ हरियाणा के लघुकथा लेखन की तो नुमाइंदगी करती ही है, समकालीन हिंदी लघुकथा के राष्ट्रीय परिदृश्य में हरियाणा के लघुकथाकारों के सार्थक हस्तक्षेप को भी रेखांकित करती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि हिंदी लघुकथा का जब भी कोई निरपेक्ष इतिहास लिखा जायेगा तो वह इस चयन में संकलित हरियाणा के लघुकथाकारों यथा विष्णु प्रभाकर, पूरन मुद्गल, सुगनचंद मुक्तेश, सुधा जैन, जितेन्द्र सूद, उर्मि कृष्ण, पृथ्वीराज अरोड़ा, सुखचैन सिंह भंडारी, रामकुमार आत्रेय, अशोक लव, अशोक भाटिया, रूप देवगुण, रामनिवास मानव, मधुकांत, डा. मुक्ता, कमलेश भारतीय, राजकुमार निजात, प्रेमसिंह बरनालवी, मधुदीप, हरनाम शर्मा, प्रदीप शर्मा स्नेही, सुरेन्द्र ‘गुप्त’, रोहित यादव, सत्यवीर मानव, सुरेंद्र ‘अंशुल’, कमल कपूर, बीजेन्द्र जैमिनी, प्रद्युम्न भल्ला, अरुण कुमार, पवन चौधरी ‘मनमौजी’ तथा अंजु दुआ जैमिनी के अवदान को रेखांकित किये बिना आधा और अधूरा ही रहेगा।
इस कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा डा. रूप देवगुण का एक शोधपरक विवेचनात्मक आलेख ‘हिन्दी लघुकथा को हरियाणा का योगदान’ है जो निश्चय ही समकालीन हिंदी लघुकथा परिदृश्य में हरियाणा के योगदान को रेखांकित करने की दृष्टि से एक संदर्भ कोश की भूमिका निभाता प्रतीत होता है। सोने पर सुहागा यह होता कि यदि इस लेख का समापन संपादक की कुछ निष्कर्षात्मक टिप्पणियों के साथ हुआ होता। समग्रत: डॉ. रूप देवगुण द्वारा संपादित कृति ‘हरियाणा की प्रतिनिधि लघुकथा’ का एक विहंगम परिदृश्य उपस्थित करती है।
० पुस्तक : हरियाणा की प्रतिनिधि लघुकथा ० संपादक : डॉ. रूप देवगुण ० प्रकाशक : सुकीर्ति प्रकाशन, डीसी निवास के सामने, करनाल रोड, कैथल ० पृष्ठ : 199 ०मूल्य : 250 रुपये
दैनिक ट्रिब्यून : 7.2.2011
Saturday, 29 January 2011
"देनदार कोई और है, भेजत है दिन रैन" ---रहीम
रहीम अकबर के नव रत्नों में से एक थे। वे कृष्ण-भक्त थे और दानी थे। इस दोहे से उनकी विनम्रता की झलक मिलती है। दान देकर अपने नाम की भूख रखने वालों को यह दोहा हमेशा याद रखना चाहिए ।
देनदार कोई और है, भेजत है दिन रैन।
लोग भरम हम पर धरै, यातें नीचे नैन॥
देनदार कोई और है, भेजत है दिन रैन।
लोग भरम हम पर धरै, यातें नीचे नैन॥
"देने वाला तो भगवान है ,वही दिन-रात भेज रहा है। लोग समझते हैं हम दे रहे हैं। इसलिए हमने लज्जावश अपनी आँखें नीची की हुई हैं।"-रहीम
Tuesday, 25 January 2011
गणतंत्र-दिवस 2011 पर शुभकामनाएँ ....तिरंगे की कहानी !
26 जनवरी भारत का गणतंत्र दिवस है. सन 1950 में इसी दिन देश के संविधान को लागू किया गया था. तब से आज तक इस दिन को देश गणतंत्र दिवस के तौर पर मनाता है.
211 विद्वानों द्वारा 2 महीने और 11 दिन में तैयार भारत के सँविधान को लागू किए जाने से पहले भी 26 जनवरी का बहुत महत्व था. 26 जनवरी एक विशेष दिन के रूप में चिह्नित किया गया था.
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1930 के लाहौर अधिवेशन में पहली बार तिरंगे झंडे को फहराया गया था परंतु साथ साथ ही एक और महत्वपूर्ण फैसला इस अधिवेशन के दौरान लिया गया. इस दिन सर्वसम्मति से यह फैसला लिया गया था कि प्रतिवर्ष 26 जनवरी का दिन “पूर्ण स्वराज दिवस” के रूप में मनाया जाएगा. इस दिन सभी स्वतंत्रता सैनानी पूर्ण स्वराज का प्रचार करेंगे. इस तरह 26 जनवरी अघोषित रूप से भारत का स्वतंत्रता दिवस बन गया था. 15 अगस्त 1947 में अंग्रेजों ने भारत की सत्ता की बागडोर जवाहरलाल नेहरू के हाथों में दे दी, लेकिन भारत का ब्रिटेन के साथ नाता या अंग्रेजों का अधिपत्य समाप्त नहीं हुआ. भारत अभी भी एक ब्रिटिश कॉलोनी की तरह था, जहाँ कि मुद्रा पर ज्योर्ज 6 की तस्वीरें थी.
आज़ादी मिलने के बाद तत्कालीन सरकार ने देश के सँविधान को फिर से परिभाषित करने की जरूरत महसूस की और सविँधान सभा का गठन किया जिसकी अध्यक्षता डॉ. भीमराव अम्बेडकर को मिली. 25 नवम्बर 1949 को देश के सँविधान को मंजूरी मिली. 24 जनवरी 1950 को सभी सांसदों और विधायकों ने इस पर हस्ताक्षर किए. और इसके दो दिन बाद यानी 26 जनवरी 1950 को सँविधान लागू कर दिया गया. गणतंत्र-दिवस 2011 पर शुभकामनाएँ !तिरंगे की कहानी
211 विद्वानों द्वारा 2 महीने और 11 दिन में तैयार भारत के सँविधान को लागू किए जाने से पहले भी 26 जनवरी का बहुत महत्व था. 26 जनवरी एक विशेष दिन के रूप में चिह्नित किया गया था.
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1930 के लाहौर अधिवेशन में पहली बार तिरंगे झंडे को फहराया गया था परंतु साथ साथ ही एक और महत्वपूर्ण फैसला इस अधिवेशन के दौरान लिया गया. इस दिन सर्वसम्मति से यह फैसला लिया गया था कि प्रतिवर्ष 26 जनवरी का दिन “पूर्ण स्वराज दिवस” के रूप में मनाया जाएगा. इस दिन सभी स्वतंत्रता सैनानी पूर्ण स्वराज का प्रचार करेंगे. इस तरह 26 जनवरी अघोषित रूप से भारत का स्वतंत्रता दिवस बन गया था. 15 अगस्त 1947 में अंग्रेजों ने भारत की सत्ता की बागडोर जवाहरलाल नेहरू के हाथों में दे दी, लेकिन भारत का ब्रिटेन के साथ नाता या अंग्रेजों का अधिपत्य समाप्त नहीं हुआ. भारत अभी भी एक ब्रिटिश कॉलोनी की तरह था, जहाँ कि मुद्रा पर ज्योर्ज 6 की तस्वीरें थी.
आज़ादी मिलने के बाद तत्कालीन सरकार ने देश के सँविधान को फिर से परिभाषित करने की जरूरत महसूस की और सविँधान सभा का गठन किया जिसकी अध्यक्षता डॉ. भीमराव अम्बेडकर को मिली. 25 नवम्बर 1949 को देश के सँविधान को मंजूरी मिली. 24 जनवरी 1950 को सभी सांसदों और विधायकों ने इस पर हस्ताक्षर किए. और इसके दो दिन बाद यानी 26 जनवरी 1950 को सँविधान लागू कर दिया गया. गणतंत्र-दिवस 2011 पर शुभकामनाएँ !तिरंगे की कहानी
Monday, 24 January 2011
महान संगीत सम्राट पंडित भीमसेन जोशी विनम्र श्रद्धांजलि ! --अशोक लव
महान संगीत सम्राट पंडित भीमसेन जोशी नहीं रहे. हमारी विनम्र श्रद्धांजलि !
Saturday, 22 January 2011
संपादकीय
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स्वागत -2011
*अशोक लव
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स्वागत -2011
*अशोक लव
वर्ष 2011 में मोहयाल आश्रम वृन्दावन बनकर तैयार हो जाएगा. मोहयाल आश्रम हरिद्वार के पश्चात् मोहयालों के लिए गर्व करने का एक और सुन्दर और एतिहासिक भवन बन जाएगा. रायजादा बी डी बाली के कुशल और दूरदर्शी नेतृत्व में गत वर्षों में जो उपलब्धियाँ हुई हैं वे अद्वितीय हैं. सन 1978 में उन्होंने जनरल मोहयाल सभा के प्रेजिडेंट का पदभार संभाला था. तब से आज तक वे निरंतर किसी न किसी परियोजना को कार्यान्वित करते रहे हैं. अतीत पर दृष्टि डालें तो जी एम एस की आज तक की तमाम उपलब्धियों का श्रेय उन्हीं को जाता है. इसी का परिणाम है कि वर्ष 2010 में हुए चुनावों में मोहयाल समाज ने उन्हें और उनकी टीम को अभूतपूर्व समर्थन देकर पुनः निर्वाचित किया है. मोहयाल सजग और सतर्क हैं. रायजादा बी डी बाली द्वारा किए कार्य सबके सामने हैं. मोहयाल किसी के बहकावे में नहीं आए और उन्होंने रायजादा बी डी बाली को उत्तरदायित्व सौंप दिया.
देश के विभिन्न अंचलों में कार्य कर रही ' लोकल मोहयाल सभाएँ ' जी एम एस के साथ कदम-से कदम मिलकर चल रही हैं. जी एम एस उनकी प्रत्येक परियोजनाओं में आर्थिक और अन्य सहयोग देकर उन्हें पूर्ण समर्थन दे रही है. विभिन्न सभाओं के बने भवन इसके प्रतीक हैं. नवीनतम उदाहरण मोहयाल सभा होश्यारपुर का है. इस सभा का भवन निर्माणाधीन है. इसके पूर्ण होने में आर्थिक समस्या आ गई. उनके पदाधिकारियों ने जी एम एस से अनुरोध किया. रायजादा बी डी बाली ने तत्काल आर्थिक सहयोग की सहमति दे दी.
वास्तव में ये सारे भवन मोहयालों के लिए ही हैं. मोहयाल सभा यमुना नगर ने भी वर्तमान भवन के साथ के प्लाट को लेने का निर्णय लिया तो जी एम एस की ओर से स्वीकृति दे दी गई.
मोहयाल भवन (इन्द्रपुरी ,नई दिल्ली ) पुनः सुव्यवस्थित ढंग से संचालित हो रहा है. इसे नया रूप देने के कार्य हो रहे हैं . मोहयाल आश्रम और मोहयाल सेवा सदन हरिद्वार मोहयालों के आकर्षण के केंद्र बने हुए हैं और सुचारू ढंग से संचालित हो रहे हैं. यहाँ जो मोहयाल एक बार ठहरता है इसी का हो जाता है. विश्व भर में इसकी प्रशंसा हो रही है. मोहयाल फ़ौंडेशन स्थित ' एम ई आर आई टी ' के माध्यम से आई टी क्षेत्र में शिक्षा प्रदान करने के कार्य चल रहे हैं.
मोहयालों में जी एम एस के प्रति जो विश्वास बना है उसके पीछे जी एम एस के पदाधिकारियों और मैनेजिंग कमेटी के सदस्यों का निःस्वार्थ सेवा- भाव है. रायजादा बी डी बाली की समर्पण भाव से कार्य करने की शैली है. यही कारण है कि देहरादून और मेरठ में मोहयालों ने अपनी सम्पति जी एम एस को भेंट कर दी.
देश के विभिन्न अंचलों में कार्य कर रही ' लोकल मोहयाल सभाएँ ' जी एम एस के साथ कदम-से कदम मिलकर चल रही हैं. जी एम एस उनकी प्रत्येक परियोजनाओं में आर्थिक और अन्य सहयोग देकर उन्हें पूर्ण समर्थन दे रही है. विभिन्न सभाओं के बने भवन इसके प्रतीक हैं. नवीनतम उदाहरण मोहयाल सभा होश्यारपुर का है. इस सभा का भवन निर्माणाधीन है. इसके पूर्ण होने में आर्थिक समस्या आ गई. उनके पदाधिकारियों ने जी एम एस से अनुरोध किया. रायजादा बी डी बाली ने तत्काल आर्थिक सहयोग की सहमति दे दी.
वास्तव में ये सारे भवन मोहयालों के लिए ही हैं. मोहयाल सभा यमुना नगर ने भी वर्तमान भवन के साथ के प्लाट को लेने का निर्णय लिया तो जी एम एस की ओर से स्वीकृति दे दी गई.
मोहयाल भवन (इन्द्रपुरी ,नई दिल्ली ) पुनः सुव्यवस्थित ढंग से संचालित हो रहा है. इसे नया रूप देने के कार्य हो रहे हैं . मोहयाल आश्रम और मोहयाल सेवा सदन हरिद्वार मोहयालों के आकर्षण के केंद्र बने हुए हैं और सुचारू ढंग से संचालित हो रहे हैं. यहाँ जो मोहयाल एक बार ठहरता है इसी का हो जाता है. विश्व भर में इसकी प्रशंसा हो रही है. मोहयाल फ़ौंडेशन स्थित ' एम ई आर आई टी ' के माध्यम से आई टी क्षेत्र में शिक्षा प्रदान करने के कार्य चल रहे हैं.
मोहयालों में जी एम एस के प्रति जो विश्वास बना है उसके पीछे जी एम एस के पदाधिकारियों और मैनेजिंग कमेटी के सदस्यों का निःस्वार्थ सेवा- भाव है. रायजादा बी डी बाली की समर्पण भाव से कार्य करने की शैली है. यही कारण है कि देहरादून और मेरठ में मोहयालों ने अपनी सम्पति जी एम एस को भेंट कर दी.
वर्ष 2010 में अनेक मोहयाल सभाओं ने ' मोहयाल -मिलन ' आयोजित किए. इनके माध्यम से स्थानीय मोहयाल आपस में मिले. अपनत्व की भावना पनपी. विचार-विमर्श हुए. नए कार्य करने की प्रेरणा मिली. दिसंबर में फरीदाबाद, देहरादून और करनाल में सफल आयोजन हुए. यह मिलन मोहयाल-संस्कृति को संरक्षित और गतिशील रखते हैं. फेसबुक और ऑरकुट आदि सोशल-साईट के माध्यमों से मोहयाल आपस में संवाद करते है. ये माध्यम हमरी संस्कृति को जीवंत रख रहे हैं.
जी एम एस द्वारा 14 नवम्बर को ' प्रतिभाशाली मोहयाल विद्यार्थी सम्मान समारोह ' आयोजित किया गया. युवा और किशोर पीढ़ी में मोहयाली भावना जागृत करने में यह समारोह अहम भूमिका निभा रहा है.
जी एम एस द्वारा 14 नवम्बर को ' प्रतिभाशाली मोहयाल विद्यार्थी सम्मान समारोह ' आयोजित किया गया. युवा और किशोर पीढ़ी में मोहयाली भावना जागृत करने में यह समारोह अहम भूमिका निभा रहा है.
वर्ष 2011 में जी एम एस मोहयालों में रिश्ते- नाते कराने के लिए ' मैट्रिमोनियल -मेला ' आयोजित करने जा रहा है. वार्षिक महाधिवेशन और कांफ्रेंस के साथ यूथ कैम्प का आयोजन भी 2011 में किया जाएगा.
' जी एम एस ' संस्था आप सबके सहयोग से इन सब कार्यों को संचालित कर रही है. ये कार्य प्रत्येक मोहयाल को गौरवान्वित कर रहे हैं. वर्ष - 2011 में भी आप सबका सहयोग जी एम एस को मिलता रहेगा और रायजादा बी डी बाली की टीम आप सबके लिए इसी प्रकार सेवा-भाव से कार्यरत रहेगी.
आइए इस नए वर्ष में हम सब मोहयाल ध्वज को और बुलंदियों पर फहराने का संकल्प लें . आप सब सपरिवार सानंद रहें . यह वर्ष आप सबके लिए सुख-समृद्धि भरा हो.
जय मोहयाल !
' जी एम एस ' संस्था आप सबके सहयोग से इन सब कार्यों को संचालित कर रही है. ये कार्य प्रत्येक मोहयाल को गौरवान्वित कर रहे हैं. वर्ष - 2011 में भी आप सबका सहयोग जी एम एस को मिलता रहेगा और रायजादा बी डी बाली की टीम आप सबके लिए इसी प्रकार सेवा-भाव से कार्यरत रहेगी.
आइए इस नए वर्ष में हम सब मोहयाल ध्वज को और बुलंदियों पर फहराने का संकल्प लें . आप सब सपरिवार सानंद रहें . यह वर्ष आप सबके लिए सुख-समृद्धि भरा हो.
जय मोहयाल !
.............................
मोहयाल मित्र ,जनवरी 2011
Tuesday, 21 December 2010
Tuesday, 14 December 2010
कोई नहीं है आसपास / अशोक लव
कोई नहीं है आसपास फिर भी हवाओं में है
किसी की सुगंध
महका रही है भीतर तक
कर रही है उल्लसित।
वृक्षों के पत्तों में प्रकम्पित
चूड़ियों की खनखनाहट ,
आकाश में टंगा सूर्य-
माथे की बिंदी - सा
चमक रहा है।
जनवरी की कोसी-कोसी धूप
किसी की निकटता -सी
लग रही है सुखद ।
दूरियों की दीवार के पार
है कोई
और यहाँ हैं -
नदी से नहाकर निकली
हवाओं का गीलापन लिए
निकटता के क्षणों के अहसास।
किसी के संग न होने पर भी
आ रही है
हवा के प्रत्येक झोंके के साथ
सुपरिचित महक ।@अशोक लव
Saturday, 27 November 2010
Thursday, 25 November 2010
सबका धन्यवाद (Thanksgiving Day :25th November )
इस देह को जन्म देने वाले अब मेरे संग नहीं हैं सर्वप्रथम उनका धन्यवाद !शब्दों से क्या उनका धन्यवाद दिया जा सकता है ? पर भीगा मन कहता है सर्वप्रथम उन्हें धन्यवाद दूँ.
जीवन-यात्रा के मध्य इसे बहुतों ने सजाया- संवारा. उन सबका धन्यवाद.
जो अपने नहीं थे उन्होंने भी अपनत्व से जीवन के बहुत दिनों को सुखमय बनाया. कुछ वर्षों से साथ हैं, कुछ ,कुछ पल साथ रहे. कुछ अधिक समय साथ रहे और अब न जाने कहाँ कैसी स्थिति में हैं. उन सबका धन्यवाद !
कुछ स्वार्थवश संग रहे और स्वार्थ पूरे कर चले गए. उनका भी धन्यवाद. उनसे भी बहुत कुछ सीखने को मिला.
कुछ अपनों का मुखौटा ओढ़कर संग रहे और छल करके चले गए. उनका भी धन्यवाद.
कुछ अब भी मुखौटा ओढ़े संग हैं . उनका भी धन्यवाद !
जीवन-यात्रा के मध्य इसे बहुतों ने सजाया- संवारा. उन सबका धन्यवाद.
जो अपने नहीं थे उन्होंने भी अपनत्व से जीवन के बहुत दिनों को सुखमय बनाया. कुछ वर्षों से साथ हैं, कुछ ,कुछ पल साथ रहे. कुछ अधिक समय साथ रहे और अब न जाने कहाँ कैसी स्थिति में हैं. उन सबका धन्यवाद !
कुछ स्वार्थवश संग रहे और स्वार्थ पूरे कर चले गए. उनका भी धन्यवाद. उनसे भी बहुत कुछ सीखने को मिला.
कुछ अपनों का मुखौटा ओढ़कर संग रहे और छल करके चले गए. उनका भी धन्यवाद.
कुछ अब भी मुखौटा ओढ़े संग हैं . उनका भी धन्यवाद !
Saturday, 13 November 2010
Sunday, 7 November 2010
यादों का सिलसिला
वक्त अपनों को बहाकर कहाँ-कहाँ ले गया l
हाथों में सिर्फ यादों का सिलसिला दे गया ll
*अशोक लव
Wednesday, 3 November 2010
Tuesday, 2 November 2010
9 फरवरी 1990 उपराष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा द्वारा ' हिन्दी के प्रतिनिधि साहित्यकारों से साक्षात्कार ' का लोकार्पण
![]() |
| 9 फरवरी 1990 उपराष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा द्वारा अशोक लव की पुस्तक ' हिन्दी के प्रतिनिधि साहित्यकारों से साक्षात्कार ' का लोकार्पण हुआ |
Saturday, 30 October 2010
शुक्रिया / अशोक लव
शुक्रिया कदमों से कदम मिलाने का
मुश्किलों में यहाँ तक साथ आने का
लगता है कुछ दिन और जी लेंगे हम
इंतज़ार है वक्त के ठहर जाने का. --अशोक लव
Thursday, 28 October 2010
सलाम दिल्ली : अशोक लव की लघुकथाएँ
'सलाम दिल्ली' लघुकथाओं का संग्रह है जिसका प्रकाशन 1991 में हुआ था. इसकी अनेक लघुकथाएँ पाठ्य -पुस्तकों में और अनेक सम्पादित लघुकथा -संग्रहों में संकलित हैं.
Saturday, 16 October 2010
काश ऐसा होता कि हम..........! --- अशोक लव
त्योहारों के संग कितनी स्मृतियाँ सजीव हो उठती हैं. वे सब आसपास तैरने लगते हैं जिनकी उंगलियाँ पकड़ कभी रामलीला देखने जाते थे, कभी जलते रावण , कुम्भकरण और मेघनाद के पुतले. जीवन के पृष्ठों पर इन सबकी कथाएँ उन्होंने लिखीं जो अब नहीं हैं.
समय जिस तेज़ी से भागता है, पता ही नहीं चलता कैसे सब लीलता चला जाता है.कुछ नहीं छोड़ता. केवल रह जाती है टीस !
किसी को इससे कुछ लेना-देना नहीं. यह एकदम व्यक्तिगत होती है.
इस संसार में सबका अपना-अपना एक भिन्न संसार बसा होता है. अपनी-अपनी भावनाएँ,अपनी-अपनी संवेदनाएँ,अपनी -अपनी प्रसन्नताएँ, अपनी-अपनी उदासियाँ. स्वयं के हृदय की धड़कनों को स्वयं ही सुनना.
कितना अकेला होता है मनुष्य , सबके बीच रहते हुए भी एकदम अकेला !
जीवन-यात्रा के मध्य उनका आभार आवश्यक हो जाता है जिन्होंने अपने जीवन के अमूल्य क्षण हमारे जीवन को सजाने-संवारने में लगा दिए.आज कल करते-करते समय यूं निकल गया . जिनके प्रति आभार प्रकट करने के विषय में सोचते रहे ,वही नहीं रहे.
उन सबका आभार तो प्रकट कर ही देना चाहिए जो हमारे आसपास हैं. उन क्षणों के लिए जो उन्होंने अपने समय से निकालकर हमें समर्पित किए.
इस बार भी इन त्योहारों के संग वे बहुत याद आ रहे हैं जिनके संग इन्हें मनाया था.
एक शब्द है--काश !
काश! ऐसा होता कि हम समय को बाँधने की सामर्थ्य रखते. काश ऐसा होता कि हम..........!
समय जिस तेज़ी से भागता है, पता ही नहीं चलता कैसे सब लीलता चला जाता है.कुछ नहीं छोड़ता. केवल रह जाती है टीस !
किसी को इससे कुछ लेना-देना नहीं. यह एकदम व्यक्तिगत होती है.
इस संसार में सबका अपना-अपना एक भिन्न संसार बसा होता है. अपनी-अपनी भावनाएँ,अपनी-अपनी संवेदनाएँ,अपनी -अपनी प्रसन्नताएँ, अपनी-अपनी उदासियाँ. स्वयं के हृदय की धड़कनों को स्वयं ही सुनना.
कितना अकेला होता है मनुष्य , सबके बीच रहते हुए भी एकदम अकेला !
जीवन-यात्रा के मध्य उनका आभार आवश्यक हो जाता है जिन्होंने अपने जीवन के अमूल्य क्षण हमारे जीवन को सजाने-संवारने में लगा दिए.आज कल करते-करते समय यूं निकल गया . जिनके प्रति आभार प्रकट करने के विषय में सोचते रहे ,वही नहीं रहे.
उन सबका आभार तो प्रकट कर ही देना चाहिए जो हमारे आसपास हैं. उन क्षणों के लिए जो उन्होंने अपने समय से निकालकर हमें समर्पित किए.
इस बार भी इन त्योहारों के संग वे बहुत याद आ रहे हैं जिनके संग इन्हें मनाया था.
एक शब्द है--काश !
काश! ऐसा होता कि हम समय को बाँधने की सामर्थ्य रखते. काश ऐसा होता कि हम..........!
Tuesday, 21 September 2010
Tuesday, 14 September 2010
हिंदी-दिवस के बहाने चलो हिंदी की बात करें.
व्रत-त्योहार और दिवस आते हैं और अपने -पराए शुभकामनाएँ लेते-देते हैं. 'हिंदी-दिवस' भी इसी श्रेणी का दिवस बन गया है. इसे केवल शुकामनाओं का दिवस नहीं बनाना चाहिए. यह तो जीवन-शैली है. आत्मा में रची-बसी है.इसे अपनाएँ.
हिंदी में सक्रिय लेखन करते हुए चार दशक से अधिक बीत गए हैं. अनेक साहित्यिक और शैक्षिक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं. अनेक हिंदी कार्यशालाओं में भाषण दिए हैं. अनेक स्कूलों के हिंदी शिक्षकों को संबोधित किया है. हिंदी-दिवस पर आयोजित अनेक कवि-सम्मेलनों में भाग लिया है. अनेक हिंदी पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया है.लगभग तीस वर्षों तक अध्यापन किया है. आज हिंदी की स्थिति देखकर गर्व होता है.
लेह-लद्दाख से लेकर मणिपुर और अंडमान तक देश भर में हिंदी ही एक-दूसरे के साथ संवाद का माध्यम है. विदेशों में बसे भारतीय हिंदी में बातचीत करके गर्वित होते हैं. कुछ माह अमेरिका में रहने के मध्य इस प्रकार के अनेक अवसर आए. वहाँ मिले भारतीय अनजान होने पर भी मिले और तुरंत हिंदी में बातें करने लगे. होटलों में भी यही अनुभव किया. वहाँ बसे भारतीय अपनी मातृभाषा में और हिंदी में बातचीत करके स्वयं को देश के साथ जुड़ा महसूस करते हैं.
हमें अधिक से अधिक भाषाओँ का अध्ययन करना चाहिए. सुप्रसिद्ध साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन तेरह से अधिक भाषाओँ के विद्वान थे. हिंदी का किसी से वैर नहीं है. राजनेताओं ने देश का जो हाल लिया है,सबके सामने है. उनके कारण हिंदी का हित नहीं हुआ है , यह तो इस भाषा की विशेषता है कि यह स्वयं पल्लवित-पुष्पित हुई है. आज हिंदी में लाखों (हजारों नहीं ) लेखक हैं.14 सितम्बर 1946 संविधान में को इसे राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकृत किया गया. आज यह जन-मानस में रच-बस गई है. हमें अन्य भारतीय भाषाओँ के साथ हिंदी पर गर्व है. यह संसार की श्रेष्ठ भाषाओँ में से एक है.
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