Friday, 2 July 2010
Dr. Ashok Lav (b April 13, 1947 Delhi) is a noted Hindi language author and poet. Works and honours A recipient of numerous awards related to Hindi literature, including the Mohyal Gaurav,Eklavya award, his more well known works include: Shikhron se aage (novel- literally, "Beyond peaks") Anubhootiyon ki aahaten (collection of poems,literally, "The approaching footsteps of sensations") Larhkiyan Choonaa Chahtee Hain Aasmaan (collections of poems- literally, "Girls want to touch the sky ... see more
Dr. Ashok Lav is a noted Hindi language author and poet. Works and honours A recipient of numerous awards related to Hindi literature, including the Mohyal Gaurav,Eklavya award, his more well known works include: Shikhron se aage (novel- literally, "Beyond peaks") Anubhootiyon ki aahaten (collection of poems,literally, "The approaching footsteps of sensations") Larhkiyan Choonaa Chahtee Hain Aasmaan (collections of poems- literally, "Girls want to touch the sky") Phulvaree (songs for children- literally, "A garden of flowers") Band darvaazon par dastaken (short stories- literally, "Knocking on locked doors") Salaam Dilli (short stories- literally, "A salute to Delhi") Pathron se bandhe pankh (short stories- literally, "Feathers tied to stones") Khidkiyon Par Tange Log (short stories(ed)-literally,"People Hanged on Windows" His book Hindi ke Pratinidhi Saahityakaaron se Saakshaatkaar, a collection of interviews with writers representative of Hindi literature, was released by the Vice President of India, Dr. Shankar Dayal Sharma on February 9, 1990. Personal life Dr. Lav belongs to the Mohyal community, usually more noted for its tradition of military service. Besides being a writer, he is also the Managing Director of an IT firm. He also is the editor of the Hindi section of the Mohyal community magazine, the Mohyal Mitter since July 1987.
Ashok Lav :Wonderful Years In Tafs Read more: http://www.kosmix.com/topic/Ashok_Lav#इक्ष्ज़्ज़०सूस्य़ Who's who of Indian Writers, 1999: A-MAuthor: Kartik Chandra DuttPublished: 1999Ashok see under Jha, Ashok Kumar Ashok Lav see under Lav, Ashok Ashoka VardhanaRead more: http://www.kosmix.com/topic/Ashok_Lav#ixzz0sUs244BI
Tuesday, 29 June 2010
तुमने कुछ नहीं कहा / अशोक लव
तुम्हारे चले जाने से पूर्व
तुमसे कितनी-कितनी बातें करनी थीं
कितना कुछ जानना था ।
हमारे मध्य विवशता विद्यमान थी
तुम बोलने में असमर्थ थी
और मैं
वर्षों संग जिए क्षणों को जी लेना चाहता था
मृत्यु तुम्हारे सिरहाने मंडरा रही थी
मैं तुम्हें बताना चाहता था
पर बताने की सामर्थ्य कहाँ थी !
बता भी देता तो क्या होता !
विदा के क्षण और पीड़ामय हो जाते।
झूठे आश्वासनों को तुम सुनती थी
और मैं प्रतिदिन आश्वासन देता चला जाता था।
तुम्हारे सिर पर हाथ फेरते हुए
तुम्हारे अश्रु-कणों को पोंछते हुए
देखता था -
तुम्हारी आँखों में
फिर से मेरे साथ जीने की ललक के स्वप्न,
मेरे हाथों पर अभी भी है
तुम्हारे हाथों के कसाव की गर्माहट
पर विवशता थी
तुम्हें अकेले छोड़ने की
अस्पताल के अपरिचित डाक्टरों - नर्सों के पास।
कितने-कितने वर्षों के चित्र
आँखों के समक्ष तैरते
बेंच पर अकेले बैठे
अश्रुकणों के अविरल प्रवाहों के संग
तुम तैरती रहती मेरी स्मृतियों में।
एक-एक दिन आता
मैं हर पल मरता जाता
और जिस क्षण तुमने अंतिम श्वास लिए
और तुम्हारे हाथ का कसाव ढीला पड़ गया
तुम्हारे संग ही
मेरा संसार भी मर गया।
बस यही कसक लिए जीने की विवशता है
तुमने जाने से पूर्व कुछ नहीं कहा
कहती भी कैसे -
मुख पर लगी ट्यूब्स ने
तुम्हें बोलने ही नहीं दिया।
किसी के बिना कैसे जीवित रहा जा सकता है
किसी पुस्तक में नहीं लिखा है
तुम बोल सकती तो बता जाती।
०००००००००००००००००००००००००००००
कुछ क्षण स्वयं कविता का रूप ले लेते हैं। यह कविता ऐसे ही क्षणों से जन्मी है। जब मर्मान्तक पीड़ा गहन हो जाती है तब ऐसी कविताएँ जन्म लेती हैं। यह किसी विशेष संदर्भ में नहीं लिखी गई है। फिर भी प्रत्येक मनुष्य के जीवन में कई ऐसे क्षण आते हैं...
--अशोक लव
तुमसे कितनी-कितनी बातें करनी थीं
कितना कुछ जानना था ।
हमारे मध्य विवशता विद्यमान थी
तुम बोलने में असमर्थ थी
और मैं
वर्षों संग जिए क्षणों को जी लेना चाहता था
मृत्यु तुम्हारे सिरहाने मंडरा रही थी
मैं तुम्हें बताना चाहता था
पर बताने की सामर्थ्य कहाँ थी !
बता भी देता तो क्या होता !
विदा के क्षण और पीड़ामय हो जाते।
झूठे आश्वासनों को तुम सुनती थी
और मैं प्रतिदिन आश्वासन देता चला जाता था।
तुम्हारे सिर पर हाथ फेरते हुए
तुम्हारे अश्रु-कणों को पोंछते हुए
देखता था -
तुम्हारी आँखों में
फिर से मेरे साथ जीने की ललक के स्वप्न,
मेरे हाथों पर अभी भी है
तुम्हारे हाथों के कसाव की गर्माहट
पर विवशता थी
तुम्हें अकेले छोड़ने की
अस्पताल के अपरिचित डाक्टरों - नर्सों के पास।
कितने-कितने वर्षों के चित्र
आँखों के समक्ष तैरते
बेंच पर अकेले बैठे
अश्रुकणों के अविरल प्रवाहों के संग
तुम तैरती रहती मेरी स्मृतियों में।
एक-एक दिन आता
मैं हर पल मरता जाता
और जिस क्षण तुमने अंतिम श्वास लिए
और तुम्हारे हाथ का कसाव ढीला पड़ गया
तुम्हारे संग ही
मेरा संसार भी मर गया।
बस यही कसक लिए जीने की विवशता है
तुमने जाने से पूर्व कुछ नहीं कहा
कहती भी कैसे -
मुख पर लगी ट्यूब्स ने
तुम्हें बोलने ही नहीं दिया।
किसी के बिना कैसे जीवित रहा जा सकता है
किसी पुस्तक में नहीं लिखा है
तुम बोल सकती तो बता जाती।
०००००००००००००००००००००००००००००
कुछ क्षण स्वयं कविता का रूप ले लेते हैं। यह कविता ऐसे ही क्षणों से जन्मी है। जब मर्मान्तक पीड़ा गहन हो जाती है तब ऐसी कविताएँ जन्म लेती हैं। यह किसी विशेष संदर्भ में नहीं लिखी गई है। फिर भी प्रत्येक मनुष्य के जीवन में कई ऐसे क्षण आते हैं...
--अशोक लव
Monday, 21 June 2010
हमारे गोत्र ऋषि



'मोहयाल आश्रम हरिद्वार' के ध्यान-कक्ष (Meditation-Hall) को मंदिर का रूप दिया गया है। इसमें शिव-पार्वती-गणेश जी और हनुमान जी की मूर्तियों की स्थापना के साथ-साथ इन ऋषियों की लगभग छः फुट की भव्य प्रतिमाएँ स्थापित की गई हैं -महा ऋषि वशिष्ठ , पराशर, भृगु , भरद्वाज, कश्यप, कौशल और धन्वन्तरी। 19 -20 जून को विधिवत पूजा-पद्धति - हवन के साथ इन मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा की गई।
इस अवसर के लिए विशेष रूप से पुस्तिका ' मोहयाल गोत्र ऋषि ' का प्रकाशन किया गया। इसमें मोहयाल ब्राह्मणों के सातों गोत्र ऋषियों का परिचय दिया गया है। इन ऋषियों के सम्बन्ध में गत तीन महीनों से गंभीरतापूर्वक कार्य करते हुए सुखद अनुभूति हुई। उन ऋषियों के ज्ञान और विद्वता के समक्ष नतमस्तक हुए बिना नहीं रहा गया। इस पुस्तिका में उनके संक्षिप्त परिचय हैं। इन पर पुस्तक भी शीघ्र ही प्रकाशित कराने की योजना है।
Thursday, 17 June 2010
बस - स्टॉप पर द्रौपदी / अशोक लव *
बस - स्टॉप पर खड़ी थी
अधेड़ औरत।
एक के बाद एक बसें आतीं भीड़ भरीं
वह चढ़ नहीं पाती
बस के दरवाज़े से उलटे पाँव लौट आती
कंधे से लटकता झोला संभालती।
' इस बार आई बस में वह ज़रूर चढ़ेगी '
उसने निर्णय कर लिया ,
दरवाज़े तक लटकी भीड़ में डाल दिया उसने हाथ
हैंडल हाथ में नहीं आया
ड्राईवर ने चला दी बस
गिर गई औरत
छिल गई कुहनियाँ
झोले से दूर जा गिरा
टिफ़िन-बॉक्स ।
झटका लगते ही खुल गया
टिफ़िन-बॉक्स
सड़क पर जा गिरीं -
दो सूखी चपातियाँ
एक फांक अचार ,
झट से उठा लीं चपातियाँ
झट से उठा लिया अचार
पोंछकर करने लगी बंद उन्हें
टिफ़िन-बॉक्स में ।
भरे बस-स्टॉप पर
अधेड़ औरत
द्रौपदी बनी खड़ी थी ।
"""""""""""""""""""""""""""
*पुस्तक- लड़कियाँ छूना चाहती हैं आसमान ( वर्ष-2008)
[ किसी ने इस कविता के शीर्षक और कुछ पंक्तियों में परिवर्तन करके इसे अपने नाम से फेसबुक /ऑरकुट में लगाया हुआ है। इस ओर मेरा ध्यान कुछ साहित्यकार मित्रों ने दिलाया है। इसलिए इसे प्रकाशित करना आवश्यक हो गया है।]
Ashok sir ji, ki yah rachna sanketon main aam jan jeevan ki sachchi bangi pesh karti hai, Rachna ka mukhya patra yani bus stap par kahdi adhed stree, vastav main Bhartiya samaj ke us varg ka pratinidhittav kar rahi hai jo sahi arthon main aam insan hone ki trasdi ke sath jeeta hai, Rotian, or Aachar un vastaoun or mulyon ke prateek hain, jinke sath aaye din samjhoute karne padate hain, lekin ye mulya, or manyatan aam aadami ke jeevan se is tarah jude hue hain, aam aadmi ko unke sath hi jeean hota hai, naitik or anaitik jaisa koi bhi prshan aisi sthithi main apna astitav kho deta hai,
sach kahun di to Ashok sir ji ne in chand panktion main samaj or insan ke us chehre ko samne rakh diya hai jo amuman har roz samne aakar bhi chhupa hua hota hai-"
orkut ke 'srijan ka sahyog' se udhrit.
अधेड़ औरत।
एक के बाद एक बसें आतीं भीड़ भरीं
वह चढ़ नहीं पाती
बस के दरवाज़े से उलटे पाँव लौट आती
कंधे से लटकता झोला संभालती।
' इस बार आई बस में वह ज़रूर चढ़ेगी '
उसने निर्णय कर लिया ,
दरवाज़े तक लटकी भीड़ में डाल दिया उसने हाथ
हैंडल हाथ में नहीं आया
ड्राईवर ने चला दी बस
गिर गई औरत
छिल गई कुहनियाँ
झोले से दूर जा गिरा
टिफ़िन-बॉक्स ।
झटका लगते ही खुल गया
टिफ़िन-बॉक्स
सड़क पर जा गिरीं -
दो सूखी चपातियाँ
एक फांक अचार ,
झट से उठा लीं चपातियाँ
झट से उठा लिया अचार
पोंछकर करने लगी बंद उन्हें
टिफ़िन-बॉक्स में ।
भरे बस-स्टॉप पर
अधेड़ औरत
द्रौपदी बनी खड़ी थी ।
"""""""""""""""""""""""""""
*पुस्तक- लड़कियाँ छूना चाहती हैं आसमान ( वर्ष-2008)
[ किसी ने इस कविता के शीर्षक और कुछ पंक्तियों में परिवर्तन करके इसे अपने नाम से फेसबुक /ऑरकुट में लगाया हुआ है। इस ओर मेरा ध्यान कुछ साहित्यकार मित्रों ने दिलाया है। इसलिए इसे प्रकाशित करना आवश्यक हो गया है।]
Ashok sir ji, ki yah rachna sanketon main aam jan jeevan ki sachchi bangi pesh karti hai, Rachna ka mukhya patra yani bus stap par kahdi adhed stree, vastav main Bhartiya samaj ke us varg ka pratinidhittav kar rahi hai jo sahi arthon main aam insan hone ki trasdi ke sath jeeta hai, Rotian, or Aachar un vastaoun or mulyon ke prateek hain, jinke sath aaye din samjhoute karne padate hain, lekin ye mulya, or manyatan aam aadami ke jeevan se is tarah jude hue hain, aam aadmi ko unke sath hi jeean hota hai, naitik or anaitik jaisa koi bhi prshan aisi sthithi main apna astitav kho deta hai,
sach kahun di to Ashok sir ji ne in chand panktion main samaj or insan ke us chehre ko samne rakh diya hai jo amuman har roz samne aakar bhi chhupa hua hota hai-"
orkut ke 'srijan ka sahyog' se udhrit.
Friday, 11 June 2010
कविता सूरज है
जिन्हें कविता से डर लगता हैवे कविता की बात नहीं करते
वे राजनीति के किस्सों की चासनी में
उंगलियाँ डुबोकर उन्हें चाटते हैं।
वे उनकी बातें करते हैं
जिनका न धर्म है , न ईमान
जो कुर्सियों को खाते हैं
कुर्सियों को पीते हैं
कुर्सियों में मर जाते हैं
कुर्सियों में दफ़न हो जाते हैं।
कविता न चासनी है , न कुर्सी
कविता सीधी - सच्ची बात कहती है
वह दिन को दिन
और रात को रात कहती
वह भूख को भूख
और मदिरा को मदिरा कहती है ।
उन्हें कष्ट है
कि कविता सच को सच
क्यों कहती है ,
उनकी कोशिश है कि
कोई भी कविता की बात न करे।
कुछ सिरफिरे हैं कि
फिर भी कविता लिखते हैं,
कविता जीते हैं।
सूरज के आगे
अंधेरों की कितनी ही चादरें तान लें ,
कर देता है सूरज उन्हें तार-तार
अपनी रोशनी से ,
उन्हें शिकायत है कि
कविता सूरज क्यों है।
.............................................................
प्रकाशित -- वोमेन ऑन टॉप ( हिन्दी मासिक पत्रिका ), A-96, SECTOR-65, NOIDA
जून2010 अंक
Friday, 21 May 2010
तुम / अशोक लव
तुमज्यों -
अंतिम पहर का स्वप्न ,
ज्यों -
कमल-पाँखुड़ी पर तुहिन- कण ,
ज्यों -
वर्षा धुले आकाश पर इन्द्रधनुष ,
ज्यों-
तितलियों के पंखों पर अंकित गीत,
ज्यों -
मेघों को समर्पित मयूर-नृत्य ,
ज्यों-
जल-तरंगों पर रश्मियों की अठखेलियाँ,
ज्यों-
मानसरोवर में उतरना हंसों का,
ज्यों-
गंगा का भागीरथ हेतु अवतरण ,
ज्यों-
शुष्क चट्टानों पर रुई के फाहों-सा हिमपात,
ज्यों-
भोज-पत्रों पर अंकित ऋचाएँ,
ज्यों-
साधक मन में आलोकित दिव्य-प्रकाश।
''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
* पुस्तक- अनुभूतियों की आहटें ( वर्ष-१९९७)
@सर्वाधिकार : अशोक लव
Thursday, 20 May 2010
सहित्यकार के रूप में सम्मानपूर्वक जीना चाहिए
साहित्यकार साहित्य का सृजन आत्म संतोष के लिए करता है। अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए करता है। वह इसे प्रचार का माध्यम अथवा पहचान का माध्यम नहीं बनाता।
श्रेष्ठ रचनाकार की पहचान स्वयं बनती चली जाती है। उसकी रचनाएँ इसका माध्यम बनती हैं।
वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों में साहित्य मुख्य - धारा नहीं रहा। अर्थ और राजनीति प्रधान हो गए हैं। इसका यह तात्पर्य यह नहीं है कि साहित्य सृजन नहीं हो रहा या आम व्यक्ति ने साहित्य पढ़ना बंद कर दिया है। हाँ प्रतिशत बहुत कम हुआ है।
कविता लिखना सबके बस का काम नहीं है और कविता से लगाव भी सबके बस का नहीं है। इसलिए सृजन करते रहना चाहिए और सहित्यकार के रूप में सम्मानपूर्वक जीना चाहिए।
अपनी रचनाएँ पढ़वाने के लिए ई -मेल पर ई - मेल नहीं भेजने चाहिएँ ।
श्रेष्ठ रचनाकार की पहचान स्वयं बनती चली जाती है। उसकी रचनाएँ इसका माध्यम बनती हैं।
वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों में साहित्य मुख्य - धारा नहीं रहा। अर्थ और राजनीति प्रधान हो गए हैं। इसका यह तात्पर्य यह नहीं है कि साहित्य सृजन नहीं हो रहा या आम व्यक्ति ने साहित्य पढ़ना बंद कर दिया है। हाँ प्रतिशत बहुत कम हुआ है।
कविता लिखना सबके बस का काम नहीं है और कविता से लगाव भी सबके बस का नहीं है। इसलिए सृजन करते रहना चाहिए और सहित्यकार के रूप में सम्मानपूर्वक जीना चाहिए।
अपनी रचनाएँ पढ़वाने के लिए ई -मेल पर ई - मेल नहीं भेजने चाहिएँ ।
Sunday, 9 May 2010
मेरी तीन कविताएँ
'आखर कलश ' में 20 अप्रैल 2010 को प्रकाशित

अशोक लव की तीन कविताएं
परिचय
प्रकाशित पुस्तकें-
१. लड़कियाँ छूना चाहती हैं आसमान ( कविता-संग्रह)
२.अनुभूतियों की आहटें ( कविता-संग्रह)
३.टूटते चक्रव्यूह (सम्पादित-कविता संकलन)
४.सलाम दिल्ली ( लघुकथा - संग्रह )
५.खिड़कियों पर टंगे लोग ( सम्पादित लघुकथा संकलन )
६.बंद दरवाजों पर दस्तकें (सम्पादित लघुकथा-संकलन)
७.शिखरों से आगे (उपन्यास )
८. हिन्दी के प्रतिनिधि साहित्यकारों से साक्षात्कार
९. प्रेमचंद की लोकप्रिय कहानियाँ (सं)
१०.प्रेमचंद की सर्वोत्तम कहानियाँ (सं )
११.वाल्मीकि रामायण (सं )
१२. महाभारत (सं )
१३.बुद्धचरित (सं )
१४.चाणक्य - नीति (सं)
१५.महक ( बाल गीत )
१६. फुलवारी (बाल गीत )
१७.युग नायक महापुरुष
१८.युग प्रवर्तक महापुरुष
१९.पत्थरों से बंधे पंख ( कहानी -संग्रह)
लगभग १५० पुस्तकों में रचनाएँ संकलित. उपन्यास और कविता संग्रह पर छह एम फिल हुईं. लगभग पचास पाठ्य-पुस्तकें प्रकाशित .
************************************************************************
1.नीले - सफ़ेद फूल
'''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
ये नीले - सफ़ेद फूल
अब पूरी तरह खिल गए हैं ।
कुछ समय पूर्व तक इनका अस्तित्व नहीं था .
प्रतीक्षा थी
इन फूलों के खिलने की
एक -एक कर कितने दिन बीत गए
और अब
ये अपना सौन्दर्य बिखेरने लगे हैं.
क्या विडंबना है !
अब ये खिल गए हैं
और हमीं इन्हें देखने के लिए नहीं रहेंगे।
कितने-कितने स्वप्न सजाते हैं हम
और कैसे स्वप्न भंग होते चले जाते हैं
बस एक टीस टूटे काँच-सी
काटती रहती है हर पल ।
इन नीले - सफ़ेद फूलों को
कहाँ स्मरण रहेगा -किसी ने
उनके आगमन की प्रतीक्षा में
ऑंखें बिछा रखी थीं.
उनके संग जीने के
कितने-कितने स्वप्न सजा रखे थे !
कौन बदल सकता है
इन कटु सत्यों को ?
न चाहकर भी
जीना पड़ता इन स्थितियों को
और पल-पल टूटे काँच की कटन को
सहते जाना पड़ता है।
''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
2.लहरों कुछ तो कहो
'''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
पाँवों के नीचे आकर
लौट जाती हैं लहरें
नहीं रुकती हैं पल भर के लिए
कितनी उत्सुकता से रहती है प्रतीक्षा ।
दूर से हिचकोले खाती लहर को आते देखकर
उससे बतियाना चाहता है मन
बहुत कुछ पूछना चाहता है मन
-उसके संसार की बातें
-तरह - तरह के रंग बदलते समुद्र की बातें
- ऐसे समुद्र के संग जीवन बिताने की बातें
लहरें हैं कि बस आती हैं
और झट से लौट जाती हैं ।
वह जिस तेज़ी से आती हैं
आभास होता है
आकर बैठेंगी
हाल-चाल बताएँगी
हाल-चाल पूछेंगी
मिलकर बाँटेंगे अपने - अपने अनुभव।
कितना अच्छा लगता है जब
कोई पास आकर बैठता है
अपनत्व का अहसास
अंतर्मन का स्पर्श करता चला जाता है ।
किसी के पास कहाँ है समय
पास आकर बैठने का,
बतियाने का
पूछने -बताने का ।
लहरों के पास भी नहीं है समय
तो फिर क्यों भागती चली आती हैं
क्यों करती हैं मन में अंकुरित
आशाएँ ?
संभवतः
उन्हें आशाओं की टूटन की
अनुभूति नहीं है।
'''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
3.देह-दीपोत्सव
'''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
कंपकंपाती देह के स्पंदनों ने
भर दिए अधरों में प्रकम्पन
झिलमिला उठा आकाश
महक उठी धरती।बादलों में चमक गई
विद्युती तरंगें
चुंधिया गई धरती
चुंधिया गया आकाश।
उतर आया प्रकाश - पुंज
जगमगा गया मन - आँगन
देह ने मनाया दीपोत्सव।
पाकर स्पर्श
उमंगित लहरों का
खिल उठे कोने- कोने में
गुलाब।
**************
- अशोक लव
फ्लैट-363 ,सूर्य अपार्टमेन्ट ,प्लाट-14 ,सेक्टर-6 ,द्वारका,नई दिल्ली-110075

अशोक लव की तीन कविताएं
प्रकाशित पुस्तकें-
१. लड़कियाँ छूना चाहती हैं आसमान ( कविता-संग्रह)
२.अनुभूतियों की आहटें ( कविता-संग्रह)
३.टूटते चक्रव्यूह (सम्पादित-कविता संकलन)
४.सलाम दिल्ली ( लघुकथा - संग्रह )
५.खिड़कियों पर टंगे लोग ( सम्पादित लघुकथा संकलन )
६.बंद दरवाजों पर दस्तकें (सम्पादित लघुकथा-संकलन)
७.शिखरों से आगे (उपन्यास )
८. हिन्दी के प्रतिनिधि साहित्यकारों से साक्षात्कार
९. प्रेमचंद की लोकप्रिय कहानियाँ (सं)
१०.प्रेमचंद की सर्वोत्तम कहानियाँ (सं )
११.वाल्मीकि रामायण (सं )
१२. महाभारत (सं )
१३.बुद्धचरित (सं )
१४.चाणक्य - नीति (सं)
१५.महक ( बाल गीत )
१६. फुलवारी (बाल गीत )
१७.युग नायक महापुरुष
१८.युग प्रवर्तक महापुरुष
१९.पत्थरों से बंधे पंख ( कहानी -संग्रह)
लगभग १५० पुस्तकों में रचनाएँ संकलित. उपन्यास और कविता संग्रह पर छह एम फिल हुईं. लगभग पचास पाठ्य-पुस्तकें प्रकाशित .
************************************************************************
1.नीले - सफ़ेद फूल
''''''''''''''''''''''''''''''
ये नीले - सफ़ेद फूल
अब पूरी तरह खिल गए हैं ।
कुछ समय पूर्व तक इनका अस्तित्व नहीं था .
प्रतीक्षा थी
इन फूलों के खिलने की
एक -एक कर कितने दिन बीत गए
और अब
ये अपना सौन्दर्य बिखेरने लगे हैं.
क्या विडंबना है !
अब ये खिल गए हैं
और हमीं इन्हें देखने के लिए नहीं रहेंगे।
कितने-कितने स्वप्न सजाते हैं हम
और कैसे स्वप्न भंग होते चले जाते हैं
बस एक टीस टूटे काँच-सी
काटती रहती है हर पल ।
इन नीले - सफ़ेद फूलों को
कहाँ स्मरण रहेगा -किसी ने
उनके आगमन की प्रतीक्षा में
ऑंखें बिछा रखी थीं.
उनके संग जीने के
कितने-कितने स्वप्न सजा रखे थे !
कौन बदल सकता है
इन कटु सत्यों को ?
न चाहकर भी
जीना पड़ता इन स्थितियों को
और पल-पल टूटे काँच की कटन को
सहते जाना पड़ता है।
''''''''''''''''''''''''''''''
2.लहरों कुछ तो कहो
''''''''''''''''''''''''''''''
पाँवों के नीचे आकर
लौट जाती हैं लहरें
नहीं रुकती हैं पल भर के लिए
कितनी उत्सुकता से रहती है प्रतीक्षा ।
दूर से हिचकोले खाती लहर को आते देखकर
उससे बतियाना चाहता है मन
बहुत कुछ पूछना चाहता है मन
-उसके संसार की बातें
-तरह - तरह के रंग बदलते समुद्र की बातें
- ऐसे समुद्र के संग जीवन बिताने की बातें
लहरें हैं कि बस आती हैं
और झट से लौट जाती हैं ।
वह जिस तेज़ी से आती हैं
आभास होता है
आकर बैठेंगी
हाल-चाल बताएँगी
हाल-चाल पूछेंगी
मिलकर बाँटेंगे अपने - अपने अनुभव।
कितना अच्छा लगता है जब
कोई पास आकर बैठता है
अपनत्व का अहसास
अंतर्मन का स्पर्श करता चला जाता है ।
किसी के पास कहाँ है समय
पास आकर बैठने का,
बतियाने का
पूछने -बताने का ।
लहरों के पास भी नहीं है समय
तो फिर क्यों भागती चली आती हैं
क्यों करती हैं मन में अंकुरित
आशाएँ ?
संभवतः
उन्हें आशाओं की टूटन की
अनुभूति नहीं है।
''''''''''''''''''''''''''''''
3.देह-दीपोत्सव
''''''''''''''''''''''''''''''
कंपकंपाती देह के स्पंदनों ने
भर दिए अधरों में प्रकम्पन
झिलमिला उठा आकाश
महक उठी धरती।बादलों में चमक गई
विद्युती तरंगें
चुंधिया गई धरती
चुंधिया गया आकाश।
उतर आया प्रकाश - पुंज
जगमगा गया मन - आँगन
देह ने मनाया दीपोत्सव।
पाकर स्पर्श
उमंगित लहरों का
खिल उठे कोने- कोने में
गुलाब।
**************
- अशोक लव
फ्लैट-363 ,सूर्य अपार्टमेन्ट ,प्लाट-14 ,सेक्टर-6 ,द्वारका,नई दिल्ली-110075
Saturday, 17 April 2010
25 वर्षों के बाद मिले मेरे स्टुडेंट्स

पारुल,रेणुका,श्रीमती अशोक लव
ज्योतिका कुमार,अंजलि ,रेणुका,सुशीला,आभा खानोलकर सिंह,श्रीमती अशोक लव,राजिंदर सिंह चड्ढा
किंशुक डे, अमित नागपाल ( पीछे खड़े )
आभा खानोलकर सिंह ने आपने निवास पर मिलने का कार्यक्रम बनाया था। सन 1985 में दी एयर फ़ोर्स स्कूल से उत्तीर्ण हुए आभा के सहपाठी एकत्र हुए थे। उन्हें लगभग 27-28 वर्ष पहले पढ़ाया था। इतने वर्षों के बाद भी उनके मन में वही आदर-सम्मान था। संबंधों का यह अपनत्व दर्शाता है कि आज भी सामाजिक मूल्य ज़िंदा हैं। अध्यापक और विद्यार्थियों के मध्य स्नेह और सम्मान के रिश्ते कायम हैं। 16 अप्रैल 2010 को नौयडा स्थित उसके निवास पर पत्नी और पुत्री सहित पहुँचा तो पुत्र-सम विद्यार्थी राजिंदर सिंह चड्ढा पर सबसे पहले दृष्टि पड़ी , फिर आभा नज़र आई। फिर एक एक कर विद्यार्थी आते गए और रात के बारह कब बज गए पता ही नहीं चला। फ़ोटो में राजिंदर सिंह चड्ढा और आभा खानोलकर सिंह।



Thursday, 1 April 2010
टैफ्स कैम्पस : वर्षों - वर्षों का संग
टैफ्स गेट पार करने की कोशिश : शरारतें
टैफ्स के सामने का प्लेन
टैफ्स ( सुब्रोतो पार्क, दिल्ली कैंट ) - प्रवेश
फ़्लैट के पास का पार्क (जूनियर स्कूल )
टैफ्स - लायब्रेरी और एक्टिविटी हॉल
टैफ्स-ओपन एयर स्टेज : कितने - कितने फंक्शन !
विद्यार्थियों के साथ अंतिम दिवस : तीस अप्रैल दो हज़ार सातIn this photo: Kulbhushan Lakra , Chahat Mahajan , Rohit Kadyan , Rimpy Kaur Suri), abhay , Karan Budhiraja, Ashok Lav , Deepesh Bansal , Sachin Rathee , Jasleen Kaur , Mantaran Bimbra , Aakriti , Zakir Ashraf
टैफ्स-कैंटीन : और ज़िंदगी चलती रहेगी...
टैफ्स : पुराना रूप 
टैफ्स-पैटन टैंक : लायब्रेरी के ठीक सामने इसे रखने का रहस्य क्या है ?

वर्षों इस मार्ग से गुज़री थी ज़िंदगी....स्कूल...घर ...यूकिलिपटस के पेड़ों की लम्बी कतारें ....दिन-रात ....
Monday, 22 March 2010
किस तरह जीते हैं इस जहां के लोग / अशोक लव
Friday, 19 March 2010
ब्रज किशोर पाठक की पुस्तक अंतरंग आकलन लोकार्पित : बधाई!
अपने पुरखों के लेखन को भी प्रकाश में लाएं : दिनेश्वर प्रसाद रांची : हिंदी के लब्ध प्रतिष्ठित विद्वान प्रो. दिनेश्वर प्रसाद ने कहा कि अंतरंग आकलन पुस्तक का लोकार्पण एक प्रस्थान बिंदु है। इस तरह के काम और होने चाहिए। हमें अपने समकालीन लेखकों पर ध्यान देने के साथ-साथ अपने पुरखों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। बुधवार को रांची विवि के जनजातीय भाषा विभाग के सभागार में डा. ब्रजकिशोर पाठक लिखित पुस्तक अंतरंग आकलन का लोकार्पण किया गया। समारोह की अध्यक्षता करते हुए प्रो. प्रसाद ने झारखंड की रचनाशीलता का उल्लेख करते हुए उपस्थित लेखकों से आह्वान किया कि वे अपने पुरखों को भी प्रकाश में लाएं, जिन्हें किसी कारणवश साहित्य के इतिहास में दर्ज नहीं किया जा सका है। विशिष्ट अतिथि पद्मश्री डा. रामदयाल मुंडा ने कहा कि साहित्य किसी खांचे की चीज नहीं है। उसे किसी सांचे में बांधना अनुचित है। साहित्य सबका होता है। संस्कृतिकर्मी और झारखंड के बौद्धिक अगुवा डा. बीपी केशरी व नाटककार अशोक पागल पर केंद्रित उक्त पुस्तक पर सुधीर कुमार, डा. अशोक प्रियदर्शी, विद्याभूषण, दूरदर्शन के निदेशक डा. शैलेश पंडित आदि ने भी प्रकाश डाला। पुस्तक के लेखक डा. ब्रजकिशोर पाठक ने कहा, डा. केशरी के व्यक्तित्व में एक अजीब सरलता, विनम्रता और सृजनधर्मिता है। वहीं, अशोक पागल के नाटकों पर बात करते हुए कहा कि अशोकजी के लघुनाटक युगबोध से जुड़े होते हैं। कार्यक्रम का संचालन जनजातीय विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो गिरिधारी राम गौंझू ने किया। इस मौके पर अश्रि्वनी कुमार पंकज, अरविंद अविनाश, वंदना टेटे, भुवनेश्र्वर अनुज, राजाराम, मुकुंद नायक, श्री प्रकाश सहित सैकड़ों छात्र-छात्राएं उपस्थित थीं।
Tuesday, 16 March 2010
माँ दुर्गा के नौ रूप : नवरात्र
THE NINE DIFFERENT FORMS OF DEVIThe nine-day period from the new moon day to the ninth day of Ashvina is considered the most auspicious time of the Hindu Calendar and is hence the most celebrated time of the year as Durga Puja. The nine different forms of Devi are worshiped over the nine days. These are the most popular forms under which she is worshiped:
Durga Shailputri (Daughter of Mountain) शैलपुत्री
She is a daughter of Himalaya and first among nine Durgas. In previous birth she was the daughter of Daksha. Her name was Sati – Bhavani. i.e. the wife of Lord Shiva. Once Daksha had organized a big Yagna and did not invite Shiva. But Sati being obstinate, reached there. Thereupon Daksha insulted Shiva. Sati could not tolerate the insult of husband and burnt herself in the fire of Yagna. In other birth she became the daughter of Himalaya in the name of Parvati – Hemvati and got married with Shiva. As per Upnishad she had torn and the egotism of Indra, etc. Devtas. Being ashamed they bowed and prayed that, “In fact, thou are Shakti, we all – Brahma, Vishnu and Shiv are capable by getting Shakti from you.”
ब्रह्मचारिणी :Brahmacharini
The second Durga Shakti is Brahamcharini. Brahma that is who observes penance(tapa) and good conduct. Here “Brahma” means “Tapa”. The idol of this Goddess is very gorgeous. There is rosary in her right hand and Kamandal in left hand. She is full with merriment. One story is famous about her. In previous birth she was Parvati Hemavati the daughter of Himvan. Once when she was busy in games with her friends. Naradaji came to her and predicted seeing her Palm-lines that, “You will get married with a naked-terrible ‘Bhole baba’ who was with you in the form of Sati, the daughter of Daksh in previous birth. But now you have to perform penance for him.” There upon Parvati told her mother Menaka that she would marry none except Shambhu, otherwise she would remain unmarried. Saying this she went to observe penance. That is why her name is famous as tapacharini – Brahmacharini. From that time her name Uma became familiar.
चंद्रघंटा :Chandraghanta
The name of third Shakti is Chandraghanta. There is a half-circular moon in her forehead. She is charmful and bright. She is Golden color. She has three eyes and ten hands holding with ten types of swords – etc. weapons and arrows etc. She is seated on Lion and ready for going in war to fight. She is unprecedented image of bravery. The frightful sound of her bell terrifies all the villains, demons and danavas.
कुष्मांडा: Kushmanda
Name of fourth Durga is Kushmanda. The Shakti creates egg, ie. Universe by mere laughing .She resides in solar systems. She shines brightly in all the ten directions like Sun. She has eight hands. Seven types of weapons are shining in her seven hands. Rosary is in her right hand. She seems brilliant riding on Lion. She likes the offerings of “Kumhde.” Therefore her name “Kushmanda” has become famous.
स्कंदमाता Skanda Mata
Fifth name of Durga is “Skanda Mata”. The daughter of Himalaya, after observing penance got married with Shiva. She had a son named “Skanda.” Skanda is a leader of the army of Gods. Skanda Mata is a deity of fire. Skanda is seated in her lap. She has three eyes and four hands. She is white and seated on a lotus.
कात्यायनी :Katyayani
Sixth Durga is Katyayani. The son of “Kat” as “Katya”. Rishi Katyayan born in this “Katya” lineage. Katyayan had observed penance with a desire to get paramba as his daughter. As a result she took birth as a daughter of Katyayan. Therefore her name is “Katyayani” . She has three eyes and eight hands. These are eight types of weapons missiles in her seven hands. Her vehicle is Lion.
कालरात्रि
Seventh Durga is Kalratri. She is black like night. Durga hairs are unlocked. She has put on necklaces shining like lightening. She has three eyes which are round like universe. Her eyes are bright. Thousands of flames of fire come out while respiring from nose. She rides on Shava (dead body). There is sharp sword in her right hand. Her lower hand is in blessing mood. The burning torch (mashal) is in her left hand and her lower left hand is in fearless style, by which she makes her devotees fearless. Being auspicious she is called “Shubhamkari.”
महागौरी :Maha Gauri
The Eighth Durga is “Maha Gauri.” She is as white as a conch, moon and Jasmine. She is of eight years old. Her clothes and ornaments are white and clean. She has three eyes. She rides on bull She has four hands. The above left hand is in “Fearless – Mudra” and lower left hand holds “Trishul.” The above right hand has tambourine and lower right hand is in blessing style. She is calm and peaceful and exists in peaceful style. It is said that when the body of Gauri became dirty due to dust and earth while observing penance, Shiva makes it clean with the waters of Gangas. Then her body became bright like lightening. There fore, she is known as “Maha Gauri” सिद्धदात्री:Siddhidatri
Ninth Durga us Siddhidatri. There are eight Siddhis , they are- Anima, Mahima, Garima, Laghima, Prapti, Prakamya, Iishitva & Vashitva. Maha Shakti gives all these Siddhies. It is said in “Devipuran” that the Supreme God Shiv got all these Siddhies by worshipping Maha Shakti. With her gratitude the half body of Shiv has became of Goddess and there fore his name “Ardhanarishvar” has became famous. The Goddess drives on Lion. She has four hands and looks pleased. This form of Durga is worshiped by all Gods, Rishis-Munis, Siddhas, Yogis, Sadhakas and devotees for attaining the best religious asset.
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Friday, 12 March 2010
गुलाब की पंखुडियों के संग / अशोक लव
गुलाब की पंखड़ियों - सी कोमल
सुगन्धित
हृदय के कण-कण में समाहित ।
स्मृतियाँ!
प्रत्येक पंखुड़ी समेटे स्वयं में
अनेकानेक कथाएँ।
स्पर्श करते ही
आँखों के समक्ष तैरते
कितने-कितने दृश्य
कितने-कितने चेहरे!
प्रत्येक पंखुड़ी पर अंकित
भिन्न-भिन्न नाम
प्रत्येक पंखुड़ी पर अंकित
भिन्न-भिन्न आकृतियाँ !
स्मृतियाँ-विस्मृतियाँ !
किलकारियाँ !
उत्साह-उमंगें-ठहाके !
अश्रुकण!
संवेदनाएँ !
आशाएँ-निराशाएँ !
संघर्ष !
स्नेह-घृणा!
आकर्षण -विकर्षण !
क्या-क्या नहीं
इन पंखुड़ियों में !
फिर भी-
इन सबमें महकता जीवन !
कोमल सुगन्धित
पंखुड़ियाँ !
कोमल - सुगन्धित
भिन्न-भिन्न आकार ग्रहण करती
स्मृतियाँ !
''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
@ सर्वाधिकार- अशोक लव
१५ मार्च २०१०
Wednesday, 10 March 2010
रे मन कुछ तो सुन ! / अशोक लव
आते हैं जीवन की पगडंडियों पर चलते हुए
उलझनों भरे पल
जब स्वयं को ही नहीं समझ पाते हम।
घेर लेती हैं पगडंडियों पर बिखरी झाड़ियाँ
उलझ जाते हैं बढ़ते पाँव
कुछ नहीं सूझता
...कुछ भी नहीं
बहुत कठिन होते हैं ये पल
बहुत कठिन।
टटोलना चाहते हैं
पढ़ना चाहते हैं
समझना चाहते हैं
स्वयं को
कितने विवश हो जाते हैं
हम
स्वयं को ही नहीं
समझ पाते हैं हम ।
'''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
@अशोक लव १०.३.१०
Thursday, 4 March 2010
" जिस तन लगया इश्क कमाल " बुल्ले शाह - ਬੁੱਲ੍ਹੇ ਸ਼ਾਹ
ਜਿਸ ਤਨ ਲੱਗਿਆ ਇਸ਼ਕ ਕਮਾਲ,
ਨਾਚੇ ਬੇਸੁਰ ਤੇ ਬੇਤਾਲ..||
ਦਰਦਮੰਦਾਂ ਨੂੰ ਕੋਈ ਨਾਂ ਛੇੜੇ,
ਆਪੇ-ਆਪਣਾਂ ਦੁੱਖ ਸਹੇੜੇ..
ਜੰਮਣਾਂ-ਜੀਊਣਾਂ ਮੂਲ ਹਗੇੜੇ,
ਆਪਣਾ ਬੂਝੇ ਆਪ ਖਿਆਲ..
ਜਿਸ ਤਨ ਲੱਗਿਆ ਇਸ਼ਕ ਕਮਾਲ,
ਨਾਚੇ ਬੇਸੁਰ ਤੇ ਬੇਤਾਲ..||
ਜਿਸ ਨੇ ਵੇਸ ਇਸ਼ਕ ਦਾ ਕੀਤਾ,
ਧੁਰ ਦਰਬਾਰੋਂ ਫਤਵਾ ਲੀਤਾ..
ਜਦੋਂ ਹਜ਼ੂਰੋਂ ਪਿਆਲਾ ਪੀਤਾ,
ਕੁਝ ਨਾਂ ਰਿਹਾ ਸਵਾਲ-ਜਵਾਬ..
ਜਿਸ ਤਨ ਲੱਗਿਆ ਇਸ਼ਕ ਕਮਾਲ,
ਨਾਚੇ ਬੇਸੁਰ ਤੇ ਬੇਤਾਲ..||
ਜਿਸਦੇ ਅੰਦਰ ਵਸਿਆ ਯਾਰ,
ਉੱਠਿਆ ਯਾਰੋ-ਯਾਰ ਪੁਕਾਰ..
ਨਾਂ ਓਹ ਚੈਹੇ ਰਾਗ ਨਾਂ ਤਾਰ,
ਐਵੇਂ ਬੈਠਾ ਖੇਡੇ ਹਾਲ..
ਜਿਸ ਤਨ ਲੱਗਿਆ ਇਸ਼ਕ ਕਮਾਲ,
ਨਾਚੇ ਬੇਸੁਰ ਤੇ ਬੇਤਾਲ..||
ਬੁੱਲ੍ਹਾ ਸ਼ੌਹ ਨਗਰ ਸੱਚ ਪਾਇਆ,
ਝੂਠਾ ਰੌਲਾ ਸਭ ਮੁਕਾਇਆ..
ਸੱਚਿਆਂ ਕਾਰਨ ਸੱਚ ਸੁਣਾਇਆ,
ਪਾਇਆ ਉਸਦਾ ਪਾਕ ਜਮਾਲ..
ਜਿਸ ਤਨ ਲੱਗਿਆ ਇਸ਼ਕ ਕਮਾਲ,
ਨਾਚੇ ਬੇਸੁਰ ਤੇ ਬੇਤਾਲ..||
आत्मबल (कविता) / अशोक लव
'वुमेन ऑन टॉप' हिन्दी की प्रसिद्ध पत्रिका है। इसके मार्च २०१० अंक में " जय मोहयाल " के चीफ़ एडीटर श्री अशोक लव की कविता प्रकाशित हुई है। प्रस्तुत है यह कविता-
आत्मबल
'''''''''''''''''''''''
सहते हैं पर्वत
बर्फीली ठंडक,
तीव्र अंधड़
कंपाते भूकंप ,
स्वीकारते हैं चुनौती
आकाश की
नहीं आने देते निकट
निराशाओं की हवाएँ।
पर्वतों के वक्षस्थल पर
अंकित चिह्न ,
जीवंत गाथाएं हैं उनके संघर्षों की ।
एकांत में
एकांत को जीते हैं पर्वत।
बहुत साहसी होते हैं
अपनी -अपनी लड़ाई लड़ते लोग ,
एकांत में
पर्वतों की तरह सब कुछ सहकर
आगे बढ़ते लोग।
'''''''''''''''''''''''''''''''''''''
प्रस्तुति- पुलकित वैद
आत्मबल
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सहते हैं पर्वत
बर्फीली ठंडक,
तीव्र अंधड़
कंपाते भूकंप ,
स्वीकारते हैं चुनौती
आकाश की
नहीं आने देते निकट
निराशाओं की हवाएँ।
पर्वतों के वक्षस्थल पर
अंकित चिह्न ,
जीवंत गाथाएं हैं उनके संघर्षों की ।
एकांत में
एकांत को जीते हैं पर्वत।
बहुत साहसी होते हैं
अपनी -अपनी लड़ाई लड़ते लोग ,
एकांत में
पर्वतों की तरह सब कुछ सहकर
आगे बढ़ते लोग।
'''''''''''''''''''''''''''''''''''''
प्रस्तुति- पुलकित वैद
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